Sat. Sep 26th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री बालेन का संबोधन — हिंदी अनुवाद

 

माननीय अध्यक्ष महोदय, माननीय महासचिव महोदय, महामहिम राजदूतगण एवं प्रतिनिधिगण, देवियो और सज्जनो,

मैं हिमालय की गोद में बसे एक दूरस्थ देश नेपाल से मानवता के लिए एक निकट आती हुई चेतावनी लेकर आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ।

मैं चाहता कि आज इस मंच से विकास, लोकतंत्र, शांति और एक युवा राष्ट्र की आकांक्षाओं के बारे में बोलता। लेकिन दुर्भाग्य से आज मुझे विनाश और मृत्यु की बात करनी पड़ रही है। मुझे उन परिवारों की बात करनी पड़ रही है जो अपने प्रियजनों के घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुझे उन समुदायों की पीड़ा साझा करनी पड़ रही है जो कीचड़, पत्थरों और उफनते पानी के बीच अपने परिजनों के शव खोज रहे हैं—ऐसे शव, जो शायद कभी मिल भी न सकें।

मुझे उन पुलों, सड़कों, विद्यालयों, घरों और आजीविका के साधनों की बात करनी पड़ रही है जो कुछ ही मिनटों में बह गए। सतत विकास लक्ष्यों की ओर बढ़ रहे मेरे देश की विकास यात्रा अचानक रुक गई।

चार सप्ताह पहले दुनिया ने नेपाल के पहाड़ी इलाकों में आई उस भीषण बाढ़ के भयावह दृश्य देखे, जिसे अनेक लोगों ने “हिमालय की सुनामी” कहा। त्रिशूली घाटी की यह त्रासदी केवल नेपाल की स्थानीय आपदा नहीं थी। यह पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी थी।

और आज मैं आप सबसे पूछना चाहता हूँ—क्या हमने सचमुच उस चेतावनी को सुना है?

लगभग तीन वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने स्वयं सागरमाथा (एवरेस्ट) की छाया में खड़े होकर मानवता को जलवायु परिवर्तन के पागलपन और आसन्न विनाश के बारे में चेतावनी दी थी। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी से उठी उस आवाज़ को पर्याप्त गंभीरता से नहीं सुना गया।

नेपाल ने सुना। हमारे समुदायों ने सुना। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने प्रमाणों के साथ उसे बार-बार दोहराया। लेकिन हम राजनीतिक नेतृत्व उस चेतावनी को उस गति और गंभीरता से कार्यरूप में नहीं बदल सके, जिसकी आवश्यकता थी।

पिछले महीने हमने उसकी दुखद कीमत चुकाई।

तेज़ी से गर्म होती जलवायु हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिकी को अस्थिर कर रही है। पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है, पर्वतीय ढलान टूट रहे हैं और हिमस्खलन, भूस्खलन, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।

नेपाल और चीन की सीमा के दोनों ओर इसका विनाशकारी प्रभाव देखा गया। यह बाढ़ नीचे बहते हुए भारत तक पहुँची।

इसने हमें एक बुनियादी सत्य सिखाया है—जलवायु परिवर्तन सीमाएँ नहीं पहचानता। हिमनद और बाढ़ पासपोर्ट या वीज़ा लेकर नहीं चलते।

महामहिमगण,

मैं यहाँ शिकायत करने नहीं, बल्कि कुछ सुझाव रखने आया हूँ।

सबसे पहले, संकट की इस घड़ी में नेपाल की सहायता के लिए आगे आने वाले सभी देशों और संस्थाओं के प्रति मैं नेपाल की ओर से गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।

हमारे पड़ोसी भारत और चीन ने तत्काल और उदार सहायता प्रदान की। संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, मानवीय संस्थाओं, मित्र देशों, परोपकारी संगठनों और दुनिया भर के नागरिकों ने नेपाल के साथ एकजुटता दिखाई।

नेपाल की जनता की ओर से मैं आप सभी का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

आज नेपाल पुनर्वास और पुनर्निर्माण की विशाल जिम्मेदारी उठा रहा है। कम से कम 1,400 लोगों की मृत्यु हुई है और 5,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।

यह भी पढें   लगातार बारिश से बीपी राजमार्ग पूरी तरह बंद, रोशी नदी खतरे के निशान से ऊपर

प्रारंभिक आकलन बताते हैं कि केवल भौतिक पुनर्निर्माण के लिए नेपाल को अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 10 प्रतिशत खर्च करना होगा।

जैसे 2015 के गोरखा भूकंप के बाद दुनिया हमारे साथ खड़ी हुई थी, वैसे ही आज भी हमें आपकी एकजुटता और सहयोग की आवश्यकता है।

लेकिन यह त्रासदी केवल नेपाल की चिंता क्यों नहीं है?

नेपाल दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान देता है। यह संकट हमने पैदा नहीं किया, फिर भी इसकी सबसे बड़ी कीमत हम चुका रहे हैं।

हमारे हिमनद पीछे हट रहे हैं। पहाड़ अस्थिर हो रहे हैं। नदियाँ अप्रत्याशित होती जा रही हैं। हर बड़ी आपदा हमारे वर्षों के विकास प्रयासों को मिटा देने की धमकी देती है।

नेपाल के लिए जलवायु संकट केवल मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि विकास का संकट है।

यह सड़कें, पुल, विद्यालय, खेत, घर और लोगों की आजीविका नष्ट करता है। यह स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक हमारे जलविद्युत ढाँचे को भी नुकसान पहुँचाता है। और यह एक गरीब देश को उस क्षति की भरपाई के लिए ऋण लेने पर मजबूर करता है, जो उसने पैदा ही नहीं की।

लेकिन हम यहाँ किसी देश या महाद्वीप को दोष देने नहीं आए हैं। हम यहाँ जलवायु परिवर्तन को किसी नए भू-राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनाने नहीं आए हैं।

हम यहाँ साझा जिम्मेदारी और वैश्विक एकजुटता की पुनर्पुष्टि करने आए हैं।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले ही “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” के सिद्धांत पर सहमत हो चुका है।

जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से इस संकट में अधिक योगदान दिया है और जिनके पास अधिक क्षमता है, उन्हें अधिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

जलवायु न्याय संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ों तक सीमित कोई सुंदर वाक्य नहीं रह सकता।

हमारे लोगों को अपना अतीत बार-बार पुनर्निर्मित करने के बजाय भविष्य बनाने का अवसर मिलना चाहिए।

महामहिमगण,

हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र लगभग दो अरब लोगों के जीवन का आधार है।

ये पर्वत नेपाल से बहुत दूर रहने वाले लोगों को भी पानी, कृषि, पारिस्थितिकी और आजीविका प्रदान करते हैं।

हिमालय पृथ्वी के किनारे पर स्थित कोई क्षेत्र नहीं, बल्कि पृथ्वी की जीवन-रक्षा प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है।

इसीलिए नेपाल प्रस्ताव करता है कि नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में “हिमालय जलवायु लचीलापन तंत्र” (Himalaya Climate Resilience Mechanism) की स्थापना की जाए।

इस तंत्र के माध्यम से हम—

  • उपग्रह आँकड़े और वैज्ञानिक जानकारी साझा करें,

  • खतरनाक हिमनदीय झीलों की संयुक्त निगरानी करें,

  • सीमापार पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करें,

  • और आपदा आने पर राहत एवं सहायता का समन्वय करें।

आइए हिमालय को विभाजित सूचनाओं की सीमा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनाएँ।

एक अल्पविकसित देश होने के बावजूद नेपाल अपनी पारिस्थितिक जिम्मेदारी से कहीं अधिक योगदान दे रहा है।

हमने अपने लगभग आधे भूभाग में वन क्षेत्र पुनर्स्थापित किया है।

हम स्वच्छ ऊर्जा के लिए जलविद्युत उत्पादन तेज़ी से बढ़ा रहे हैं ताकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो।

यह भी पढें   प्रेम मनुष्य के जीवन का वह आधार है, जिसकी कोई सीमा नहीं : बिमल सरार्फ

हम यूरोप के कई हिस्सों के समान गति से विद्युत वाहनों को बढ़ावा दे रहे हैं।

हम स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन को मजबूत कर रहे हैं और भविष्य की बढ़ती जलवायु आपदाओं का सामना करने के लिए और अधिक प्रयास करेंगे।

लेकिन वैश्विक शासन की विफलता से उत्पन्न इस संकट से अकेला नेपाल नहीं लड़ सकता।

इसलिए मैं इस महासभा से छह शब्दों पर ध्यान देने का आग्रह करता हूँ—

राहत, पुनर्स्थापना, पुनर्निर्माण — और साथ ही जिम्मेदारी, क्षतिपूर्ति तथा लचीलापन।

पहले तीन शब्द आपदा के बाद आवश्यक हैं।

लेकिन अंतिम तीन शब्द यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि आपदाएँ हमारी स्थायी नियति न बन जाएँ।

जब जलवायु आपदा किसी गरीब देश का आधारभूत ढाँचा नष्ट करती है, तो उसका उत्तर केवल नया ऋण या छोटे-छोटे अनुदान नहीं हो सकता।

हमें पर्याप्त अनुदान-आधारित जलवायु वित्त चाहिए।

Loss and Damage Fund, वैश्विक पर्यावरण सुविधा और अन्य वित्तीय तंत्र अभी पर्याप्त नहीं हैं।

जलवायु वित्त ऐसी नौकरशाही भूलभुलैया नहीं बनना चाहिए जिसमें कमजोर देशों को सहायता पाने के लिए वर्षों तक भटकना पड़े।

जब किसी घर में आग लगती है, तब हम परिवार से पचास फ़ॉर्म भरने को नहीं कहते—हम तुरंत मदद करते हैं।

जलवायु न्याय का अर्थ भी यही होना चाहिए।

महामहिमगण,

यह हमें एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाता है—

हम कैसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं?

संयुक्त राष्ट्र का जन्म विश्वयुद्ध की भयावह मानवीय त्रासदी से हुआ था। उसका वादा था कि संप्रभुता का सम्मान होगा, अंतरराष्ट्रीय कानून का अर्थ होगा, हर मानव की गरिमा सुरक्षित होगी और कमजोर राष्ट्रों को शक्तिशाली देशों की इच्छा के आगे झुकना नहीं पड़ेगा।

आज वही व्यवस्था दबाव में है।

बहुत बार सैन्य और आर्थिक शक्ति यह तय करती है कि किसकी आवाज़ सुनी जाएगी और किसके संघर्ष को महत्व मिलेगा।

नेपाल का विश्वास है कि दुनिया को अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

1994 की संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की मानव विकास रिपोर्ट ने मानवीय सुरक्षा की अवधारणा प्रस्तुत की थी।

उसने सुरक्षा को हथियारों से नहीं, बल्कि लोगों और विकास से जोड़ा।

उसने भय और अभाव से मुक्ति के लिए शांति लाभांश (Peace Dividend) का आह्वान किया।

इस वर्ष मार्च में हमारे इतिहास के सबसे निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव से बनी नई बहुमत सरकार को अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

जब नेपाल की एक गरीब किसान महिला मानसून में बीज बोना चाहती थी, तब समय पर खाद उपलब्ध नहीं हुई।

जब हमें नए राजमार्गों के लिए भुगतान करना था, तब संसाधन उपलब्ध नहीं थे।

दोष किसी और का था, लेकिन दंड गरीब जनता को मिला।

अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें समय पर पहुँच जाती हैं। हथियार और गोला-बारूद सीमाएँ बिना बाधा पार कर लेते हैं।

लेकिन नेपाल का किसान आवश्यकता के समय बाज़ार मूल्य पर खाद या ईंधन भी नहीं खरीद पाता।

हमने ऐसा संसार बना लिया है जहाँ युद्ध की आपूर्ति व्यवस्था त्रुटिहीन है, लेकिन भोजन और जीवन की आपूर्ति व्यवस्था टूटी हुई है।

और यह केवल नेपाल की कहानी नहीं है।

बांग्लादेश से पूछिए। भूटान से पूछिए। भारत, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका से पूछिए।

यह भी पढें   रसुवा की भोटेकोशी बाढ़: लापता लोगों के परिजनों का माइतीघर में प्रदर्शन

आपको एक जैसी कहानी सुनाई देगी।

हम उस जलवायु परिवर्तन से पीड़ित हैं जिसे हमने पैदा नहीं किया, और उन युद्धों से भी जिनकी शुरुआत हमने नहीं की।

यह हमें बताता है कि वैश्विक सहयोग की व्यवस्था में हमारी कल्पना से कहीं अधिक गहरी खामियाँ हैं।

महामहिमगण,

मुझे बताया गया है कि इस वर्ष इस महासभा को संबोधित करने वाला मैं सबसे युवा सरकार प्रमुख हूँ।

मैं इसे व्यक्तिगत कहानी बनाने नहीं आया हूँ।

मैं केवल इतना सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि इस मंच से एक बात स्पष्ट रूप से कही जाए—

जो देश कीमत चुकाने को तैयार है, उसे आवश्यक वस्तुएँ खरीद पाने का अधिकार भी होना चाहिए।

यदि दुनिया 72 घंटों के भीतर कहीं भी हथियार पहुँचा सकती है, तो किसी किसान तक उसके जीवनयापन के साधन पहुँचाने में असफल होने का कोई नैतिक औचित्य नहीं हो सकता।

इसीलिए हम बहुपक्षवाद में विश्वास करते हैं।

इसीलिए हमें ऐसा संयुक्त राष्ट्र चाहिए जहाँ छोटे और गरीब देशों की उपस्थिति केवल औपचारिक न हो, बल्कि प्रभावशाली भी हो।

जलवायु न्याय केवल धन का प्रश्न नहीं है।

यह वितरणात्मक न्याय का प्रश्न है—लागत कौन वहन करेगा?

यह प्रक्रियात्मक न्याय का प्रश्न है—निर्णय प्रक्रिया में किसकी आवाज़ सुनी जाएगी?

और यह भी कि पर्वतीय समुदायों, छोटे द्वीपीय देशों, भू-आवेष्ठित देशों, अल्पविकसित देशों और आने वाली पीढ़ियों को समान महत्व मिलेगा या नहीं।

कल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होने वाले “सगरमाथा से समुद्र तट तक” (Sagarmatha to Seaside) कार्यक्रम के माध्यम से नेपाल इस वैश्विक संवाद का नेतृत्व करने के लिए तैयार है।

माननीय अध्यक्ष महोदय, महामहिमगण,

हम आज इस महासभा में गहरी वैश्विक अनिश्चितता के दौर में खड़े हैं।

नेपाल की नई लोकतांत्रिक जनादेश वाली सरकार नई पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है।

हमारे युवाओं ने ईमानदारी, जवाबदेही और परिवर्तन की राजनीति की मांग की है।

यह केवल नेपाल की कहानी नहीं है।

यह पूरी दुनिया में संघर्ष, असमानता और अवसरों की कमी के विरुद्ध उठ रही नई पीढ़ी की आवाज़ का हिस्सा है।

मेरी सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट है—

ऐसा राज्य बनाना जो सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और प्रत्येक नेपाली को अपने ही देश में आगे बढ़ने का न्यायपूर्ण अवसर प्रदान करे।

नेपाल की बाढ़ ने उस भविष्य की झलक दिखाई है जिसे जलवायु परिवर्तन और अधिक चरम बना सकता है।

अब हमारी पुरानी व्यवस्थाएँ पर्याप्त नहीं हैं।

हमें तदर्थ प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर तैयारी की संस्कृति अपनानी होगी।

आइए—

  • जलवायु लचीलेपन में निवेश करें,

  • बीमा और नवाचार को बढ़ावा दें,

  • मजबूत आधारभूत ढाँचे और संस्थाएँ बनाएँ,

  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाएँ,

  • समय पर चेतावनी देने और जीवन बचाने वाली प्रणालियाँ विकसित करें,

  • और ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाएँ जो सबसे कमजोर लोगों को सबसे कमज़ोर न छोड़े।

और जब विश्व की सबसे ऊँची चोटी से अगली चेतावनी आए, तो आइए हम उसे सुनने और उस पर कार्रवाई करने के लिए तैयार रहें।

भगवान पशुपतिनाथ समस्त विश्व का कल्याण करें।

यह संसार भगवान बुद्ध द्वारा दिखाए गए शांति और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़े।

बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्ते।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com