Wed. Jul 15th, 2020

जख्मों को रफू कर लें, दिल शाद करें फिर से, ख्वाबों की कोई दुनिया, आबाद करें फिर से : शहरयार

शहरयार की शायरी और शहरयार की शख्सियत दोनों एक-दूसरे के उलट हैं। तमाम इंसानी कमजोरियों के बावजूद शहरयार एक बेहद सादा और उम्दा शख्स थे। लेकिन यही बात उनकी शायरी के बारे में नहीं कही जा सकती। उनकी शायरी जटिल है। दरअसल, हर तरफ आसानियों की फरमाइश के दौर में वह एक ऐसे शायर थे, जिन्होंने अपने सामने के समय और उसकी दिक्कतों को हूबहू लिख देने भर को कविता नहीं माना। उनकी शायरी इसीलिए उर्दू की उस महान परंपरा से ताल्लुक रखती है, जिसमें मसलों को पूरी संजीदगी और एक खास किस्म की एम्बीग्युटी (इलहाम) के जरिए शायरी में जगह दी गई। लेकिन इसके बावजूद शहरयार एक बेहद मकबूल शायर साबित हुए

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हवा का जोर ही काफी बहाना होता है
अगर चिरा.ग किसी को जलाना होता है 
जबानी दावे, बहुत लोग करते रहते हैं
जुनूं के काम को, करके दिखाना होता है
हमारे शहर में , ये कौन अजनबी आया
कि रोज ख्वाबे-सफ़र पे रवाना होता है
कि तू भी याद नहीं आता, ये तो होना था
गए दिनों को, सभी को, भुलाना होता है
इसी उम्मीद पे, हम आज तक भटकते हैं
हरेक शख्स का, कोई ठिकाना होता है
हमें, इक और भरी बज्म याद आती है
किसी की बज्म में, जब मुस्कुराना होता है 

 

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इस शम्म-ए-फ़रोज़ां के परवाने हजारों हैं 
इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं
इन आंखों से बावस्ता अफसाने हजारों हैं 
इक तुम ही नहीं तन्हा उल्फत में मेरी मेरी रुस्वा
इस शहर में तुम जैसे दीवाने हजारों हैं 
इक सिर्फ हमीं मय को आंखों से पिलाते हैं
कहने को तो दुनिया में मयखाने हजारों हैं 
इस शम्म-ए-फ़रोज़ां को आंधी से डराते हो
इन आंखों से बावस्ता अफसाने हजारों हैं

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