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सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए विश्वविद्यालयों और स्वास्थ्य संस्थानों में व्यापक पदमुक्ति

 

काठमांडू 2 मई । नेपाल सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ा और विवादास्पद कदम उठाते हुए अध्यादेश के माध्यम से देशभर के विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठानों और नियामक निकायों में कार्यरत उच्च पदाधिकारियों को एक साथ पदमुक्त कर दिया है। सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने शनिवार को तीन महत्वपूर्ण अध्यादेश जारी किए, जिनमें विश्वविद्यालय संबंधी कानून, स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान कानून और सार्वजनिक पदाधिकारियों की पदमुक्ति से जुड़ा विशेष प्रावधान शामिल है।

शिक्षा क्षेत्र में व्यापक बदलाव

शिक्षा ऐन 2028 में संशोधन करते हुए सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के अध्यक्ष, सदस्य सचिव और मनोनीत सदस्यों की नियुक्तियां रद्द कर दी हैं। सदस्य सचिव जंगबहादुर अर्याल को पद से हटाया गया है, जबकि अध्यक्ष का पद पहले से ही रिक्त था। इसी के साथ बोर्ड में नियुक्त शिक्षाविदों और विद्यालय प्रतिनिधियों को भी हटाया गया है।

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शिक्षक सेवा आयोग के अध्यक्ष मधुप्रसाद रेग्मी और सदस्य पवित्रा सुवेदी तथा रामशरण सापकोटा को भी पद से मुक्त किया गया है। अब इन पदों पर नियुक्ति लोकसेवा आयोग की सिफारिश के आधार पर होगी।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय सहित प्रमुख विश्वविद्यालय प्रभावित

देश के सबसे बड़े शैक्षणिक संस्थान में भी बड़ा फेरबदल हुआ है। उपकुलपति दीपक अर्याल, रेक्टर खड्ग केसी और रजिस्ट्रार केदार रिजाल को पद से हटाया गया, हालांकि उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया था। विश्वविद्यालय के कार्यकारी परिषद और प्राज्ञिक परिषद के अधिकांश मनोनीत सदस्य भी पदमुक्त कर दिए गए हैं, जिससे कई निकाय फिलहाल सदस्यविहीन हो गए हैं।

इसी तरह में उपकुलपति अच्युत वाग्ले, रजिस्ट्रार राजीव श्रेष्ठ और सातों स्कूलों के डीन सहित कुल 10 पदाधिकारियों को हटाया गया है।

इसके अलावा पूर्वाञ्चल, पोखरा, कृषि तथा वन विज्ञान, मध्यपश्चिम, सुदूरपश्चिम, लुम्बिनी बौद्ध, राजर्षि जनक, मदन भण्डारी और अन्य विश्वविद्यालयों में भी उपकुलपति और रजिस्ट्रार स्तर तक के पदाधिकारी हटाए गए हैं।

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स्वास्थ्य संस्थानों में भी बड़ी कार्रवाई

सरकार ने स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठानों में भी व्यापक बदलाव किया है। , और कर्णाली तथा पोखरा स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठानों के उपकुलपति, रेक्टर, रजिस्ट्रार और अस्पताल प्रमुखों को पद से हटाया गया है।

इसी क्रम में , नर्सिंग काउन्सिल, फार्मेसी काउन्सिल, स्वास्थ्य अनुसन्धान परिषद, पशु चिकित्सा परिषद और अन्य नियामक निकायों के पदाधिकारियों को भी पदमुक्त किया गया है।

कला, विज्ञान और प्रज्ञा प्रतिष्ठान भी अछूते नहीं

सरकार की इस कार्रवाई का दायरा शिक्षा और स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं रहा। सहित ललितकला और संगीत-नाट्यकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानों के पदाधिकारियों को भी हटाया गया है।

विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष भीमप्रसाद सुवेदी ने इस कदम को “सकारात्मक इरादे” से लिया गया निर्णय बताया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि एक साथ इतने बड़े पैमाने पर पद रिक्त होने से प्रशासनिक अन्योल (अनिश्चितता) पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया स्पष्ट और तेज नहीं हुई, तो शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

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सुवेदी ने यह भी कहा कि नई नियुक्तियों पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप लग सकते हैं, जैसा कि पहले भी होता रहा है।

निष्कर्ष

सरकार का यह कदम शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के नाम पर लिया गया एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव माना जा रहा है। हालांकि, इससे तत्काल प्रशासनिक शून्यता और राजनीतिक विवाद दोनों पैदा होने की संभावना है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार नई नियुक्तियों को कितनी पारदर्शिता और दक्षता के साथ पूरा करती है।

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