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नेपाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और चुनाव की संभावनाएं : अंशुकुमारी झा

 

अंशु कुमारी झा, हिमालिनी अंक दिसम्बर । नेपाल एक बार फिर अपने राजनीतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है । भाद्र २३ और २४ गते हुए व्यापक जन–आंदोलन ने देश की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया है । जेनजी युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन ने न केवल सरकार को गिरा दिया, बल्कि नेपाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत भी की है । भाद्र २०८२ में नेपाल सरकार द्वारा फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सएप सहित कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ । सरकार का कहना था कि इन कंपनियों ने सरकारी निगरानी के तहत पंजीकरण नहीं कराया था । लेकिन यह आंदोलन जल्द ही सोशल मीडिया प्रतिबंध से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार, भाई–भतीजावाद, और राजनीतिक अभिजात वर्ग के विरुद्ध व्यापक जन–आंदोलन बन गया ।

२३ और २४ भाद्र २०८२ को देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें मुख्य रूप से छात्रों और युवा नागरिकों ने भाग लिया । प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, शीर्ष राजनेताओं के आवासों और अन्य सार्वजनिक भवनों में आग लगा दी । स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को २४ गते भाद्र को इस्तीफा देना पड़ा । इन विरोध प्रदर्शनों में कम से कम ५१ से ७६ लोगों की मौत हो गई, जिनमें २१ प्रदर्शनकारी, ९ कैदी, ३ पुलिस अधिकारी और १८ अन्य लोग शामिल थे । लगभग २,११३ लोग घायल हुए । तत्पश्चात अवस्था बहुत ही गम्भीर हो गई थी । उस उग्र आन्दोलन को रोकना कठिन हो गया था । देश की शक्ति क्षीण होती हुए दिखाई दे रही थी । जनता में मानो क्रोध की ज्वाला ही फूट गई थी और कहीं न कहीं उन्हें भय का भान भी था कि अब देश में क्या होगा ? धीरे–धीरे वह दिन भी कट गया पर जनता बदलाव चाहती है ।

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इतने बच्चों के लहु से शायद देश में कुछ परिवर्तन हो, इसी आस से लोग अभी के वर्तमान सरकार की ओर देख रहे हैं । तो आइए जानते हैं हमारे देश की वर्तमान नई राजनीतिक व्यवस्था कैसी है और निश्चिित समय पर चुनाव सम्भव है कि नहीं ?
२७ गते भाद्र को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया । सुशीला कार्की नेपाल की इतिहास में पहली महिला प्रधानमंत्री बन गई हैं । उसी दिन, राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर दिया और २१ फागुन २०८२ को चुनाव कराने की घोषणा की । कार्की ने अपने पद की शपथ लेते समय कहा कि वह छह महीने से अधिक समय तक सत्ता में नहीं रहेंगी । अंतरिम प्रधानमंत्री ने घायल प्रदर्शनकारियों से अस्पतालों में मिलने के साथ अपना कार्यकाल शुरू किया । सरकार ने घोषणा की कि विरोध प्रदर्शन में मारे गए प्रत्येक परिवार को १० लाख नेपाली रुपये का मुआवजा दिया जाएगा । घायलों को भी मुआवजा दिया जाएगा । सच में क्या नेपाली नागरिक का मूल्य सिर्फ १० लाख है ? विषय चिन्ताजनक है । जिनके परिवार का चिराग गया वह तो अमूल्य था । इस आंदोलन ने कई घरों का सहारा छीन लिया । अब बात यह आती है कि सच में, सुनियोजित समय पर चुनाव हो पाएगा ? क्या नेपाल को स्थिर सरकार मिलेगी ?

चुनाव आयोग ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं १६ नवंबर २०२५ को आयोग ने घोषणा की कि २० जनवरी को उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करना होगा । नामांकन २० जनवरी को सुबह १० बजे से शाम ६ बजे तक दाखिल किया जा सकता है, और उम्मीदवारों को २३ जनवरी तक अपना नाम वापस लेने की अनुमति होगी । बिडम्बना तो यह है कि चुनाव लड़ने के लिए हमारे देश में १२३ दलों ने दर्ता करवाया है । अब देखा जायेगा चुनाव के वक्त की राजनीति कैसी होगी । २७५ सदस्यीय सदन के लिए होने वाले इस चुनाव में मिश्रित चुनावी प्रणाली अपनाई जाएगी । १६५ सीटें एकल सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से भरी जाएंगी, जबकि शेष ११० सीटें समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी सूची से भरी जाएंगी । चुनाव आयोग के अनुसार, २ नवंबर २०२५ तक १८ वर्ष की आयु पूरी करने वाले मतदाताओं की संख्या १८,१६८,२३० तक पहुंचने का अनुमान है । आयोग ने सरकार से मतदाता पंजीकरण अधिनियम में संशोधन सहित आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने का आग्रह किया है । साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार विदेश में रहने वाले नेपालियों को मतदान का अधिकार देने पर भी चर्चा हो रही है ।

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इस आंदोलन के बाद नेपाल में नई राजनीतिक ताकतें उभर रही हैं । जेन जी आंदोलन के प्रमुख चेहरे सुदन गुरुंग ने घोषणा की है कि वे फागुन के इस चुनाव में अवश्य भाग लेंगे । गुरुंग ने कहा कि उनका समूह पूरे देश में समर्थकों को संगठित कर रहा है और एक “परिवर्तन आंदोलन” बना रहा है । उन्होंने कहा, हम अगले चुनाव में भाग लेंगे क्योंकि हम अब पीछे नहीं हटेंगे । हम देश के लिए समर्पित हैं । अब देश को भ्रष्टों से बचाना है । वर्तमान ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग द्वारा एक नई पार्टी “उज्यालो नेपाल” बनाई गई जिसमें सुदन गुरुंग भी शामिल है । इस पार्टी से जनता को बहुत उम्मीदें हैं और फिलहाल यह पार्टी बहुत चर्चा में है । ऐसा लगता है, ये नए चेहरे और विचार पुरानी राजनीतिक ताकतों को कड़ी चुनौती दे सकते हैं । आंदोलन के बाद पारंपरिक राजनीतिक दलों में भी नेतृत्व परिवर्तन की बहस शुरू हो गई है । नेपाली कांग्रेस के युवा नेतागण गगन थापा, विश्व प्रकाश शर्मा और प्रदीप पौडेल ने चुनाव से पहले पार्टी में सुधार लाने के लिए पार्टी अधिवेशन का प्रस्ताव रखा । शेर बहादुर देउबा किसी भी बड़ी मुख्यधारा की पार्टी के पहले राजनेता बने, जिन्होंने नेतृत्व सौंपा और पार्टी के उपाध्यक्ष पूर्ण बहादुर खड्का को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया । एमाले में नेतृत्व पुनर्गठन की मांग उठी, लेकिन केपी शर्मा ओली ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया । माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और खुद को पार्टी संयोजक घोषित कर दिया ।

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इस चुनाव के सामने कई चुनौतियां हैं । राजनीतिक हिंसा की संभावना बनी हुई है । सुरक्षा स्थिति नाजुक है, क्योंकि विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस चौकियों में व्यापक आगजनी हुई थी । अब युवा चुप बैठने वाले नहीं है, अनैतिक और गलत क्रियाकलाप पर वह जरूर भड़केंगे । हमारे देश में आर्थिक संकट भी एक बड़ी चुनौती है । हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद, लोगों में उत्साह भी दिख रहा है । नेपाली कांग्रेस चुनाव के पक्ष में है और लोग उत्साहपूर्वक मतदाता पंजीकरण करा रहे हैं । अंतरराष्ट्रीय माहौल भी अनुकूल प्रतीत होता है । नए राजनीतिक दलों का उदय पारंपरिक राजनीति को चुनौती दे रहा है और यह संभावना है कि ये नए चेहरे पुरानी ताकतों को कड़ी टक्कर देंगे । सबकी इच्छा है कि देश में परिवर्तन आए । सभी जनता खुशहाल रहे । बेरोजगारी और भ्रष्टाचार का अन्त हो ।

अंशुकुमारी झा

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