महाविनाशकारी ‘हिम-विस्फोट’: लांगटांग में 2.5 करोड़ घनमीटर हिमचट्टान के गिरने से रसुवागढ़ी में प्रलय
काठमांडू, 3 सितंबर, हिमालिनीडेस्क, (विस्तृत जांच एवं घटना रिपोर्ट – सितंबर 2026)
अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में नेपाल के रसुवा जिले के अंतर्गत लांगटांग के उत्तरी भाग में एक भयावह प्राकृतिक आपदा ने जन्म लिया। ल्हेन्दे नदी के मुहाने पर स्थित एक विशाल हिमपहाड़ (ग्लेशियर) के ढहने से भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में भयानक बाढ़ आ गई। इस अप्रत्याशित घटना ने व्यापक स्तर पर जन-धन की क्षति की है और पूरे नेपाल को झकझोर कर रख दिया है।
1. घटना का मुख्य कारण: 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा ‘हिम-विस्फोट’
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. रंजन कुमार दहाल और उनकी अंतरराष्ट्रीय टीम के अध्ययन के अनुसार, लांगटांग लेरुंग के उत्तर में लगभग 2.5 करोड़ घनमीटर (25 मिलियन क्यूबिक मीटर) आकार की एक विशाल हिमचट्टान टूटकर 2,000 मीटर नीचे गिर गई।
यह घटना कोई सामान्य भूस्खलन या हिमस्खलन नहीं थी, बल्कि इसे विशेषज्ञों द्वारा ‘हिम-विस्फोट’ (Ice-Explosion) करार दिया गया है। जब 2.5 करोड़ घनमीटर हिउँ और बर्फ इतनी ऊंचाई से नीचे गिरी, तो उससे उत्पन्न ऊर्जा किसी शक्तिशाली बम विस्फोट के समान थी। इसका प्रभाव इतना जोरदार था कि भूकंप मापक यंत्रों ने इसे 5.2 रिक्टर स्केल के भूकंप के रूप में दर्ज किया।
हिमचट्टान का विशाल आकार (एक तुलना):
विशेषज्ञों के अनुसार, 2.5 करोड़ घनमीटर बर्फ का यह आकार इतना बड़ा है कि इससे लंदन के प्रसिद्ध वेम्बली स्टेडियम को 22 बार भरा जा सकता है। यह मिस्र के पिरामिडों के आकार से 10 गुना बड़ा है। कुछ प्रारंभिक अनुमानों में इस द्रव्यमान के 10 करोड़ घनमीटर तक होने की भी आशंका जताई गई है। यह मलबा 120 किलोमीटर प्रति घंटे की भयानक रफ्तार से नीचे आया।
2. तबाही और नुकसान का मंज़र
इस अप्रत्याशित बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, चितवन और नवलपरासी जिलों में भारी तबाही मचाई है। बाढ़ के प्रारंभिक प्रभाव से उत्पन्न विनाश के आंकड़े हृदयविदारक हैं:
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मानवीय क्षति: 579 से अधिक शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 1,924 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।
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बुनियादी ढांचे का विनाश: बाढ़ ने 35 मोटरेबल पुल और 45 सस्पेंशन (झूला) पुलों को पूरी तरह से बहा दिया है। लगभग 45 किलोमीटर सडकें नष्ट हो चुकी हैं।
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यातायात ठप्प: काठमांडू के नागढुंगा से चितवन के भरतपुर तक का पृथ्वी राजमार्ग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।
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जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान: रसुवा और नुवाकोट की 14 जलविद्युत परियोजनाओं में भारी क्षति हुई है। रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना की 250 मीटर लंबी सुरंग में बाढ़ का पानी और मलबा घुस गया, जहाँ ड्रोन और सेना की मदद से 225 मीटर अंदर तक खोज की गई, पर कोई नहीं मिला।
3. जलवायु परिवर्तन और वैज्ञानिकों की चेतावनी
इस महाविनाश के पीछे का सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान माना जा रहा है। प्रोफेसर डॉ. दहाल के साथ चीन (तोंगजी विश्वविद्यालय), ब्रिटेन (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और किंग्स कॉलेज लंदन) और इटली (पाडुआ विश्वविद्यालय) के वैज्ञानिक पिछले एक साल से हिमालयी क्षेत्रों में हो रही हलचल का अध्ययन कर रहे हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि लांगटांग और उसके आसपास की जमीन का तापमान पिछले 25 वर्षों के औसत तापमान से काफी अधिक हो गया है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और अस्थिर हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी प्रलयंकारी घटनाएं हो रही हैं।
4. बाढ़ का दूसरा चरण: कृत्रिम झील (Barrier Lake) का निर्माण
आपदा यहीं नहीं रुकी। हिमस्खलन के मलबे से ल्हेन्दे नदी के पास एक कृत्रिम झील (बैरियर लेक-1) का निर्माण हो गया। जब यह झील भर गई, तो भोटेकोशी में फिर से बाढ़ आ गई। हालांकि, चीनी प्रशासन और सैटेलाइट डेटा ने पुष्टि की है कि अब यह झील खाली हो चुकी है, जिससे एक और बड़े खतरे टलने की उम्मीद है। बचाव कार्य में चीन द्वारा प्रदान की गई 3D इमेजिंग और अत्याधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया जा रहा है।
निष्कर्ष
ल्हेन्दे नदी के मुहाने पर हुआ यह ‘हिम-विस्फोट’ केवल नेपाल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर चेतावनी संकेत है। अत्यधिक तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियरों का यह पतन दर्शाता है कि भविष्य में पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को और अधिक सतर्क रहना होगा। सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदायों को ऐसी आपदाओं के न्यूनीकरण, उन्नत पूर्व-चेतावनी प्रणाली विकसित करने और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए तत्काल और दीर्घकालिक कदम उठाने की आवश्यकता है।






