दशहरा नजदीक है,लोग रोजगार की तलाश में भारत जा रहे
दशहरा नजदीक है। गाँव-घर में परिवार के साथ पर्व मनाने की तैयारियाँ चल रही हैं। लेकिन सुदूरपश्चिम के गौरीफंटा नाके पर तस्वीर कुछ अलग है। कुछ लोग इसी नाके से रोजगार की तलाश में भारत जाना शुरू कर चुके हैं।
भारत जाने वालों के हाथ में कोई बड़ा सामान नहीं है। एक छोटा-सा बैग है। उसी बैग के साथ परिवार का खर्च, कर्ज, बच्चों की पढ़ाई और घर चलाने की जिम्मेदारी उठाए वे पर्व के मौके पर भी भारत जा रहे हैं।
दशहरे के समय घर छोड़कर भारत जाना उनकी इच्छा नहीं, बल्कि देश में रोजगार नहीं मिलने के कारण उनकी मजबूरी है।
बाजुरा के हिमाली गाउँपालिका-3 के दिनेश थापा इस बार दशहरे पर घर नहीं रह पाए। वह रोजगार के लिए भारत गए हैं। घर में माता-पिता, पत्नी और बच्चे हैं। खेती से पूरे साल परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होने के बाद उन्होंने भारत जाने का फैसला किया।
सुदूरपश्चिम के पहाड़ी जिलों और भारत के बीच रोजगार के लिए आवागमन का पुराना संबंध रहा है। यहाँ के लोग रोजगार के लिए भारत के विभिन्न शहरों में जाकर निर्माण कार्य, होटल, सुरक्षा गार्ड, कारखानों, चौकीदारी से लेकर घरेलू काम तक करते हैं।
भारत जाने वाले कुछ लोग वर्षों से इसी चक्र में फँसे हुए हैं। कुछ महीने गाँव में रहना, खेती करना और फिर रोजगार के लिए भारत चले जाना—उनकी जिंदगी में वर्ष बदल जाते हैं, लेकिन रोजगार का गंतव्य नहीं बदलता।
दशहरा उनके लिए और भी कठिन समय होता है। जब घरों में पर्व का माहौल होता है, तब वे परदेश जाने के रास्ते पर होते हैं। सुदूरपश्चिम से भारत जाने वाले लोगों की निश्चित संख्या का आँकड़ा सरकार के पास नहीं है। खुली सीमा के कारण रोजगार के लिए भारत जाने वाले नेपाली नागरिकों की संख्या का रिकॉर्ड रखना कठिन है। हालांकि, हर वर्ष बड़ी संख्या में सुदूरपश्चिम के लोग भारत जाते हैं।
कैलाली के धनगढी स्थित त्रिनगर भंसार नाके के उस पार भारत का गौरीफंटा नाका उनके प्रमुख प्रवेश द्वारों में से एक है। इसके अलावा कंचनपुर का गड्डाचौकी नाका, बैतडी का झुलाघाट नाका और दार्चुला के नाके से भी बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए भारत जाते हैं।
भारत जाने वाले कई युवाओं के परिवार कर्ज में हैं। किसी के बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं तो किसी को घर बनाने या जमीन खरीदने के लिए लिया गया कर्ज चुकाना है। इसलिए दशहरे के मौके पर घर छोड़ते समय उनके लिए पर्व मनाने से अधिक महत्वपूर्ण कमाई है।
भारत जाने वालों के लिए दशहरे की खुशी भी कमाई से जुड़ी है। वे परदेश जाकर पैसा कमाते हैं और उसी पैसे से घर में दशहरा मनाया जाता है। किसी के घर में नए कपड़े पहुँचते हैं, किसी के बच्चों की फीस चुकाई जाती है तो किसी के घर के कर्ज की किस्त जमा होती है। इसलिए उनके लिए परदेश की कमाई ही परिवार के पर्व का आधार बन जाती है।
भारत जाने वाले श्रमशक्ति को स्वदेश में ही रोकने के लिए उत्पादन और रोजगार के अवसर पैदा करना आवश्यक है। बड़ी संख्या में भारत से नेपाली श्रमिक वापस लौटते हैं, लेकिन उन्हें तत्काल रोजगार से जोड़ने की कोई ठोस योजना सरकार के पास नहीं है।
स्थानीय तह और प्रदेश सरकारें भारत से लौटे तथा रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं को कृषि, उद्योग, पर्यटन और स्वरोजगार से जोड़ने के कार्यक्रम लाने का दावा करती रही हैं। प्रदेश और स्थानीय सरकारें यहाँ रोजगार पैदा करने में विफल रही हैं, जिसके कारण पर्व के मौके पर भी युवाओं को इस तरह भारत जाने के लिए मजबूर होना दुखद है।

