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कैसी शिक्षा ? किसके लिए ?

 

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’
लोकतन्त्र पुनस्र्थापना के बाद यह प्रश्न कितना विचित्र लगता है । उत्तरदायी कौन ? शिक्षक ? शिक्षाविद् ? देश के नेता या फिर सरकार या हम सब ? प्रश्न विचारणीय हैं । एक ओर शिक्षा, ज्ञान–प्रज्ञा, विज्ञान और तकनीक का विश्वव्यापी माहौल, दूसरी ओर रोजगार के लिए जूझती हमारी युवा पीढ़ी और भारी बस्तों से झुकी नन्हें बालकों की गर्दन– अमानवीय व्यवहार के अतिरिक्त क्या दे पाये हैं हम इन्हें ? और उम्मीदें ?
डिग्रिंया संभाले बेकार नवयुवक, मैरिट लिस्ट में टॉपर्स नवयुवक, भाई–भतीजावाद और नौकरियों में रिश्वत के व्यापार के आगे हताश, क्या होगा इनका ? क्या है देश का वर्तमान ? क्या होगा इसका भविष्य ? प्रश्न ज्वलंत है, जबाव मांगता है ।
यह कैसी विडंबना है कि एक ओर इस देश में लाखों बच्चें हैं, जो अक्षर ज्ञान को तरस रहे हैं तो दूसरी ओर वे ‘बेचारे’ बच्चे भी बड़ी संख्या में हैं, जो होश संभालने से पहले ही ज्ञान का बोझ ढोने के शापित हैं । आज जगह जगह वे नर्सरी स्कूल उभर आए हैं, जो ठोंक पीटकर ‘जॉनी, जॉनी नो पापा’ गानेवाले और ‘ए.बी.सी.डी.’ और ‘वन टू थ्री फोर’ बिना जाने रटने वाले बच्चों की फसल तैयार कर रहे हैं । यह बेमौसम की सारी तैयारी इन गरीबों को उन दामी स्कूलों में ठूंसने के लिए है, जिनमें प्रवेश के लिए भारी मारामारी है और जिनमें घुस कर इनका जीवन संवरना है । लिहाजा इनके हिस्से में खेलकूद के बदले यह तोतारटंत ही आयी है ।

महानगरों की देखादेखी यह ‘फैशन’ शहरों से उतरता हुआ कस्बों में भी आ पहुँचा है और अपने–अपने बच्चों को छोटी–से–छोटी उम्र में अल्फाबेट और नर्सरी ‘पोइम्स’ में महारत हासिल कराने की जैसे होड़ सी लग गयी है । ऐसे में सबेरे–सबेरे जल्दी–जल्दी दूध ठंूस कर, पॉटी से निपट, ठंडे–गरम पानी में डूबाया यह एक हकबकाया–सा बच्चा कुछ सीख भी रहा है, इसे जानने की फुरसत या जरुरत भी किसी को नहीं है । इस कच्ची उम्र में रखी यह रकाब फिर भारी और भारी होती जाती है । बस्ते की किताबें भी बढ़ती है और होमवर्क के घंटे भी । इनके साथ जुड़े हैं नंबरों और रैंक के चाबुक । क्योंकि छोटी उम्र से ही अगर बच्चे को यह अहसास न दिलाया गया कि उसे आगे रहना है तो वह आगे आएगा कैसे ? और फिर आती है ‘स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट’ की परीक्षा जो ‘खुल जा सिमसिम’ के मायामंत्र की तरह तिलिस्मी दुनिया का पूरा जादू जगानेवाली है । लिहाजा ‘कोचिंग’, ‘नीमा गेसपेपर’, ‘ओल्ड इज गोल्ड’, ‘सोपान’, ‘क्वेश्चन बैंक’ आदि का अखंड पाठ शुरु । रहा ज्ञान ! तो तौबा कीजिए ! किसे फुरसत है समझने की और किसके पास वक्त है समझाने का । जिस मुर्ख ने अपनी बुद्धि के इस्तेमाल की हिमाकत की उसका बेड़ा गर्क ! रटो और रटते रहो और इम्तहान के दिन इत्मीनान से पूरा–का–पूरा अपनी कॉपी पर उगल आओ । जितनी सफाई और होशियारी से यह करोगे, उतने ही बुद्धिमान समझे जाओगे, नंबर पाओगे और मनचाहा कॉलेज और विषय पाओगे । पर कॉलेज और विषय पाकर भी वैतरणी पार कहां लगती है । उसके बाद तो उस पार दीखते वे मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिन तक कैंपिटेशन नहीं, डोनेशन की नैया पहुचा सकती है । अगर पिताजी के पास १० लाख हैं, तो आप जरुर इंजीनियर और ६० लाख हैं तो डॉक्टर बन सकते हैं या फिर ९८ प्रतिशत अंक ले आइए । तब कोई संभावना है । यानी मतलव घुमा–फिरा कर वही कि जिनके पास पैसा है या रुतवा है वे अपने बच्चों के लिए स्कूल, कॉलेज, शिक्षक, शिक्षा सब कुछ खरीद कर ला सकते हैं और फिर वे बच्चे उस शिक्षा को हासिल कर उस पैसे को दोगुना, चौगुना, अठगुना दुह सकते हैं ।
ध्यातव्य है कि इस वर्ष काठमांडू मेडिकल कॉलेज, नेपाल मेडिकल कॉलेज, चितवन मेडिकल कॉलेज, भरतपुर मेडिकल कॉलेज, नेपालगंज मेडिकल कॉलेज, युनिवर्सल, नोबेल एवं किष्ट मेडिकल कॉलेजों ने ६० लाख तक शुल्क लेकर नामांकन करवा रहे हैं (गोरखापत्र, २५ कार्तिक, २०७३) । जबकि पिछले वर्ष नेपाल सरकार ने काठमांडू उपत्यका में ३५ लाख, काठमांडू बाहर के कॉलेजों में ३८ लाख और डेन्टल कोर्स के लिए २० लाख शुल्क निर्धारित की थी ।
‘प्लस टू’ उत्तीर्ण करने के पश्चात् हजारों विद्यार्थी ‘स्टुडेन्ट वीसा’ में विभिन्न मुल्कों में जाते हैं । शिक्षा मन्त्रालय के अनुसार वित्त वर्ष २०७२÷०७३ में ३२ हजार ४८२ विद्यार्थियों ने वैदेशिक शिक्षा हेतु ‘नो ऑब्जेक्सन’ लेटर ले चुके हैं । ‘नो ऑब्जेक्सन लेटर’ लेनेवाले भी वही है जो पैसेवाले हैं । नेपाल में विश्वविद्यालयों की संख्या ९ हैं । इन सभी विश्वविद्यालयों में ४६ विधाओं में स्नातक स्तर तक अध्ययन–अध्यापन होता है ।
स्नातक स्तरों में ‘बैंचलर इन बिजनेश एडमिनिस्ट्रेशन (बीबीए), बैचलर इन हस्पिटालिटी मैनेजमेन्ट (बीएचएम), बैचलर इन हेल्थ केयर मैनेजमेन्ट (बीएचसीएम), बैचलर ऑफ साइन्स इन इन्फॉर्मेसन टेक्नोलॉजी (बीएसआइटी), बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (बीटेक), बैचलर ऑफ साइन्स इन इन्फॉर्मेसन टेक्नोलॉजी मैनेजमेन्ट (बीएसआईटीएम), बैचलर इन ट्राभल एण्ड टुरिज्म (बीआईटीटी) विषयों का अध्ययन हो रहा है । ये सभी नवीन कोर्स हैं । इनमें भी वही विद्यार्थी अध्ययन करते हैं, जो पैसेवाले हैं । इन विषयों में दलित, गरीब, मुसलिम, सीमान्तकृत आदि विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की कुछ भी व्यवस्था नहीं है ।
इस तरह पैसेवाले और गरीबों के बीच का अंतर और बढ़ता एवं गहराता जा रहा है । पहले शिक्षा पैसोवालों की बांदी नहीं थी । अब धीरे–धीरे वह भी उनकी ही बपौती बनती जा रही है । यह स्थिति गम्भीर ही नहीं भयावह है ! विस्फोटक है ।
मगर इसकी ओर ध्यान देने की फुरसत उन हमारे नेताओं को कहाँ है जो येनकेन प्रकारेण अपनी टोपी और कुरसी की ही चिंता में डुबे रहते हैं । राजनीति को तो उन्होंने भ्रष्टाचार की घोर दलदल में धंसा ही दिया । अब इस दलदल में धीरे–धीरे समूची व्यवस्था भी डूबती जा रही है । इसी सर्वव्यापी भ्रष्टाचार ने शिक्षा व्यवस्था को भी धुंधला रखा है और शिक्षार्थी को भी । मूल्यहीनता इस पीढ़ी का पर्याय बन गयी है, क्योंकि उनके सामने कोई नायक नहीं है, जिसे देखकर उनके मन में कुछ करने की ललक जगे, कुछ करने की उत्कंठा हो ।
एक दुखद तथ्य यह भी है कि व्यक्ति जितना अधिक शिक्षा प्राप्त होता जाता है उसके लिए रोजगार के अवसर उतने ही कम होते जाते हैं । लोकतन्त्र पुनस्र्थापना पश्चात् नेपाल में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ी है । इनमें स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक के शिक्षित बेरोजगार शामिल हैं । यह संख्या दिन–प्रति–दिन बढ़ती जा रही है ।
दुर्भाग्यवश हमारे राजनेता युवाओं के आक्रोश का इस्तेमाल अपनी असीमित महत्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने में ही करते रहे हैं । अधिकांश छात्र संगठन भी अपना कोई निजी स्वरूप बनाने के बजाय राजनीतिक दलों की भद्दी नक्कल भर बन कर रह गये हैं । बरना शायद उनमें से किसी को यह होश आता कि हर वर्ष बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को लेकर कोई मुहिम चलाये और उसे देशव्यापी रूप में अपना आक्रोश व्यक्त करे जैसे उसने पीछले वर्ष त्रिभुवन विश्वविद्यालय में सेमेस्टर प्रणाली के मुद्दे पर किया था । इस ओर कोई राजनेता तो उनका ध्यान दिलाने से रहा क्योंकि हर बार चुनावी मसौदों में सबको रोजगार मुहैया कराने के उनके झांसे जो इससे खुल जाएंगे ।
जरुरत इस बात की है कि जीवनावश्यक शिक्षा और रोजगार संबंधी शिक्षा को बिलकुल अलग–अलग किया जाये । दसवीं तक शिक्षा में विज्ञान, इतिहास, भूगोल, गणित, भाषाएं एवं साहित्य हों । और इसके बाद की शिक्षा सिर्फ उनके लिए तो जो किसी विशेष क्षेत्र जैसे चिकित्सा, इंजीनियरिंग, पत्रकारिता, शिक्षण, कला आदि में आगे बढ़ना चाहते हों । इन विभिन्न पेशों से जुड़ी शिक्षा के लिए छात्रों का चुनाव उनके दसवीं के अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी रुचियों के परीक्षण (एप्टीट्यूड टेस्ट) के आधार पर होना चाहिए । दो वर्ष का समय उन्हें इस क्षेत्र विशेष से परिचित कराने के लिए पर्याप्त होगा और उसके बाद वे उसमें विशेष योग्यता प्राप्त कर सकेंगे । तकनीकी योग्यताओं और अन्य हस्तकलाओं आदि के प्रशिक्षण के लिए दसवीं तक की पढ़ाई पर्याप्त है । इनका अगला प्रशिक्षण उस क्षेत्र में होना चाहिए, जिसमें वे आगे काम करना चाहें । जैसे खेती के इच्छुक किसान को वह प्रशिक्षण मिले जो उसे खेती के आधुनिकतम तरीकों से परिचित कराये और व्यावहारिक तौर पर मददगार हो ।
वर्तमान में क्लर्क उपजाने के लिए गढ़ी गयी इस शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन की अपेक्षा है । और यह परिवर्तन वातानुकूलित भवनों में बैठकर नौकरशाहों द्वारा नहीं होना चाहिए, जो समितियों पर समतियां गठित करते और एक से एक खूबसूरत और दर्शनीय शहर में उनकी मीटिंगे आयोजित करते रहते हैं और किसी नतीजे पर नहीं पहुँचते । इन समितियों में वे शिक्षक होने चाहिए, जो इन बच्चों से हर रोज दो–चार होते हैं और जिनकी मुश्किले ये समितियां हमेशा बढ़ाती रहती हैं । इनमें वे अभिभावक होने चाहिए, जिनकी बात कोई न सुनता है न सुनना चाहता है और वे हाल में तालीमयाफ्ता विद्यार्थी होने चाहिए जो जानते हैं कि शिक्षा के नाम पर उन्होंने क्या भुगता है और उससे कैसे बचा जा सकता है ।
मगर इस स्थित तक पहुँचने की पहली शर्त होगी, शिक्षा के अर्थ की पुनव्र्याख्या । शिक्षा का अर्थ शिक्षण नहीं अध्ययन है और उसका केन्द्र अध्यापक नहीं विद्यार्थी है । यह बात हम लगभग भूल चुके हैं । यह न सिर्फ याद करनी होगी, बल्कि उस व्यक्ति को केन्द्र में वापस लाना होगा, जिसके लिए यह समूची शिक्षा व्यवस्था है । इतना ही नहीं यह भी फिर से सोचना होगा कि इस शिक्षा का उद्देश्य क्या है ? व्यक्ति का विकास या व्यवस्था का ? एक बहुत बढ़िया कार्टून बनानेवाला बच्चा, जिसमें कार्टूनीस्ट बनने की पूरी संभावना थी, ठोंक–पीट कर साईंस पढ़ने पर मजबूर किया जाता है और वहाँ अच्छा प्रदर्शन न करने पर नाकारा, नालायक कहा जाता है, तो दोष किसका है ? वह लड़की जो गणित में कम नंबर पाती है, मगर जिसकी कॉपियों के पन्नों पर छोटी–छोटी कविताएं और कहानियाँ बिखरी पड़ी है, क्या मूर्ख हैं ? जीवन क्या सिर्फ परीक्षाएं पास करना और प्रतियोगिताओं में सफलता पाना भर है ? यह किसका अधिकार होना चाहिए कि वह तय करे कि बच्चे को क्या करना है ? बच्चा क्या बस्तों से लदा सिर्फ भारवाही ही गधा है, जिसका कोई मन, कोई मरजी, कोई सोच, नहीं है ? क्या भविष्य हमेशा वर्तमान पर हावी रहना चाहिए ? क्या कल की चिंता में आज जिया ही नहीं जाना चाहिए ?
यदि शिक्षा छात्र के लिए है, तो शिक्षा का स्वरुप छात्र को ही तय करना होगा । अध्यापक उसकी मदद के लिए है । उसके व्यक्तित्व के विकास, उसके गुणों को उभारने के लिए । निरंकुश तानाशाह की तरह उसकी कमियों पर फब्तियां कसने, उसकी कमजोरियों की हंसी उड़ाने या अपनी कलम की नोक से उसका भविष्य बनाने÷विगाड़ने के लिए नहीं । मां–बाप बच्चे को उंगली पकड़ कर चलना सिखाते हैं, मगर जिंदगी भर उसकी बैशाखी नहीं बने रहते । अच्छा गुरु भी छात्र के सामने ज्ञान के सौंदर्य का दरबाजा भर खोलना है । उसमें घूमने, ढूढ़ने, खोजने का आनंद उसे स्वयं को ही लेना है । यह खोज का आनंद खोया आनंद फिर से वापस लाना होगा और इसके लिए छात्र औरशिक्षक को पाठ्यक्रमों की वर्तमान कैद से मुक्त करना होगा और यह काम आरंभ से ही शुरु करना होगा ।

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