गुरु पूर्णिमा : एक अदभुत दिवस : अजय कुमार झा
* सप्त ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:।
कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावश:।।
अर्थात : 1. ब्रह्मर्षि, 2. देवर्षि, 3. महर्षि, 4. परमर्षि, 5. काण्डर्षि, 6. श्रुतर्षि और 7. राजर्षि; ये 7 प्रकार के ऋषि होते हैं इसलिए इन्हें सप्तर्षि कहते हैं।
सनातन सभ्यता को स्थापित करनेवाले ऋषियों और गुरु-शिष्य की लंबी परंपरा रही है।
विष्णु पुराण के अनुसार इनकी
नामावली इस प्रकार है-
1. प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में- मरीचि,
अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु
और वशिष्ठ।
2. द्वितीय स्वारोचिष मन्वंतर में- ऊर्ज,
स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और
परीवान।
3. तृतीय उत्तम मन्वंतर में- महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
4. चतुर्थ तामस मन्वंतर में- ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
5. पंचम रैवत मन्वंतर में हिरण्यरोमा,
वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
6. षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में- सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
7. वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में-
कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम,
जमदग्नि और भारद्वाज।
‘शतपथ ब्राह्मण के अनुसार:- 1. गौतम, 2.भारद्वाज, 3. विश्वामित्र, 4.जमदग्नि, 5. वसिष्ठ, 6. कश्यप और 7. अत्रि।
‘महाभारत’ के अनुसार
1. मरीचि, 2.अत्रि, 3.अंगिरा, 4. पुलह,
5. क्रतु, 6. पुलस्त्य और 7. वसिष्ठ सप्तर्षि माने गए हैं।
सनातन सभ्यता के अधिष्ठाता तथा आर्य संस्कृति के संस्थापक ऋषियों और मुनियों ने ही इस धरती पर धर्म, समाज, नगर, ज्ञान, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, वास्तु, योग आदि ज्ञान का अनुसंधान और प्रचार-प्रसार किया था। दुनिया के सभी धर्म- संप्रदाय और विज्ञान के हर क्षेत्र भारतीय ऋषियों का ऋणी है। इन ऋषियों के अद्वितीय और अकल्पनीय योगदान के सम्मान में आज आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन हम लोग गुरुपूर्णिमा का महोत्सव मनाते आए हैं। उन्होंने मानव मात्र के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, समुद्र, नदी, पहाड़ और वृक्षों सभी के संरक्षण, संवर्धन तथा चेतनागत परमोत्कर्ष हेतु जीव और जगत के अदृश्य परंतु अटूट सम्यक संबंध को स्थापित कर सभी के सुरक्षित जीवन के लिए कार्य किया।
इसी दिन महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। व्यास जी को प्रथम गुरु की भी उपाधि दी जाती है क्योंकि गुरु व्यास ने ही पहली बार मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व इस वजह से मनाया जाता है। इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
प्राचीनकाल से ही सनातन धर्म में गुरु को ज्ञानदाता, मोक्षदाता तथा ईश्वर के समतुल्य माना गया है। वेदों और पुराणों में गुरु को ब्रम्हा, विष्णु और महेश सा पूज्य माना गया है। निराकार परमात्मा का साकार रूप ही गुरु हैं, तो साकार गुरु का निराकार अवस्था ही परमात्मा है। अतः गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई और हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ही आज चारों ओर फैले इतने सारे गुरुओं से सावधान रहने की भी निवेदन करता हूँ। क्या वह प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ भी पढाता है, एक गुरु हो सकता है ? हम यह कैसे जाने कि कौन शिक्षक है? कौन गुरु है? कौन सदगुरु है? एवं कौन परमगुरु है ? गुरु एवं परमगुरु के बीच में भिन्नताएं क्या हैं ? “
भगवान् शिव पार्वती से गुरु के संबंध में क्या कहते है?
गुरु के बारे में भगवान् शिव की शिक्षाएं, गुरु के गुण एवं कार्य गुरु गीता में दी गई है | ‘गुरुगीता’ गुरुओं का सात वर्गीकरण करती हैं |
पहला:- सुचका गुरु :-
जो पूर्णतयः जानकार (पूर्णतयः शिक्षित ) हो तथा कम से कम एक वाह्य सांसारिक विज्ञान पर आचार्यत्व रखता हो | जैसे कि वह किसी एक विज्ञान या कला जैसे कि ज्योतिष, गणित, प्रबंधन इत्यादि में आचार्यत्व रखता हो |
दूसरा:- वाचका गुरु :-
विभिन्न प्रकार की श्रेणियों तथा आज्ञाओं (वर्ण एवं आश्रम) धर्म, अधर्म के कर्तव्यों का प्रशिक्षक इत्यादि ‘वाचका’ प्रकार का होता है |
तीसरा:- बोधका गुरु :-
गुरु जो शिष्य को पंचाक्षरी मंत्र इत्यादि की दीक्षा देता है बोधका क्ष्रेणी का गुरु होता है तथा वाचका तथा सुचिका श्रेणी के गुरु से उच्च होता है।
चतुर्थ:- निषिद्ध गुरु :- प्रतिबंधित गुरु :-
गुरु जो किसी निम्न क्ष्रेणी की विद्याओं जैसे कि मोहनी, मारण, वशीकरण, इत्यादि की दीक्षा देता है निषिद्ध गुरु के नाम से पुकारा जाता है और प्रतिबंधित गुरु होता है। ध्यान रहे! इनको मानने और पूजनेवाले सर्वाधिक होते हैं।
पंचम:- विहिता गुरु :-
“संसार अस्थायी है तथा आपदाओं का निवास है ” – संसार को दुखों के निवास के रूप में देखना, गुरु जो वैराग्य (विराग) की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाता है विहिता गुरु के रूप में जाना जाता है।
षष्ठम:- ‘करनाख्या’ गुरु :-
गुरु जो शिष्य को महावाक्य, तत्वमसि (तू वह है) इत्यादि, की दीक्षा देता है, वह “करनाख्या गुरु” कहा जाता है | वह इस लौकिक संसार की व्याधियों को हटाने वाला होता है |
सप्तम:- “परमगुरु”:-
वह जो सभी प्रकार की आशंकाओं की समूल मुक्ति में सक्षम होता है और जो जन्म मृत्यु के भय से मुक्त कराता है “परमगुरु” या सर्वोच्च गुरु माना जाता है। ध्यान रहे! इनको पूजनेवाले या माननेवाले सबसे कम होते हैं।
परमगुरु आत्म साक्षात्कार प्राप्त होता है और ईश्वरको पाने और जानने का मार्ग जानता है। हम परम गुरु या सर्वोच्च गुरु कई जन्मों में अर्जित पुण्यों के परिणाम के रूप में पाते हैं। ऐसे गुरु को प्राप्त कर के शिष्य सांसारिक बंधनों की आकांक्षाओं में (भौतिक संसार एवं उसके बंधन ) कभी नहीं पड़ता है, और सदा के लिए विमुक्त होता है। क्योंकि गुरु का ईश्वरीय रूप सिर्फ शिष्य के लिए होता है, सभी के लिए नहीं। गुरू परमात्मा है, तो ही हम उससे परमात्मा पर छलांग लगा सकेंगे, नहीं तो छलांग नहीं लग पायेगी। गुरुर्ब्रह्मा…। गुरु से तो शुरुआत है। वास्तव में वह तो बीज है। गुरु ने हाथ पकड़ लिया। अब जल्दी ही गुरु का हाथ परमात्मा के हाथ में रूपांतरित हो जाएगा और शिष्य अहं ब्रह्मास्मि, तत्वमसि, सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्, प्रज्ञानं ब्रह्म का शङ्खनाद करेगा।



