Thu. Nov 5th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

भारत में मीडिया के खिलाफ लामबंदी

 

मीडिया को लेकर देश के लगभग सभी राजनीतिक दल इस समय परेशान हैं। अधिकांश विपक्षी दल भी कम से कम इस एक मुद्दे पर तो सरकार के साथ हैं कि मीडिया पर लगाम लगाने की जरूरत है। सत्तारूढ़ सरकारें समय-समय पर मीडिया को कसने के प्रयोग करती रही हैं। आपातकाल के दौरान भी विपक्ष के पैरों में बेड़ियां व मीडिया के हाथों में चूड़ियां पहनाई गई थीं। मीडिया का एक प्रभावशाली वर्ग तब घुटनों के बल झुकने की मांग करने पर रेंगने को भी बेताब था। पर तब भी प्रेस के खिलाफ सेंसरशिप का पुरजोर विरोध किया गया था। राजीव गांधी के शासनकाल में भी प्रेस को नियंत्रित करने का प्रयत्न हुआ था, पर तब भी इतना विरोध उभरा था कि वह संभव नहीं हो पाया था।

मीडिया एक बार फिर सरकार की चर्चा और सांसदों के हमलों की चपेट में है और उसके इरादों और नीयत को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन के दौरान मीडिया द्वारा अपनाई गई भूमिका को लेकर फब्तियां कसी जा रही हैं और उसके ‘बेलगाम’ कवरेज पर सवाल उठाए जा रहे हैं। समझदार लोगों को और समझाया जा रहा है कि अगर मीडिया का समर्थन नहीं होता तो अन्ना के आंदोलन को इतना व्यापक समर्थन नहीं मिलता। निष्कर्ष यह कि सरकार के खिलाफ सिविल सोसायटी के किसी भी सार्थक आंदोलन को अगर भोथरा करना हो तो उसके लिए पहले मीडिया पर डंडे चलाना जरूरी है। मीडिया को अनुशासित करने की पहल दो स्तरों पर की जा रही है। पहली यह कि अगर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों द्वारा प्रसारित की जाने वाली सामग्री के लिए निर्धारित शर्तो और ‘अनुशासन’ में उल्लंघन होता है तो उनके लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। नए चैनलों के लिए लाइसेंस जारी करने को लेकर भी नए सिरे से प्रावधानों की व्याख्या की गई है। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने ‘स्वानुशासन’ के पालन में न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की देखरेख में अपने लिए पहले से दिशा-निर्देश तय कर रखे हैं और उनका यथासंभव पालन भी किया जा रहा है। पर सरकार की नई पहल इन आशंकाओं को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को उसके ‘स्वानुशासन पर्व’ से मुक्त करना जरूरी है।

यह भी पढें   एनपीएल में आज दो मुकाबले: विराटनगर–जनकपुर और लुंबिनी–पोखरा आमने-सामने

मीडिया पर लगाम कसने का दूसरा उपक्रम वर्ष 2009 के चुनावों के बाद ‘पेड न्यूज’ को लेकर उठी बहस से उत्पन्न हुआ है। कहा जा रहा है कि पेड न्यूज की बुराई पर रोकथाम के लिए कड़े से कड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत है। पेड न्यूज के मुद्दे को हथियार बनाकर समाचार पत्रों की कथित ‘मनमानी’ रोकने को लेकर भी सभी दलों की सोच लगभग समान है। ‘जनहित’ के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिशें केंद्र में भी की जा रही हैं और उन राज्यों में भी, जहां कतिपय मुख्यमंत्री इतने ताकतवर हो गए हैं कि मौका मिलने पर प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाने की भी महत्वाकांक्षा रखते हैं।

मीडिया को लेकर चल रही बहस में अब भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष न्यायमूर्ति मरकडेय काटजू का वह उद्बोधन भी शामिल हो गया है, जो उन्होंने पिछले दिनों दिया था। श्री काटजू के अनुसार कई लोगों, जिनमें जो सत्ता में हैं वे ही नहीं, बल्कि आमजन भी शामिल हैं, ने कहना शुरू कर दिया है कि मीडिया गैरजिम्मेदार व स्वच्छंद हो गया है, अत: उसे नियंत्रित किया जाना जरूरी है। उनका यह भी कहना है कि मीडिया की स्वतंत्रता भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हिस्सा है। पर कोई भी स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती। उस पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। श्री काटजू का यह भी मानना है कि मीडिया की कमियों को दूर करने के दो ही तरीके हैं। एक तो प्रजातांत्रिक तरीका, जिसमें आपसी चर्चा और समझाइश की व्यवस्था है, जिसे कि वे स्वयं भी महत्व देना चाहेंगे। दूसरा यह कि अगर मीडिया सुधरने से इंकार कर दे तो अंतिम उपाय के रूप में उसके खिलाफ कड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि गलती करने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए, उनके सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए जाएं, लायसेंस रद्द कर दिए जाएं। श्री काटजू ने यह भी आरोप लगाया कि मीडिया तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है, गैर-जरूरी मुद्दों को उछालता है, देश की कड़वी आर्थिक सच्चाइयों की तरफ आंखे मूंदे रखता है और बम-धमाकों आदि घटनाओं की जानकारी देने के दौरान एक समुदाय विशेष को आतंकवादी या बम फेंकने वाला दर्शाने की प्रवृत्ति मीडिया की रहती है। श्री काटजू पूछते हैं कि क्या मीडिया का जाने-अनजाने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का हिस्सा बनना उचित है?

यह भी पढें   सरकार संविधान और कानून की अनदेखी कर सत्ता का दुरुपयोग कर रहा है : प्रदीप पौडेल

सरकार को सिविल सोसायटी के आंदोलन व उसके मीडिया कवरेज से परहेज है। टीम अन्ना पर किए जा रहे लगातार हमले इसका प्रमाण हैं। विपक्षी पार्टियों को सलाह दी जा रही है कि वे नकारात्मक रवैया छोड़ें यानी सरकार की कमियों और गलतियों को ढूंढ़ना बंद कर दें। न्यायपालिका के बारे में कहा जा रहा है कि वह लक्ष्मण रेखा लांघ रही है। और अब मीडिया को अनुशासित करने के लिए अलग-अलग माध्यमों की मदद ली जा रही है। इस भ्रम का कोई इलाज नहीं है कि मीडिया और मीडियाकर्मियों को ‘अनुशासित’ और ‘नियंत्रित’ करके सूचना के विस्फोट पर प्रतिबंधों के ढक्कन नहीं लगाए जा सकते। ‘मुक्त व्यापार’ और ‘नियंत्रित समाचार’ की जुगलबंदी की कोई भी कोशिश लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। मीडिया लक्ष्मण रेखा लांघता है तो उससे निपटने को बाजार की ताकतें व एक परिपक्व दर्शक/पाठक वर्ग हमेशा तैयार बैठा है। मीडिया को इस समय समाज की उन ताकतों के खिलाफ संरक्षण की जरूरत है, जो उसकी आवाज को कुचलने और कुतरने के षड्यंत्र में लगी हुई हैं। इसमें निहित स्वार्थो वाले सभी तरह के राजनेता, धर्मगुरु, कॉपरेरेट घरानों के लॉबिस्ट और हर तरह का माफिया शामिल हैं। एक तरफ सूचना उजागर करने वालों (व्हिसलब्लोअर्स) के खिलाफ हमलों की वारदातें बढ़ रही हैं और दूसरी तरफ ‘सूचना के अधिकार’ और ‘सूचना के वाहकों’ को नियंत्रित करने की कोशिशें भी जारी हैं। इन विरोधाभासी मुखौटों के साथ अपने लोकतंत्र का दुनिया से अभिषेक करवाने की उम्मीदें नहीं की जा सकतीं।

यह भी पढें   नेपाल की भूमि किसी पड़ोसी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे : सांसद हरि पंत

दैनिक भास्कर से

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com