डा. राजेन्द्र विमल: एक युगद्रष्टा को अंतिम विदाई : डा विजय दत्त
न पहाडी न हिमाली न मधेशी लेखियोस्।*
*म मरे पछि मलाई नेपाली लेखियोस् ।।
डा विजय दत्त, जनकपुरधाम, 11 अगस्त। मातृभूमि के मातृत्व भाव से ओतप्रोत युगस्रष्टा एवं युगद्रष्टा महान व्यक्तित्व डा.राजेन्द्र विमल थे । आज उन्ही के अन्तिम संस्कार लौकिक से पारलौकिक यात्रा ! हजारौं नर नारी कि आंख भीगी हुई थी । राष्ट्रिय सम्मान का अदभूत नजारा । शब्द मे वयां नहि कि जा शक्ति । एक शब्द चित्र अर्पण !
१० अगस्त २०२६ (तदनुसार २५ सावन २०८३) को जनकपुरधाम ही नहीं, बल्कि संपूर्ण नेपाली साहित्य, मैथिली भाषा-साहित्य और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के एक प्रखर नक्षत्र डा. राजेन्द्र विमल ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। उनके भौतिक अवसान से प्राज्ञिक तथा साहित्यिक जगत ने एक निष्ठावान साधक, गंभीर समालोचक, दार्शनिक विचारक और युगद्रष्टा व्यक्तित्व को खो दिया है।
*जनकपुरधाम की धरोहर और बहुआयामी व्यक्तित्व*
डा. राजेन्द्र विमल केवल एक प्राध्यापक या लेखक भर नहीं थे, वे मिथिला मधेस एवं नेपाल के सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक चेतना और भाषा-साहित्य के जीवंत स्तंभ थे। जनकपुरधाम की माटी में रच-बसकर उन्होंने मैथिली और नेपाली दोनों भाषा-साहित्य में जो योगदान दिया, वह अतुलनीय है। उनकी रचनाओं में मानवतावाद, समावेशी लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और तराई-पहाड़ के बीच भावनात्मक एकता का प्रखर स्वर गुंजायमान होता है।
उनकी लेखनी में दार्शनिक गंभीरता, भाषाई स्पष्टता और समाज के प्रति गहरा दायित्वबोध झझलकता था। संस्कृत, मैथिली, नेपाली और हिंदी भाषा पर उनका समान अधिकार था, जिसके कारण उनके विचार अंतर-सांस्कृतिक और अंतर-भाषाई स्तर पर अत्यंत प्रभावशाली माने जाते थे।
*साहित्यिक एवं प्राज्ञिक योगदान*
डा. विमल ने दीर्घकाल तक अध्यापन के माध्यम से हजारों विद्यार्थियों में ज्ञान और विचारों की ज्योति प्रज्वलित की। उनके प्रकाशित ग्रंथों, शोध-प्रबंधों और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित वैचारिक लेखों ने साहित्य के भंडार को समृद्ध किया है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर समाज रूपांतरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम माना।
उनके निबंधों, समालोचनाओं और वैचारिक टिप्पणियों में युग के सत्य को निडरता के साथ प्रस्तुत करने का साहस था। वे सदैव विविधता में एकता, सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करते रहे।
*विचार और निष्ठा के प्रतीक*
डा. राजेन्द्र विमल का जीवन सादगी, निष्ठा और निरंतर साधना का पर्याय था। किसी भी सामाजिक या राजनीतिक संक्रमण काल में भी उन्होंने अपने बौद्धिक मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। उनके चिंतन ने समाज को सदैव सही दिशा दिखाई। उनकी बहुभाषी दक्षता और मधेस की सांस्कृतिक गहराई को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने की क्षमता ने उन्हें एक सच्चे ‘युगद्रष्टा’ के रूप में स्थापित किया।
*अमिट छाप और श्रद्धांजलि*
उनके निधन के समाचार से संपूर्ण साहित्यिक और बौद्धिक जगत शोकाकुल है। डा. विमल का भौतिक शरीर भले ही हमारे बीच न रहा हो, लेकिन उनके विचार, कालजयी रचनाएं और समाज को दिया गया मार्गदर्शन सदैव अमर रहेगा। उनके द्वारा निर्मित साहित्यिक और वैचारिक मार्ग भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।
एक निष्ठावान चिंतक, द्रष्टा और बहुआयामी व्यक्तित्व डा. राजेन्द्र विमल को भावभीनी श्रद्धांजलि एवम् शब्दांजली अर्पण ।
*चारुकात पसरल छैक गुज गुज अन्हरिया*।
*तए एक गीत किरण केर गौने चलु मीत रे* ।


