गोली और राज्य : अंशुकुमारी झा

अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक अगस्त । राजनीति विज्ञान के प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने कहा था कि राज्य वह संस्था है जिसके पास किसी निश्चित क्षेत्र में वैध रूप से बल प्रयोग करने का अधिकार होता है । इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य मनमाने ढंग से हिंसा कर सकता है, बल्कि यह अधिकार संविधान, कानून और न्यायिक व्यवस्था द्वारा नियंत्रित होता है । राज्य की स्थापना का मूल उद्देश्य समाज में शांति, सुरक्षा, न्याय और व्यवस्था बनाए रखना है । किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य को कानून लागू करने और नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार प्राप्त होता है । इसी अधिकार के अंतर्गत राज्य के पास पुलिस, सशस्त्र बल तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ होती हैं । लेकिन जब कानून–व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग, विशेष रूप से गोली चलाने की नौबत आती है, तब यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि यह संवैधानिक, नैतिक और मानवीय प्रश्न भी बन जाता है । गोली का प्रयोग राज्य की शक्ति का सबसे कठोर और अंतिम रूप माना जाता है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका प्रयोग तभी उचित माना जाता है, जब सभी अन्य उपाय विफल हो जाएँ और जनजीवन, सार्वजनिक संपत्ति या राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो । इसलिए “गोली और राज्य” का संबंध केवल हथियार और हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, मानवाधिकार, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ विषय है ।
लोकतंत्र संवाद, सहमति और कानून के शासन पर आधारित व्यवस्था है । इसलिए लोकतांत्रिक राज्य में जनता और सरकार के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है । प्रदर्शन, विरोध और आंदोलन नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार हैं । हालाँकि यदि कोई आंदोलन हिंसक हो जाए, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाए, आगजनी करे या आम नागरिकों की सुरक्षा को खतरे में डाले, तो राज्य का दायित्व है कि वह कानून–व्यवस्था बहाल करे । लेकिन ऐसा करते समय भी सुरक्षा बलों को संयम, धैर्य और पेशेवर क्षमता का परिचय देना चाहिए । गोली का प्रयोग केवल अंतिम उपाय होना चाहिए ।
लोकतांत्रिक देशों में पुलिस और सुरक्षा बलों को बल प्रयोग के लिए स्पष्ट दिशा–निर्देश दिए जाते हैं । पहले बातचीत, चेतावनी, भीड़ नियंत्रण के गैर–घातक उपाय, लाठीचार्ज, आँसू गैस, पानी की बौछार आदि का उपयोग किया जाता है । गोली चलाना केवल अंतिम विकल्प माना जाता है, जब किसी व्यक्ति या भीड़ से तत्काल और गंभीर खतरा उत्पन्न हो ।
विगत से भी तो हम कुछ सीख ही सकते हैं न । लगभग एक वर्ष पहले, जेनजी आंदोलन के दौरान गोली चली थी । फिर क्या हुआ था सबको पता है । हमारा देश राख बन गया था । उस वक्त कोई सुरक्षा बल काम नहीं किया था । करीब २४ घंटे तक देश की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह अस्त–व्यस्त हो गई थी । उस समय देश की प्रमुख सुरक्षा एजेंसियाँ (नेपाली सेना, नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग) देश की आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में कहाँ चूक गईं ? यदि भविष्य में अचानक फिर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो विभिन्न सुरक्षा निकायों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करके आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था कैसे कायम रखी जा सकती है ? इसके लिए पहले से किस प्रकार की तैयारियाँ आवश्यक हैं ?
वर्तमान में सुरक्षा निकायों, विशेषकर पुलिस, के पास उपलब्ध संसाधन और उपकरण पर्याप्त हैं या नहीं ? सुरक्षा एजेंसियों के कार्यक्षेत्र और विभिन्न स्तरों पर उनकी जिम्मेदारियों तथा तैनाती को लेकर आवश्यक चर्चा हुई है या नहीं ?
वर्तमान संदर्भ में यदि सुनसरी के देवानगंज की घटना को देखें, तो क्या वास्तव में नेपाल के सुरक्षा निकाय स्थिति को नियंत्रित करने में असमर्थ रहे ? इस प्रकार के बहुत सारे प्रश्न जनता के मन में उठ रहे हैं । हमारे देश में गोली चलाने की इतनी जल्दबाजी क्यों रहती है । चाहे सरकार किसी की भी हो मरती तो आम जनता ही है । फिलहाल तराई एकबार फिर से जल रहा है । वहाँ का जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है । गोली चलने के बाद पूरे क्षेत्र में भय, तनाव और असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न हो गया है ।
हर लोकतांत्रिक राज्य में बल प्रयोग का सिद्धांत आवश्यकता और अनुपातिकता पर आधारित होता है । इसका अर्थ है कि जितना खतरा हो, उतना ही बल प्रयोग किया जाए । पर यहाँ तो जिसके हाथ में बन्दूक होता है शायद सबसे डरा हुआ वही होता है ।
गोली चलाने की आवश्यकता किन परिस्थितियों में हो सकती है–जब किसी व्यक्ति का जीवन तत्काल खतरे में हो । जब आतंकवादी हमला या सशस्त्र हिंसा हो रही हो । जब सुरक्षा बलों पर घातक हथियारों से हमला किया जाए । जब किसी गंभीर अपराधी को रोकने का कोई अन्य प्रभावी उपाय न हो । इन परिस्थितियों में भी लक्ष्य केवल खतरे को समाप्त करना होना चाहिए, न कि अनावश्यक रूप से किसी की जान लेना । किन्तु अनेक घटनाओं ने यह धारणा बनाई है कि कई बार निहत्थे नागरिक भी गोलीबारी के शिकार हुए हैं । ऐसी घटनाएँ राज्य की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं ।
राज्य की पहली जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन की रक्षा करना है । इसलिए गोली चलाने का प्रत्येक निर्णय मानवाधिकारों के संदर्भ में भी परखा जाता है । संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार कानून लागू करने वाले अधिकारियों को बल और आग्नेयास्त्रों का प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में तथा न्यूनतम स्तर पर करना चाहिए । यदि गोली चलानी पड़े, तो उसके बाद घायलों को तुरंत चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना तथा पूरी घटना की निष्पक्ष जांच कराना भी राज्य का दायित्व है । यदि बिना उचित कारण गोली चलाई जाती है या अत्यधिक बल प्रयोग किया जाता है, तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है । गोली चलाने का परिणाम केवल तत्काल घटना तक सीमित नहीं रहता । इसके अनेक सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं । सबसे पहले, इससे किसी व्यक्ति की मृत्यु या गंभीर चोट हो सकती है । इसके बाद समाज में आक्रोश, अविश्वास और तनाव बढ़ सकता है । कई बार ऐसी घटनाएँ बड़े राजनीतिक आंदोलनों का कारण बन जाती हैं । जो सर्वविदित ही है । क्योंकि हम सभी ने बार बार इस परिस्थिति से गुजरे हैं । यदि लोगों को लगे कि राज्य ने अनावश्यक बल प्रयोग किया है, तो शासन की वैधता और विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है । दूसरी ओर, यदि राज्य आवश्यक परिस्थितियों में भी कार्रवाई करने से हिचकिचाए, तो कानून–व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है और हिंसक समूहों का मनोबल बढ़ सकता है । इसलिए राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना है ।
नेपाल एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है । साथ ही राज्य पर यह जिम्मेदारी भी है कि वह सार्वजनिक सुरक्षा और कानून–व्यवस्था बनाए रखे । हमारे देश में कई बार राजनीतिक आंदोलन, सीमा क्षेत्र के विवाद, जातीय एवं धार्मिक तनाव तथा स्थानीय संघर्षों के दौरान सुरक्षा बलों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । ऐसी स्थितियों में नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल और आवश्यकता पड़ने पर नेपाली सेना भी कानून के अनुसार अपनी भूमिका निभाती है । हाल के वर्षों में यह महसूस किया गया है कि आधुनिक भीड़ नियंत्रण उपकरण, बेहतर प्रशिक्षण, प्रभावी खुफिया सूचना, समय पर संवाद तथा विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने की आवश्यकता है । इससे गोली चलाने जैसी गंभीर स्थिति से काफी हद तक बचा जा सकता है ।
आधुनिक लोकतंत्र में केवल हथियारों के बल पर सुरक्षा स्थापित नहीं की जा सकती । इसके लिए कई सुधार आवश्यक हैं । सुरक्षा बलों को नियमित और आधुनिक प्रशिक्षण दिया जाए । गैर–घातक भीड़ नियंत्रण उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाई जाए । पुलिस और स्थानीय समुदाय के बीच विश्वास मजबूत किया जाए । खुफिया तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जाए । गोलीकांड की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए । सुरक्षा बलों को तनाव प्रबंधन और मानवाधिकार संबंधी प्रशिक्षण दिया जाए । तकनीक, बॉडी कैमरा और डिजिटल साक्ष्यों का अधिक उपयोग किया जाए । इन उपायों से न केवल बल प्रयोग की आवश्यकता कम होगी, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा ।
नेपाल में सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियाँ अनेक प्रकार की हैं । राजनीतिक आंदोलन, जातीय या धार्मिक तनाव, स्थानीय विवाद, सीमापार प्रभाव तथा सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाली अफवाहें कुछ ही घंटों में स्थिति को गंभीर बना सकती हैं । ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय प्रशासन को कफ्र्यू लगाने, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को तैनात करने तथा आवश्यकता पड़ने पर नेपाली सेना की सहायता लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त है । नेपाल की भौगोलिक, सामाजिक और संस्थागत परिस्थितियों को देखते हुए कई बार ऐसे निर्णय अपरिहार्य भी हो जाते हैं ।
समग्र में “गोली और राज्य” का संबंध शक्ति, जिम्मेदारी और नैतिकता के बीच संतुलन का विषय है । राज्य के पास कानून लागू करने के लिए बल प्रयोग का वैध अधिकार अवश्य है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है । इसका प्रयोग संविधान, कानून, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए । एक आदर्श लोकतांत्रिक राज्य वही है जहाँ गोली चलाने की नौबत बहुत कम आए, क्योंकि वहाँ संवाद, कानून का सम्मान, प्रभावी पुलिस व्यवस्था और जनता का विश्वास मजबूत हो । जब भी गोली चलाना अपरिहार्य हो, तब उसका उद्देश्य केवल जीवन की रक्षा, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून–व्यवस्था की बहाली होना चाहिए, न कि प्रतिशोध या शक्ति का प्रदर्शन । किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके न्याय, पारदर्शिता, संवेदनशीलता और नागरिकों के विश्वास में निहित होती है । इसलिए लोकतांत्रिक शासन की सफलता इस बात से आँकी जाती है कि वह संकट की घड़ी में भी कानून और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए शांति स्थापित कर सके ।


