मधेश की राजनीति विकासमुखी नहीं अधिकारमुखी बन गई है : विकास प्रसाद लोध
विकास प्रसाद लोध, कपिलबस्तु | विगत के दशकों से मधेश की राजनीति नेपाल मे समानता का अधिकार कायम करने को ही अपना प्रमुख उद्देश्य वनाकर उसी पर केन्द्रीत रहा है । जिसके लिए अनेकों प्रकार से संघर्ष किये गए। समान नागरीक्ता, समान अधिकार, समान व्यवहार और आचरण, समान सहभागीता, समग्र मधेश को एक प्रदेश, जैसे आनेको साझा उद्देश्य को लेकर मधेश की राजनीती प्रारम्भ हुइ | श्रद्धेय स्व. गजेन्द्रनारायण सिंह द्वारा स्थापित “सदभावना” भी मधेश को प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों मे से एक पार्टी थी। जिसका उद्देश्य सद+भावना कायम करना अर्थात समानता कायम करना ही था। सदभावना के झण्ड़े तले नेपाल के कानुन व्यवस्था मे समानता तलास करने की असफल प्रयास किया गया था।
स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह के अथक प्रयास और वलिदानी को मधेश कदर करता रहेगा । लेकीन आज की स्थिति मे निसन्देह स्व.गजेन्द्र नारायण जैसे मधेश प्रेमी राजनीतिज्ञ का सर्वथा आभाव है । स्व. गजेन्द्रनारायण सिंह के ही कार्य को निरन्तरता देते हुये मधेश आन्दोलन प्रथम तथा द्वितिय का आरम्भ किया गया, आन्दोलन केन्द्रित आनेक पार्टियो की एकता पर मधेश को भरोसा नही हो यह कैसे सम्भव है । मधेश केन्द्रित दलों का साझा उद्देश्य निसन्देह मधेश को समानता दिलाना ही रहा है । शुरू से आखिर तक का प्रयास रहा कि नेपाल मे मधेश का प्रतिनिधित्व से लेकर मधेशीयों का सम्मान तक की वाते स्थापित किए जा सकें। जिसके कारण मधेशीयों का भरपुर सहयोग और साथ भी रहा ।
मधेश आन्दोलन के पूर्व घटनाओं को अन्देखा कर फिर से नयाँ प्रयत्न करने की कोशिस हो रही है | इस महत्वाकंक्षा को क्या कहा जाए ? पहले की गलतियों को सुधारे विना फिर वही राह पर चलना खतरनाक तो है ही । स्व.गजेन्द्र जी के समय मे दिखी असफलता और उसके कारणों को अन्देखा कर विना सुधार किए गए मधेश आन्दोलन प्रथम और द्वितिय किया गया जो कि सफल नही हुआ | अन्ततः ठिक उसी प्रकार पुरे मधेश को सत्ता मे सिमित कर दिया गया । आखिर गल्ती का भुक्तान तो करना ही पड़ा चाहे जिस रूप मे हो | तो परिणामतः मधेश आन्दोलन मे हुये गल्तीयों का नतिजा ही है जिसके कारण आन्दोलन पुर्णरूप से असफल रहा और संघर्षरत लोग सत्ता मे सिमित हो गए।
यहाँ असफल का मतलव है उपलव्धी विहिनता । मकसद वा कमयावी मे चुक होना वह भी सम्पुर्ण सामंजस्यों के होते हुये। अव तो कोई भी सहजता से वता सक्ता है दो तिहाई वहुमत से ही अधिकार की लड़ाई सम्भव है। जो विल्कुल फुजुल की वातें मात्र है यह कभी भी संभव नही है। नेपाल की केन्द्रीय शासन मधेशीयों के हाथ मे आनेका मतलव है घोड़े के सर पर सिंघ उगना । हाँ यह चुनावी मुद्दा अवश्य ही रहेगा परन्तु एसा कुछ होगा नही। तो अव लगभग मधेश में अधिकार की लड़ाईयां समाप्त हो चुकी हैं। जो भी अधीकार की सपना मधेशीया देखे वा दिखाया गया वह सव सपने ही रहेंगे। जो मिला है उसी मे अपने आपको समावेस करना ही मधेशीयों की अभी का विकल्प है ।
अधिकार की लड़ाई हार जाने के वाद विकास की लड़ाई मे जित जना उतना आसान नही है। स्थानीय सरकारें वने लगभग महीनो वित चुके है। लेकिन कुछ खास उपलव्धी नही दिख रही है। मधेश के लिए अधीकार प्रमुख मुद्दा था पहले से। विकास का मुद्दा भी पुराना ही है। दोनो मुद्दा महत्वपुर्ण हैं। और आवश्यक भी। अव अधिकार की मुद्दा हारचुके लोगों द्वारा विकास का मुद्दा उठाना स्वभाविक है। उन्हे विल्कुल एहसास नही है अपने हार की। चुकी वह कभी हृदय से लड़े ही नही थे तो हार पर पछतावा क्यो हो। अव उन्हे उस समय से मतलव नही उन्हे आज चुनाव लड़ना और जित जाना ही दिखाई दे रहा है। किसी भी मुल्य पर वह चुनाव अपने पक्ष मे लाना चाहते हैं। उसके लिए करोड़ो रूपये खर्च भी कर रहे हैं।
असान सी वात है जहाँ लगानी लगती है वहाँ नाफा स्वयम सिर्जित हो जाता है। करोड़ो खर्च करने के वाद अर्थात लगानी करने के वाद लगानी कर्ता कितने नाफा का आपेच्छा करेगा यह सोचने योग्य वात है। वह अपने लगानी पर चिन्तित रहने वाला आपके विकास पर क्यो चिन्तित हो ? जव की कुछ न कुछ उसके लगानी करने मे जन्ता का भी सहभागीता रहता है। कोई भले ही जित कर सांसद विधायक वनजाए लेकिन यह नही भुले कि मधेश हार रहा है। और मधेशी अधीकार और विकास दोनो खोकर केवल राजनितिक व्यपार के पात्र वनकर रह गए हैं।


