मिथिला की अनोखी संस्कृति ; मधुश्रावणी : अंशु झा

अंशु झा, काठमांडू, १५ अगस्त। मिथिला संस्कृति अपनी विविधता, परंपराओं और लोक-आस्थाओं के कारण विश्व में विशिष्ट स्थान रखती है। मिथिला की लोकसंस्कृति में अनेक ऐसे पर्व और व्रत हैं, जिनमें धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। मधुश्रावणी व्रत मिथिला की ऐसी ही महत्वपूर्ण और विशिष्ट लोकपरंपरा है, जो मुख्यतः नवविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़ी हुई है।
मधुश्रावणी पूजा सावन मास में कृष्ण पक्ष के पंचमी तिथि से लेकर शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि तक होती है । यह व्रत विशेष रूप से नवविवाहित स्त्रियों द्वारा अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि, पति के दीर्घायु होने तथा परिवार की मंगल-कामना के लिए किया जाता है। इस अवसर पर नवविवाहिता अपने मायके में रहकर १३ दिनों तक व्रत एवं पूजा करती हैं। इस परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान के साथ लोकगीत, लोककथाएँ, चित्रकला और पारिवारिक सहभागिता का भी विशेष महत्व है।
मधुश्रावणी की सबसे सुंदर विशेषताओं में मिथिला चित्रकला का स्थान उल्लेखनीय है। पूजा के लिए घर के आँगन या विशेष स्थान को पारंपरिक ढंग से सजाया जाता है। दीवारों और भूमि पर विभिन्न प्रकार के मांगलिक चित्र बनाए जाते हैं। इनमें देवी-देवताओं, नाग-नागिन, कमल, सूर्य, चंद्रमा, मछली तथा अन्य लोकप्रतीकों का चित्रण किया जाता है। इन चित्रों में मिथिला की कलात्मक चेतना और प्रकृति के प्रति उसकी गहरी संवेदना दिखाई देती है। मिट्टी से हाथी और नाग नागिन भी बनाया जाता है और उसे पूजा जाता है ।
मधुश्रावणी पूजा में नाग-पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। भारतीय संस्कृति में नागों को प्राचीन काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। नाग प्रकृति और पर्यावरण से भी जुड़े हुए हैं। इस प्रकार यह परंपरा मनुष्य और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व की भावना को भी अभिव्यक्त करती है।
इस व्रत का एक महत्वपूर्ण पक्ष लोककथाओं और लोकगीतों की परंपरा है। पूजा के दौरान महिलाएँ सामूहिक रूप से कथाएँ सुनती और लोकगीत गाती हैं। इन गीतों में विवाह, प्रेम, पारिवारिक संबंध, नारी-जीवन, सुख-दुःख और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से मधुश्रावणी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मौखिक लोकसाहित्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने का माध्यम भी है।
मधुश्रावणी का संबंध नवविवाहित स्त्री के नए जीवन से भी है। विवाह के बाद वह अपने मायके लौटकर इस व्रत में सहभागी होती है। माता-पिता, भाई-बहन और अन्य परिजन उसके साथ रहते हैं। इससे पारिवारिक संबंधों में आत्मीयता बढ़ती है। साथ ही नवविवाहिता को अपने नए जीवन, दांपत्य संबंधों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति सांस्कृतिक रूप से तैयार करने की एक सामाजिक प्रक्रिया भी इसमें दिखाई देती है।
इस परंपरा में नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूजा की तैयारी, गीत, कथा, चित्रांकन और अन्य अनुष्ठानों में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता रहती है। इसलिए मधुश्रावणी को मिथिला की स्त्री-केंद्रित लोकपरंपराओं में भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा सकता है। शाम को सहेलियों के साथ फूल लोढना और सुबह को विधिवत पूजा करना, कथा सुनना। इसके माध्यम से महिलाएँ अपनी भावनाओं, अनुभवों और रचनात्मकता को अभिव्यक्त करती हैं। यही एक ऐसा व्रत है जिसमें पुरोहित महिला ही होती है ।
अन्तिम दिन अर्थात् सावन के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को व्रतालु को दोनों पैर और दोनों घुटनो पर टेमी से दागा जाता है जिसे कुछ विद्वतजन रूढिवादी कहते हैं । फिलहाल तो इस विधि में परिमार्जन हुआ है । अभी “शीतल टेमी” अर्थात् बत्ती में आग लगाकर उसे निभा दिया जाता है फिर दागा जाता है । इतने कठोर व्रत होने के बावजूद भी नई पीढी भी इसे निभा ही रही है । मेरे विचार में हमारे पूर्वज जो कुछ नियम बनाए होंगे उस समय के हिसाब से वैज्ञानिक ही होगा । इस पर अनुसन्धान की आवश्यकता है कि कालान्तर में यहकितना उचित है ।
आज के आधुनिक और तेजी से बदलते समाज में अनेक पारंपरिक रीति-रिवाजों का स्वरूप बदल रहा है। मधुश्रावणी भी इससे अछूती नहीं है। फिर भी इसकी सांस्कृतिक महत्ता बनी हुई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि परंपरा के मूल भाव को समझते हुए उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। अंधानुकरण के स्थान पर इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक पक्षों को समझना अधिक उपयोगी होगा।
मधुश्रावणी हमें यह संदेश देती है कि संस्कृति केवल पुस्तकों और संग्रहालयों में सुरक्षित वस्तु नहीं है, बल्कि वह हमारे दैनिक जीवन, लोकगीतों, कला, विश्वासों और पारिवारिक संबंधों में जीवित रहती है। मिथिला की यह परंपरा हमारी लोकस्मृति, स्त्री-सृजनशीलता, पारिवारिक आत्मीयता और प्रकृति के प्रति सम्मान का सुंदर उदाहरण है।
समग्र में मधुश्रावणी व्रत को केवल एक धार्मिक व्रत के रूप में देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक पहचान को सीमित करना होगा। यह मिथिला की जीवंत लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बदलते समय में इसके मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। यही हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

