आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति लोकतंत्र के लिए घातक : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल27 सितम्बर 2026 । लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच विचारों का मतभेद स्वाभाविक है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का अपना-अपना दायित्व होता है। लेकिन जब राजनीति जनहित के मुद्दों से हटकर एक-दूसरे पर आरोप लगाने और दोष मढ़ने तक सीमित हो जाती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता को होता है।
आज राजनीतिक बहस में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और सामाजिक सरोकार जैसे महत्वपूर्ण विषयों की जगह आरोप-प्रत्यारोप अधिक दिखाई देने लगे हैं। एक दल दूसरे पर आरोप लगाता है और दूसरा दल उसका जवाब आरोपों से ही देता है। इससे जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाते हैं।
विपक्ष का काम सरकार की कमियों को सामने लाना और सरकार का दायित्व अपने कार्यों का तथ्यपूर्ण जवाब देना है। स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों और मर्यादा के साथ होनी चाहिए। व्यक्तिगत आरोप, कटु भाषा और बिना प्रमाण के आरोप लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करते हैं।
राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। राजनीतिक दल यदि आरोप-प्रत्यारोप की जगह स्वस्थ संवाद, सकारात्मक बहस और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता दें, तो लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा।
जनता भी राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा करती है कि वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय देश और समाज को बेहतर बनाने की दिशा में प्रतिस्पर्धा करें। लोकतंत्र की असली जीत किसी दल की हार या जीत में नहीं, बल्कि जनता के हित और विश्वास की रक्षा में है।



