हेटौडा फ़ाइल: क्या हाईवे को बस्तियों को कुचलते हुए गुज़रना चाहिए? : डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ
डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ, काठमांडू । शनिवार, 6 दिसंबर, 2025 को हेटौडा रोड डिवीज़न ऑफ़िस ने ब्यस्त हेटौडा बाज़ार में 531 घरों, दुकानों और दूसरी बिल्डिंग्स को गिरा दिया। सरकार ने शनिवार की छुट्टी के दिन, जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, तब यह बेरहमी से तोड़-फोड़ की।
इस घटना में, जिसमें पिछले दिन ही सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम स्टे ऑर्डर को नज़रअंदाज़ किया गया, बड़े पैमाने पर गुस्सा फैल गया है। इस तोड़-फोड़ ने कानून के राज, प्रशासनिक दखल और इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरतों और नागरिक अधिकारों के बीच बैलेंस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसने राज्य द्वारा शक्तियों को अलग करने के सिद्धांत का भी उल्लंघन किया है और नागरिकों के न्यूनतम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है, जिसमें उनके घर और आश्रय का अधिकार भी शामिल है। सरकार की अपने निहत्थे नागरिकों का ऐसे नरसंहार करने के लिए बहुत निंदा हुई है जैसे उन पर किसी दुश्मन देश ने हमला किया हो। यह बहुत ही अफसोसनाक और घिनौना काम था कि पिछली सरकारों ने हाईवे को चौड़ा करने के दूसरे विकल्प पर भी विचार नहीं किया। यह अजीब बात है कि अंतरिम सरकार इसे जारी रखे हुए है। मौजूदा प्रधानमंत्री सुशीला कार्की पहले भी चीफ जस्टिस रह चुकी हैं। विडम्वना की बात यह है कि उनकी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को नहीं माना है, जिसका मतलब है कि सरकार ने लोकतन्त्र की नींव, शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत को नहीं माना है, और इससे लोकतन्त्र के प्रति सरकार के प्रतिवध्दता पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है।
विकास का औचित्य और कानूनी पहलू – राज्य ने इस काम को पूर्व-पश्चिम हाईवे और त्रिभुवन हाईवे के तहत 25/25 गज रोड बाउंड्री तय करने और एक चौड़ी फोर-लेन और बाईपास बनाने की ज़रूरत बताते हुए बताया है। रोड डिपार्टमेंट ने इस एरिया के करीब 9.5 किमी के अंदर के स्ट्रक्चर हटाकर रोड को चौड़ा करने के प्लान का हवाला दिया है। हालांकि, संवेदनशिलता यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले में शॉर्ट-टर्म अंतरिम ऑर्डर जारी किया है, तो तुरंत संरचना तोडने का काम कैसे किया गया, यह सवाल उठाया गया है – यह इसकी प्रक्रियागत वैधता और कोर्ट के ऑर्डर का सम्मान करने की ज़िम्मेदारी पर एक गंभीर हमला लगता है।
सड़क पर कब्ज़े को लेकर लंबे समय से विवाद
हाईवे एडमिनिस्ट्रेशन एक्ट के अनुसार, हाईवे की सेंटरलाइन के दोनों ओर 25 गज के अंदर कोई भी कंस्ट्रक्शन की इजाज़त नहीं है, और ऐसे कब्ज़ों के लिए मुआवज़ा नहीं मिलता, जो तबाही की जड़ है। सवाल उठता है: क्या कोई हाईवे किसी बस्ती से होकर गुज़रता है?
हेटौडा के लोग सालों से सड़क की चौड़ाई को लेकर कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं। ईस्ट-वेस्ट हाईवे और त्रिभुवन राजपथ, जो व्यापार और ट्रांसपोर्ट के लिए ज़रूरी रास्ते हैं, लंबे समय से अपने तय अधिकार क्षेत्र में बिना इजाज़त के बने स्ट्रक्चर से परेशान हैं। सिर्फ़ हेटौडा में ही नहीं, बल्कि नेपाल के दर्जनों दूसरे बाज़ार कस्बों में, स्थानीय लोग सालों से सड़क के स्टैंडर्ड की समस्या से डरे हुए हैं।
विकास प्रकृया को फिर से परिभाषित करना: अब एक राष्ट्रीय बहस क्यों ज़रूरी है?
नेपाल में विकास का अवधारणा सिर्फ़ स्ट्रक्चर बनाने की होड़ नहीं है; यह समाज, समुदाय और मानवाधिकारों की बुनियाद का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने का एक पूरा प्रकृया है। लेकिन, हाल के विकास ने विकास के नाम पर ज़बरदस्ती की गतिविधियों से गांवों, बस्तियों, बाज़ारों और स्थानीय समुदाय की ज़िंदगी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अब, इस बात पर तुरंत नेशनल बहस की ज़रूरत है कि विकास कैसे, कहां और किस प्रकृया से आगे बढ़ना चाहिए। नेपाल ने जो इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स के नियम माने हैं, वे साफ़ हैं। वे विकास को सिर्फ़ भौतिक संरचना बनाने तक सीमित नहीं रखते। बल्कि, वे ह्यूमन राइट्स, सम्मान और हिस्सेदारी को इसके केंद्र में रखते हैं।
1. पूर्व जानकारी, सलाह और सहमति: विकास के लिए पहली शर्त
विकास से जुड़ी कारवाही शुरू करने से पहले प्रभावित समुदायों को साफ़ जानकारी, सलाह और सहमति देना एक इंटरनेशनल लेवल पर तय मिनिमम स्टैंडर्ड है। यही विकास को सहभागिमूलक बनाता है। हालांकि, असल में, ज़्यादातर परियोजना में, लोकल लोगों को बताए या सलाह किए बिना रातों-रात एक्शन लेने का ट्रेंड होता है। हेटौडा में सरकार ने यही किया। इस तरह का ज़बरदस्त दखल विकास में भरोसा नहीं, बल्कि राज्य-नागरिक रिश्ते में अविश्वास पैदा करता है।
2. मुआवज़ा और पुनर्स्थापन: अधिकार, दया नहीं
सिर्फ़ मुआवज़ा देने से राज्य की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होती। राज्य की ज़िम्मेदारी उन नागरिकों को सही मुआवज़ा और पुनर्स्थापन देना है, जिन्होंने राज्य की वजह से अपने घर और ज़मीन खो दी है। इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक, मुआवज़ा प्रभावित लोगों को हुए असल नुकसान और भविष्य में होने वाले नुकसान का अंदाज़ा लगाकर तय किया जाना चाहिए। लेकिन, नेपाल में मुआवज़ा बांटने में देरी, ट्रांसपेरेंसी न होना और ऐसे हालात में मुआवज़ा देना जो प्रभावित लोगों की लाइफस्टाइल से मेल नहीं खाता, जैसी समस्या बार-बार आती रही है। इसलिए, सरकार को विकास के नाम पर तबाही मचाकर नागरिकों के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करनी चाहिए।
3. चरणवध्द अनुमोदन: कानूनी और ट्रांसपेरेंसी की ज़रूरी अभ्यास
विकास और निर्माण का काम ट्रांसपेरेंट तरीके से, तय कानूनी प्रोसेस के हिसाब से, चरणवध्द तरीके से लागू किया जाना चाहिए। चरणवध्द अनुमोदन का मतलब है कानूनी जानकारी, असेसमेंट, सहमति, मुआवज़ा, दूसरे इंतज़ाम। लेकिन, नेपाल में अक्सर इसका उल्टा तरीका अपनाया जाता है – पहले तोड़-फोड़, तोड़-फोड़; फिर कागजी कार्रवाई पूरी करना। जब इस तरह प्रोसेस को उल्टा किया जाता है, तो विकास कानून का राज नहीं, बल्कि ताकत का दिखावा लगने लगता है।
4. न्यायिक फैसलों का सम्मान: संवैधानिक नियम का आधार
सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के आदेशों की अनदेखी करके की गई कार्रवाई न सिर्फ़ मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संवैधानिक नियम को सीधी चुनौती भी है। इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स स्टैंडर्ड्स के साफ़ निर्देशों के मुताबिक, राज्य को विकास प्रोग्राम्स में कोर्ट के आदेशों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। नेपाल में, ऐसे आदेशों को तोड़कर तोड़ने, हटाने या कंस्ट्रक्शन का काम करने की आदत ने कानूनी, नैतिक और सामाजिक रूप से विकास को कमज़ोर किया है।
नतीजा: बिना मानवोचित मापदण्ड के ज़बरदस्ती की कार्रवाई विकास नहीं है
ऊपर दिए गए मानवोचित आधारभूत मापदण्ड का पालन किए बिना, समुदाय की आवाज़ सुने बिना, मनमाने ढंग से की गई ज़बरदस्ती की कार्रवाई को विकास नहीं कहा जा सकता। यह समुदाय के घर, रोज़ी-रोटी और सोशियो-साइकोलॉजिकल सामाजिक मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अधिकार पर सीधा हमला है। अगर हमें लंबे समय में नेपाल में सफल और टिकाऊ विकास हासिल करना है, तो राज्य और स्थानीय समुदाय के बीच भरोसा इसकी नींव होना चाहिए। भरोसा ज़बरदस्ती से नहीं, बल्कि प्रोसेस के हिसाब से न्याय का पालन करके बनता है। अब एक नई राष्ट्रीय सोच बनाने का समय है जो विकास के नाम पर अधिकारों को दबाए नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा करते हुए विकास करे।


