सोमवार को सोमवती मौनी अमावस्या : आचार्य राधाकान्त शास्त्री
मौनी सोमवती अमावश्या :-
कल सोमवार को सोमवती मौनी अमावस्या का पवन पर्व मनाया जाएगा । इस बार सोमवार को श्रवण नक्षत्र में सिद्धि योग से सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह से पूरा दिन एवं पूरी रात होने से यह पवित्रता एवं अक्षय पुण्य का कल्प वृक्ष है । इस मौनी सोमवती अमावस्या के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा गोचरवश मकर राशि मे सोमवार को आना अति दुर्लभ संयोग है , इसलिए यह दिन एक संपूर्ण शक्ति से भरा हुआ है इस दिन मनु ऋषि का जन्म भी माना जाता है. इसलिए भी इस अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है. मकर राशि, सूर्य तथा चन्द्रमा का योग इसी दिन होता है अत: इस अमावस्या का महत्व और बढ़ जाता है । इस दिन पवित्र नदियों व तीर्थ स्थलों में स्नान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है , जबकि इस पर्व को सोमवार में श्रवण नक्षत्र एवं सिद्धि योग का संयोग होने से इसका महत्व चौगुना बढ़ गया है ,
मौनी अमावस्या पर मौन व्रत का महत्व :-
इस दिन व्यक्ति विशेष को मौन व्रत रखने का भी विधान रहा है । इस व्रत का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखना , धीरे-धीरे अपनी वाणी को संयमित करके अपने वश में करना ही श्रेष्ठ मौन व्रत है । जबकि कई लोग इस दिन से मौन व्रत रखने का प्रण भी करते हैं । वह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि कितने समय के लिए वह मौन व्रत रखना चाहता है । कई व्यक्ति एक दिन, कोई एक महीना और कोई व्यक्ति एक वर्ष तक मौन व्रत धारण करने का संकल्प कर लेते है ।
इस दिन कम से कम मौन व्रत धारण करके ही स्नान करना चाहिए । वाणी को नियंत्रित करने के लिए यह शुभ दिन होता है । मौनी अमावस्या को स्नान आदि करने के बाद मौन व्रत रखकर एकांत स्थल पर जप आदि करना चाहिए । इससे चित्त की शुद्धि होती है । आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है । मौनी अमावस्या के दिन व्यक्ति स्नान तथा जप आदि के बाद हवन, दान आदि करना चाहिए । ऎसा करने से पापों का नाश होता है । इस दिन गंगा स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान फल मिलता समान है.
माघ मास की अमावस्या तिथि और पूर्णिमा तिथि दोनों का ही महत्व इस मास में होता है. इस मास में यह दो तिथियाँ पर्व के समान मानी जाती हैं । समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों के मध्य संघर्ष में जहाँ-जहाँ अमृत गिरा था उन स्थानों पर स्नान करना पुण्य कर्म माना जाता है ।
मौनी सोमवती अमावस्या महात्म्य:-
इस अमावस्या के दिन व्यक्ति के द्वारा किया गया कोई भी शुभ या अशुभ कर्म अक्षय हो जाता है , उसका क्षय नही होता अतः जितना हो सके अपने आप को धर्मिक कार्यों में संलग्न रखना, आत्म संयम का व्रत संकल्प आचरण लेना, भगवद्भक्ति करना, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान, पुण्य तथा जप करना चाहिए । यदि किसी व्यक्ति की सामर्थ्य त्रिवेणी के संगम अथवा अन्य किसी तीर्थ स्थान पर जाने की नहीं है तब उसे अपने घर में ही प्रात: काल उठकर दैनिक कर्मों से निवृत होकर स्नान आदि करना चाहिए अथवा घर के समीप किसी भी नदी , पोखरा, या नहर में स्नान कर सकते हैं पुराणों के अनुसार इस दिन सभी नदियों का जल गंगाजल के समान हो जाता है । स्नान करते हुए मौन धारण करें और जप करने तक मौन व्रत का पालन करें ।
फिर किसी पीपल वृक्ष के पास जाकर उसके मूल में भगवान विष्णु की तुलसी, तिल, जल, फूल, वस्त्र, चन्दन , धूप, दीप, नैवेद्य आरती से पूजन कर किसी भी फल, फूल, या दक्षिणा से वृक्ष की 108 परिक्रमा करें परिक्रमा करते समय
” ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ”
एवं गायत्री मंत्र का जप करते रहें ।
इस दिन व्यक्ति प्रण करें कि वह झूठ, छल-कपट आदि की बातें नहीं करेगें । इस दिन से व्यक्ति को सभी बेकार की बातों से दूर रहकर अपने मन को सबल बनाने की कोशिश करनी चाहिए । इससे मन शांत रहता है और शांत मन शरीर को सबल बनाता है । इसके बाद व्यक्ति को इस दिन विशेष रूप से
” ब्रह्म गायत्री” का जप अथवा पाठ करना चाहिए । मंत्रोच्चारण के साथ अथवा अपनी श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करना चाहिए दान में गाय, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, बिछावन, बर्तन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करनी चाहिए,
सोमवती मौनी अमावश्या संगम स्नान, साही स्नान, व्रत पूजन का सम्पूर्ण पुण्य फल से सबके जीवन के सभी रोग, शोक, दुख क्लेश, अशांति दूर हों तथा सबका जीवन सुख सौभाग्य सम्पन्न, सफल शुभद एवं मंगलमय हो,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री

