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घनघोर अन्धकार में ही सही श्री मुनिलाल साह मानवता हेतु आशा की किरण दिखाई देतें हैं

Munni lal sah
 

गरीब तन, अमीर मन

जलेश्वर, हिमालिनी,अंक जून २०१८ | मित्रों ! आज मैं अपने ही नगरपालिका (जलेश्वर) जो नेपाल के दो नंबर प्रदेश की राजधानी जनकपुर से १५ किमी दक्षिण भारत बिहार के भिठ्ठामोड से चार किमी उत्तर में स्थित छोटे से शहर के उस महान नागरिक से मिलाना चाहता हूँ जो आर्थिक, भौतिक, शैक्षिक और शारीरिक रूप से अति कमजोर होते हुए भी समाज सेवा और स्वयं सेवा में सबसे आगे रहते हैं । इस नगर में प्रमाणपत्र प्राप्त विद्वानों की कोई कमी नहीं परन्तु उनसे यहाँ का समाज निराश है । यहाँ आर्थिक धनाढ्यों की भीड़ है । परन्तु समाज शोषण करने में उन्होंने कोई कसर बांकी नहीं छोड़ा है । यहाँ के समाजसेवियों के हाथों से अपने को लूटने से बचाने में ही आम नागरिक त्रसित रहते है  । समाज के कमाई पर पलने बाले कर्मचारियों और नेताओं की तो चर्चा भी करना पाप सा लगता है । परन्तु ऐसे घनघोर अन्धकार में भी टिमटिमाती लौ ही सही पर स्वयं सेवी श्री मुनिलाल साह के रूप में मानवता हेतु आशा की किरण दिखाई दे रही है ।

Munni lal sah
श्री मुनिलाल साह

किसी भी समाज के चतुर्दिक विकास, सौन्दर्यीकरण और सभ्य बनाने के लिए नागरिकों द्वारा स्वतःस्फूर्त सेवा अथवा सहयोग की भावना या कहें स्वयंसेवी संस्कार से आप्लावित होना अत्यंत आवश्यक है । स्वयंसेवा करने से केवल सामाजिक संसाधन खर्च होने से ही नहीं बचते–बल्कि इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्वयंसेवा से समाज के साथ–साथ समाज में रहने वालों का भी विकास होता है । स्वयंसेवा की अवधारणा का एक मूल तत्व यह है कि हमारा जीवन कभी भी पूरी तरह से लेन देन पर आधारित नहीं होना चाहिए ।
जैसे फूल खिलते हैं, खुलेआम खुशबू लुटाई जाती है । सूरज उगता है, चारो ओर प्रकाश की किरणें मुफ्त में बिखेरता है । बादल जब जल से भर जातें हैं, तब चारो ओर घूमघूम कर अमृत कण बरसाते हैंं । इसी प्रकार जब मानव करूणा और प्रेम से भर जाता है तब बिना सेवा और दान के रह नहीं सकता । जिस प्रकार नौ महीने के वाद गर्भ को जन्म देना बाध्यात्मक प्राकृतिक नियम है । उसी प्रकार भीतर प्रेम ,करुणा, उमंग और आनंद से भरा मानव उसे लुटाए बिना रह नहीं सकता । और बाद में यही दान उसे महामानव बना देता है । जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं प्रिय मुनिलाल साह जी में देख रहा हूँ । वैसे उनका जीवन बहुत साधारण रहा है । वे अंचालाधीश कार्यालय और जिला प्रशासन कार्यालय में सहयोगी के रूप में कार्यरत थे । वाद में जलेश्वर जेल में गार्ड के रूप मे काम किए । उस समय प्रजातंत्र के लड़ने वाले नेता कार्यकर्ता जिन्हें समय समय पर तत्कालीन सरकार द्वारा  जेल में डाल दिया जाता था उनको भी मुनिलाल साह जी बड़े अदब और प्यार से पेश आते थे । पूरा सहयोग करते थे । उनमे पूर्व मंत्री श्री गणेश नेपाली, श्री महेश्वर प्रसाद सिंह जैसे अनेको नेताओं का नाम उन्होंने गिनाया । हाल ही में उन्होंने अपनी थोड़ी सी पेन्सन बाली रकम से आठ मंदिरों में बिजली पंखा और आठ  दीवाल घड़ी प्रदान किया है । जिसमे जलेश्वरनाथ महादेव मंदिर, भृगु ऋषि मंदिर,जानकी मंदिर जनकपुर, जलेश्वर राजदेवी मंदिर, हनुमान मंदिर, ब्रहमचारी कुटी, वृद्धाश्रम आदि धार्मिक स्थलों में उन्होंने आम नागरिको को सुविधा पहुचाने हेतु इन सामग्रियों का दान किया है । इतना ही नहीं उन्होंने जलेश्वर नगर सफाई अभियान में जी तोड़ सहयोग किया था । जिसमे मैं खुद भी सहभागी था ।
७ गरीव और असहाय लड़कियों का कन्यादान अपने पैसे से कराकर अपनी उदारता और महामानवता का परिचय दिया है । २ पीडि़त परिवारों को अपनी ओर से आर्थिक और शारीरिक सहयोग देकर श्राद्धकर्म सम्पूर्ण कर पुण्य का काम किया है । रोगी, गरीब और पीडि़तों को आर्थिक सहयोग तथा चन्दा दे कर सामाजिकता की परिभाषा दी है ।
परन्तु कैसी विडम्बना और दुर्भाग्य है यहाँ का कि ऐसे विशुद्ध समाजसेवी पुण्यात्माओं का नाम किसी पत्रकार और पत्रिकाओं में नहीं लिखे जाते । उल्टे उच्च पदासीन सम्पत्तिशाली शिक्षित लोग जो खुलेआम जनता के खून पसीने को लूटते हैं । उनका गुणगान किया जाता है । तो मित्रों ! यदि कलयुग की यही परिभाषा है, तो हम भले ही कलयुग में हैं यूरोप और अमेरिका कलयुग रूपी सतयुग में जी रहे हैं । हम सेवा परमो धर्म के मान्यता के धनी सनातनी लोग लुटेरों के नरक में जी रहे हैं, तो पाश्चात्य लोग देवस्थान में जी रहे हैं ।
नोट ः अठारहों पुराण और चारों वेद के रचना पूरा हो जाने के वाद देवताओं तथा ऋषियों द्वारा वेद व्यास से धर्म का सार पूछे जाने पर उन्होंने दो वाक्य में ही धर्म का सार प्रकट कर दिया था ।
‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वय,
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडन’
अर्थात ः परोपकार सबसे बड़ा पुण्य है और परपीड़ा देना सबसे बड़ा पाप है ।
इस श्लोक को आधार मानते हैं तो हम सब पापी हैं । पापीस्थान हमारा निवास स्थान है ।
अतः विचार में परिमार्जन और परिवर्तन की घोर आवश्यकता है खासकर विद्वान्, धनवान और अधिकारी वर्गों में ।
प्रस्तुतिः अजय कुमार झा

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