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राष्ट्रीय सरस मेला-2026: एक दृष्टि में : गौरीशंकर वैश्य

 

राष्ट्रीय सरस मेला-2026

भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, और गाँवों की सबसे जीवंत अभिव्यक्ति वहाँ के कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों और स्वयं सहायता समूहों (SHG) की महिलाओं के हाथों में दिखती है। इसी ग्रामीण प्रतिभा को शहरी बाज़ार और राष्ट्रीय मंच देने वाला आयोजन है ‘सरस मेला’। इस वर्ष आंध्र प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी विजयवाड़ा का पुन्नमी घाट इसी कारण चर्चा में है। यहाँ राष्ट्रीय सरस मेला-2026 चल रहा है।

 

राष्ट्रीय सरस मेला-2026: एक दृष्टि में

 

ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने आंध्र प्रदेश की ग्रामीण निर्धनता उन्मूलन सोसाइटी (SERP) के सहयोग से इस मेले का आयोजन किया है। यह 13 से 31 अक्टूबर 2026 तक विजयवाड़ा (आंध्रप्रदेश) के पुन्नमी घाट पर चलेगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पहली बार यह राष्ट्रीय मेला दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र से बाहर आयोजित हो रहा है। इस दृष्टि से विजयवाड़ा का चयन एक प्रतीकात्मक और नीतिगत बदलाव है। अब राष्ट्रीय स्तर के ग्रामीण उद्यम मंच केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहेंगे।

 राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और राज्यपाल अब्दुल नज़ीर ने 15 अक्टूबर की सुबह पुन्नमी घाट पर मेले का उद्घाटन किया। राष्ट्रपति ने महिला एवं बाल विकास विभाग सहित कई स्टालों का भ्रमण भी किया।

 

सहभागिता और स्वरूप:

 

मेले में 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 1,500 से अधिक SHG महिलाएँ भाग ले रही हैं। पारंपरिक हथकरघा, हस्तशिल्प, जैविक उत्पादों, योग और घरेलू सामान के लिए 650 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं। मीनाकारी, ढोकरा, पीतल का काम, काष्ठ शिल्प और पारंपरिक चित्रकला जैसे शिल्प प्रदर्शित हैं। इनके साथ जीवंत शिल्प प्रदर्शन, हथकरघा बुनाई और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे। 50 स्टालों वाले इंडिया फूड कोर्ट में देश भर के क्षेत्रीय व्यंजन परोसे जाएँगे।25 समर्पित संकुल स्तरीय संघ (सीएलएफ) द्वारा दीदियों की संस्थागत यात्राएं, सामूहिक व्यवसाय माडल, उद्यम की सफलता की कहानियां, आजीविका संबंधी पहलें एवं महिलाओं के सामाजिक आर्थिक सशक्तीकरण के परिणाम आदि प्रदर्शन प्रस्तुत किए गए हैं। सरस मेले में एक ही छत के नीचे आत्मनिर्भर भारत, वोकल फार लोकल और महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण विकास का उत्सव दृष्टव्य है।

लखपति दीदी मंडप:

मेले का एक प्रमुख आकर्षण ‘लखपति दीदी पवेलियन’ है। यह कौशल और सामूहिक भागीदारी से उद्यम, बाज़ार तक पहुँच और स्थायी आय की ओर बढ़ती महिलाओं की यात्रा को दर्शाता है। पुन्नमी घाट पर ‘शक्ति – द स्पिरिट ऑफ लखपति दीदी’ नामक 16 फुट ऊँची कलाकृति केंद्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित है।

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डिजिटल आयाम:

सरस आजीविका गैलरी’ और eSARAS डिजिटल मंच के माध्यम से महिला उद्यमी भौतिक आयोजन से आगे बड़े बाज़ारों तक पहुँच सकेंगी। इस आयोजन को नाबार्ड और NIRDPR जैसे सरकारी साझेदारों का समर्थन प्राप्त है। मेला दशहरा शरन्नवरात्रि उत्सव और विजयवाड़ा उत्सव 2.0 के साथ आयोजित हो रहा है। इससे उत्सवी माहौल में अधिक दर्शक और खरीदार जुड़ने की संभावना बढ़ती है। आंध्र प्रदेश के संदर्भ में इसका उद्देश्य DWCRA महिलाओं के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना भी बताया गया है।

 

‘सरस’ मेला क्या है और यह कब शुरू हुआ?

 

‘सरस’ (SARAS) का पूर्ण रूप *Sale of Articles of Rural Artisans Society* है। आपने जिस अर्थ में पूछा, वही इसका भावार्थ है: ग्रामीण कारीगरों की वस्तुओं की बिक्री के लिए बना मंच। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय की पहल है, जो ग्रामीण उत्पादकों और कारीगरों को प्रदर्शनियों के माध्यम से अपने उत्पाद बेचने का मंच देती है।

     इसकी शुरुआत के बारे में एक विकास-क्षेत्र विशेषज्ञ के आलेख के अनुसार सरस मेले 1999 में शुरू हुए। इसका मूल विचार ग्रामीण कारीगरों का शहरी उपभोक्ताओं से सीधा संवाद कराना था। इसी सोच से दिल्ली हाट जैसे कुछ स्थायी स्थान भी बनाने के प्रयास हुए, जहाँ कारीगर साल भर बारी-बारी से अपने उत्पाद दिखा सकें। समय के साथ यह प्रयोग राज्यों तक फैला। बिहार की जीविका, पंजाब, नागालैंड और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थानीय सरस मेले लगने लगे। नागालैंड के कोहिमा में इसी वर्ष मार्च में छह दिवसीय सरस मेला हुआ, जिसमें SHG की भागीदारी रही। आज यह मेला केवल बिक्री-स्थल नहीं रहा। यह ग्रामीण संस्कृति का उत्सव है, उद्यमिता का प्रशिक्षण-मंच है, और अब डिजिटल बाज़ार से भी जुड़ चुका है।

 

 सामूहिक उद्यम के विकास में योगदान

 

 सरस मेले का संचालन औपचारिक रूप से सहकारी समितियों के ढाँचे पर नहीं, बल्कि DAY-NRLM (दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से होता है। फिर भी इसकी भावना सहकारिता के मूल सिद्धांतों से गहराई से जुड़ी है: स्वैच्छिक सदस्यता, लोकतांत्रिक नियंत्रण, आर्थिक साझेदारी और सामूहिक आत्मनिर्भरता। योगदान को इन बिंदुओं में समझा जा सकता है:

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1. सामूहिकता की संस्कृति को बल:

SHG की महिलाएँ बचत, ऋण और उत्पादन साझा करती हैं। मेले में उनका सामूहिक प्रदर्शन इस मॉडल की सफलता दिखाता है और नए समूहों को प्रेरित करता है।

2.बिचौलियों से मुक्ति:

मेले में उत्पादक सीधे उपभोक्ता से मिलते हैं। eSARAS के संदर्भ में यह मंच SHG को सीधे बेचने की सुविधा देकर बिचौलियों पर निर्भरता घटाता है और आय के अवसर बढ़ाता है। सहकारिता का मूल उद्देश्य भी उत्पादक को उसके श्रम का उचित मूल्य दिलाना है।

3. ग्राम-स्तरीय संस्थाओं से बाज़ार तक सेतु:

SHG से ग्राम संगठन, क्लस्टर फेडरेशन और उत्पादक समूह (Producer Groups/FPO) तक की सीढ़ी में सरस मेला बाज़ार-परीक्षण का काम करता है। उत्पाद की माँग, मूल्य, पैकेजिंग और गुणवत्ता की जानकारी यहीं मिलती है।

4.क्षमता निर्माण:

पैकेजिंग, उत्पाद विकास, व्यवसाय योजना और डिजिटल मार्केटिंग जैसे विषयों पर प्रशिक्षण की ज़रूरत इन मेलों में साफ़ दिखती है। विशेषज्ञ भी इन्हीं क्षेत्रों में प्रशिक्षण की आवश्यकता रेखांकित करते हैं।

5.राज्यों के बीच सहकारी संघवाद:

यह मेला केंद्र के मंत्रालय और राज्य की संस्था (SERP) की साझेदारी से बना है। इसमें 30 से अधिक राज्यों की भागीदारी है। यह केंद्र-राज्य सहयोग और राज्यों के आपसी आदान-प्रदान का अच्छा उदाहरण है।

6.कौशल और संस्थागत सहयोग:

नाबार्ड और NIRDPR जैसी संस्थाओं की भागीदारी से वित्त, प्रशिक्षण और अनुसंधान का समन्वय बनता है। इससे ग्रामीण समूहों को टिकाऊ संस्थागत सहारा मिलता है।

     इस प्रकार सरस मेला ‘सहकार से समृद्धि’ की भावना को व्यवहार में उतारने वाला एक मंच है। यह औपचारिक सहकारी ढाँचे का विकल्प नहीं, पूरक है।

 

सरस मेले और ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य

 

विकसित भारत @2047 का सपना तभी पूरा होगा जब विकास का लाभ गाँव और महिला तक पहुँचे। सरस मेले इस दिशा में कई तरह से योगदान दे सकते हैं।

 

1.महिला-नेतृत्व वाला विकास:

लखपति दीदी अभियान का लक्ष्य SHG महिलाओं को प्रति वर्ष कम से कम एक लाख रुपये की स्थायी आय तक पहुँचाना है। मेले में बिक्री, ब्रांडिंग और आत्मविश्वास, तीनों इस लक्ष्य को आगे बढ़ाते हैं। विजयवाड़ा में लखपति दीदी मंडप इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ दर्शक महिलाओं से उनकी यात्रा सीधे सुन सकते हैं।

2. आत्मनिर्भर भारत और ‘वोकल फॉर लोकल’:

हस्तशिल्प, हथकरघा और जैविक उत्पादों की माँग बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मज़बूत होती है। पारंपरिक कलाएँ संरक्षित रहती हैं, और आयात पर निर्भरता घटती है।

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3. शहरी-ग्रामीण खाई पाटना:

शहरी उपभोक्ता को प्रामाणिक वस्तुएँ मिलती हैं, और गाँव को सीधा नकद बाज़ार। इससे ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

4.डिजिटल समावेशन:

eSARAS का ONDC और UMANG जैसे मंचों से जुड़ना ग्रामीण उद्यमियों को ई-कॉमर्स के बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनाता है। मेला उन्हें डिजिटल बिक्री की पहली सीख देता है।

5. सांस्कृतिक एकता और पर्यटन:

 विभिन्न राज्यों के शिल्प और व्यंजन ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को पुष्ट करते हैं। मेले स्थानीय पर्यटन और सेवा क्षेत्र के रोज़गार भी बढ़ाते हैं।

6. वित्तीय समावेशन और आत्मनिर्भरता:

बिक्री से होने वाली आय बचत, ऋण-वापसी और पुनर्निवेश का चक्र मज़बूत करती है। इसी तरह छोटे उद्यम बढ़कर सूक्ष्म और लघु उद्योग बन सकते हैं।

 

 चुनौतियाँ और आगे का रास्ता

 

मेले की सफलता को स्थायी बनाने के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना होगा:

-मौसमी बिक्री से आगे: केवल मेलों पर निर्भरता की जगह साल भर चलने वाले बाज़ार चाहिए, जैसे स्थायी हाट, ऑनलाइन मंच और संस्थागत ख़रीद।

-गुणवत्ता और मानकीकरण:पैकेजिंग, लेबलिंग, खाद्य सुरक्षा मानक और GI/ब्रांड पहचान से उत्पाद की साख बढ़ेगी।

-लॉजिस्टिक्स और भुगतान:कुरियर, भंडारण और डिजिटल भुगतान की सुविधा ज़रूरी है।

-मार्केट लिंकेज के बाद फॉलो-अप: मेले में मिले ऑर्डर और संपर्कों को निरंतर व्यापार में बदलने के लिए सहायता तंत्र चाहिए।

-उत्पादक संगठनों का सुदृढ़ीकरण:SHG को FPO और उत्पादक सहकारी संस्थाओं से जोड़ने पर बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था संभव होगी।

 

निष्कर्षतः, राष्ट्रीय सरस मेला-2026 केवल एक प्रदर्शनी नहीं है। यह उस भारत की झलक है जहाँ गाँव की महिला उत्पादक भी है, उद्यमी भी, और ब्रांड-निर्माता भी। दिल्ली-एनसीआर से बाहर विजयवाड़ा में इसका पहला आयोजन यह संकेत देता है कि ग्रामीण उद्यमिता को पूरे देश के स्तर पर प्रोत्साहन मिलेगा। लगभग ढाई दशक पुरानी सरस परंपरा अब हाट से डिजिटल मंच तक पहुँच चुकी है। यदि इसे प्रशिक्षण, गुणवत्ता, सहकारी संगठन और साल भर के बाजार से जोड़ा जाए, तो यह विकसित भारत की नींव में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक शक्ति जोड़ने वाला मजबूत साधन बन सकता है।

-गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर

लखनऊ 226022

दूरभाष 09956087585

ईमेल – gsvaish51@gmail.com

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