नवरात्र पूजन विधि एवं महत्व :-
आचार्य राधाकान्त शास्त्री , नवरात्र पूजन विधि एवं महत्व :-
शक्ति के लिए देवी आराधना की सुगमता का कारण मां की करुणा, दया, स्नेह का भाव किसी भी भक्त पर सहज ही हो जाता है। ये कभी भी अपने बच्चे (भक्त) को किसी भी तरह से अक्षम या दुखी नहीं देख सकती है। उनका आशीर्वाद भी इस तरह मिलता है, जिससे साधक को किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती है। वह स्वयं सर्वशक्तिमान हो जाता है।
इनकी प्रसन्नता के लिए कभी भी उपासना की जा सकती है, क्योंकि शास्त्राज्ञा में चंडी उपासना एवं हवन के लिए किसी भी मुहूर्त की अनिवार्यता नहीं है।
फिर भी
नवरात्रि में इस आराधना का विशेष महत्व है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है। इस फल के कारण ही नवरात्र को कामदूधा काल भी कहा जाता है। नवरात्र में,
देवी की प्रसन्नता के लिए पंचांग साधन का प्रयोग करना चाहिए।
इस वर्ष पंचांग साधन में,आश्विन शुक्ल प्रतिपदा गुरुवार दिनांक 21 सितंबर 2017 को प्रातः 6:15 से प्रारंभ कर 9:15 तक एवं अभिजित मुहूर्त :- 11:30 से 12:30 के मध्य अपने पूजा घर या मंदिर की साफ सफाई, शुद्धि, कर आसन पर सपत्नीक या स्वयं बैठ कर आचमन, आसन शुद्धि, शरीर शुद्धि, गायत्री स्मरण, तिलक, पवित्री, दिशा शुद्धि, कर दीप प्रज्जवन पूर्वक , स्वस्तिवाचन कर , संकल्प प्रतिज्ञा करें, पुनः मातृ – पितृ गुरु आचार्य अभिवादन पूर्वक गौरी गणेश की प्रार्थना , आवाहन, स्थापन, पूजन कर भूमि शुद्धि कर एक परात या बड़े पात्र में शुद्ध मिट्टी एवं नदी की बालू को गंगाजल से पवित्र कर पहले से शुद्ध एवं साफ किये धोये हुवे जौ को मिट्टी में दुर्गा सत नाम एवं कवच के 9 मंत्रों द्वारा बोयें, पुनः उस पात्र के मध्य में प्रधान कलश की सविध स्थापना करें, स्थापित कलश प्रतिष्ठा पूजन पूर्वक , कलश पर ही या अलग वेदी बनाकर नवग्रह, पंचदेवता षोडश मातृका, सप्तघृत मातृका एवं नवदुर्गा सहित माता जगदम्बा की आवाहन , स्थापन पूजन अन्य कलश या नारियल या मूर्ति में कर सम्पूर्ण समर्पण पूजन आरती कर, दुर्गा पटल,शापविमोचन, पूर्वक कवच, अर्गला, किलक, देवी वशीर्ष, रात्रि सूक्त, नवार्ण जप, न्यास ध्यान पूर्वक साधारण या सम्पुट मंत्र से तेरहों अध्याय का सम्पूर्ण पाठ पुनः नवार्ण जप देवी सूक्त पाठ तीनों रहस्यों का पाठ एवं सिद्ध कुंज्जिका पूर्वक क्षमा प्रार्थना कर आरती करें,
इतना सब नही हो पाने पर,
सामान्यतः दुर्गा सत नाम, सहस्त्रनाम कवच, अर्गला, किलक या अन्य स्तोत्र का पाठ या अपने सामर्थ्य एवं गुरु आज्ञा के अनुसार विविध स्तोत्र , मंत्र साधना , या जप करें ,
स्थापित एवं आवाहित देवता देवी की क्रमशः 9 दिनों तक नित्य पूजन आरती करते हुवे यथा क्रम विधि से अपने सामर्थ्य के अनुसार पाठ पूजन करें,
विशेष कर
महाअष्टमी 28 सितंबर गुरुवार को सुबह से शाम तक कभी भी कुमारिका पूजन कर लें, एवं
महानवमी 29 सितंबर शुक्रवार को समयानुसार अग्नि स्थापन पूजन कर गणेश गौरी इत्यादि आवाहित देवी देवताओं के निमित्त हवन कर पूर्व पठित पाठ या जप के दशांश हवन कर पूर्णाहुति करें
अगले दिन दशमी में 30 सितंबर शनिवार को नित्य की भांति पूजन आरती कर जयंती ग्रहण कर स्थापित देवी देवताओं को समर्पित कर, आशीर्वाद ग्रहण कर क्षमा प्रार्थना पूर्वक देव / देवी विसर्जन कर नवरात्र व्रत का पारणा करें,
पूजा में,
अन्य विविध प्रकार से भी पूजन की विधाएं है ,
पटल का शरीर, पद्धति को शिर, कवच को नेत्र, सहस्त्रनाम को मुख तथा स्तोत्र को जिह्वा कहा जाता है।
इन सब की साधना से साधक देव तुल्य हो जाता है। सहस्त्रनाम में देवी के एक हजार नामों की सूची है। इसमें उनके गुण हैं व कार्य के अनुसार नाम दिए गए हैं। सहस्त्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। इन नामों से हवन करने का भी विधान है। इसके अंतर्गत नाम के पश्चात नमः लगाकर स्वाहा लगाया जाता है।
हवन की सामग्री के अनुसार उस फल की प्राप्ति होती है। सर्व कल्याण व कामना पूर्ति हेतु इन नामों से अर्चन करने का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है। जिसे सहस्त्रार्चन के नाम से जाना जाता है। सहस्त्रार्चन के लिए देवी की सहस्त्र नामावली जो कि बाजार में आसानी से मिल जाती है कि आवश्यकता पड़ती है।
इस नामावली के एक-एक नाम का उच्चारण करके देवी की प्रतिमा पर, उनके चित्र पर, उनके यंत्र पर या देवी का आह्वान किसी सुपारी पर करके प्रत्येक नाम के उच्चारण के पश्चात नमः बोलकर भी देवी की प्रिय वस्तु चढ़ाना चाहिए ।
जिस वस्तु से अर्चन करना हो वह शुद्ध, पवित्र, दोष रहित व एक हजार होना चाहिए।
अर्चन में बिल्वपत्र, हल्दी, केसर या कुंकुम से रंग चावल, इलायची, लौंग, काजू, पिस्ता, बादाम, गुलाब के फूल की पंखुड़ी, मोगरे का फूल, चारौली, किसमिस, सिक्का आदि का प्रयोग शुभ व देवी को प्रिय है। यदि अर्चन एक से अधिक व्यक्ति एक साथ करें तो नाम का उच्चारण एक व्यक्ति को तथा अन्य व्यक्तियों को नमः का उच्चारण अवश्य करना चाहिए।
अर्चन की सामग्री प्रत्येक नाम के पश्चात, प्रत्येक व्यक्ति को अर्पित करना चाहिए। अर्चन के पूर्व पुष्प, धूप, दीपक व नैवेद्य लगाना चाहिए। दीपक इस तरह होना चाहिए कि पूरी अर्चन प्रक्रिया तक प्रज्वलित रहे। अर्चनकर्ता को स्नानादि आदि से शुद्ध होकर धुले कपड़े पहनकर मौन रहकर अर्चन करना चाहिए।
इस साधना काल में आसन पर बैठना चाहिए तथा पूर्ण होने के पूर्व उसका त्याग किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए। अर्चन के उपयोग में प्रयुक्त सामग्री अर्चन उपरांत किसी साधन, ब्राह्मण, मंदिर में देना चाहिए। कुंकुम से भी अर्चन किए जा सकते हैं। इसमें नमः के पश्चात बहुत थोड़ा कुंकुम देवी पर अनामिका-मध्यमा व अंगूठे का उपयोग करके चुटकी से चढ़ाना चाहिए।
बाद में उस कुंकुम से स्वयं को या मित्र भक्तों को तिलक के लिए प्रसाद के रूप में दे सकते हैं। सहस्त्रार्चन नवरात्र काल में एक बार कम से कम अवश्य करना चाहिए। इस अर्चन में आपकी आराध्य देवी का अर्चन अधिक लाभकारी है। अर्चन प्रयोग बहुत प्रभावशाली, सात्विक व सिद्धिदायक होने से इसे पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से करना चाहिए।
माता जगदम्बा आपके श्रद्धा विस्वास एवं आस्था को सबल कर आप की समस्त मनोकामनाओं को पुर्ण करें,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री ,
संपर्क :- 9934428775,


