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गगन थापा ने देउवा की 34 साल की संसदीय यात्रा रोक दी

 

हिमालिनी डेस्क, जनकपुरधाम, 21 जनवरी । नेपाली कांग्रेस की आंतरिक सत्ता-राजनीति में आया अप्रत्याशित मोड़ अंततः पार्टी के सबसे अनुभवी नेता शेरबहादुर देउवा की 34 वर्षों लंबी संसदीय यात्रा के विराम में बदल गया। आगामी प्रतिनिधि सभा चुनाव में उम्मीदवार न बनने का उनका फैसला किसी व्यक्तिगत थकान या चुनावी हार का परिणाम नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व में आए ऐतिहासिक बदलाव की सीधी परिणति है।

डडेलधुरा से लगातार 1991 (वि.सं. 2048) से चुनाव जीतते आ रहे देउवा इस बार भी स्थानीय कांग्रेस इकाई से एकमात्र उम्मीदवार के रूप में सिफारिश किए गए थे। लेकिन काठमांडू में हुए विशेष महाधिवेशन ने पूरी राजनीतिक तस्वीर पलट दी। इसी महाधिवेशन ने देउवा को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर गगन थापा को नेपाली कांग्रेस की कमान सौंप दी।

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नेतृत्व परिवर्तन, सत्ता संतुलन और देउवा की विवशता

विशेष महाधिवेशन को अवैधानिक बताते हुए देउवा पक्ष ने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया, लेकिन आयोग ने गगन थापा के नेतृत्व वाली कांग्रेस को मान्यता दे दी। इसके बाद मामला सर्वोच्च अदालत पहुंचा, जहां अभी भी कानूनी लड़ाई जारी है।
हालांकि, राजनीतिक वास्तविकता यह है कि पार्टी संगठन, चुनाव चिन्ह और आधिकारिक निर्णय अब गगन थापा के नेतृत्व में हैं। ऐसे में देउवा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना लगभग असंभव हो गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति का चुनाव न लड़ने का फैसला नहीं, बल्कि कांग्रेस में पीढ़ीगत सत्ता हस्तांतरण का निर्णायक क्षण है।

देउवा: सत्ता के सदाबहार खिलाड़ी

शेरबहादुर देउवा नेपाली राजनीति के उन गिने-चुने नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने पंचायत विरोधी संघर्ष से लेकर संघीय गणतंत्र तक हर दौर में सत्ता और विपक्ष — दोनों की निर्णायक भूमिका निभाई।
वे पांच बार प्रधानमंत्री बने, सात बार सांसद चुने गए और दशकों तक कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के केंद्र में रहे। डडेलधुरा उनकी अजेय राजनीतिक प्रयोगशाला रही, जहां वाम गठबंधन के दौर में भी उन्हें कोई हरा नहीं सका।

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जेन–जी राजनीति बनाम पुराना नेतृत्व

लेकिन हाल के वर्षों में उभरे जेन–जी आंदोलन, युवा नेतृत्व की मांग और पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी ने देउवा जैसे नेताओं को धीरे-धीरे किनारे धकेल दिया। गगन थापा इस असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति बनकर उभरे, जिन्होंने संगठनात्मक ताकत और युवा समर्थन के बल पर कांग्रेस की सत्ता संरचना बदल दी।

सुदूरपश्चिम में चिंता और खालीपन

देउवा की संसदीय राजनीति के रुकने से सुदूरपश्चिम कांग्रेस में निराशा स्पष्ट दिखाई देती है। प्रदेश कांग्रेस महामंत्री मेघराज खड्का का कहना है कि

“शेरबहादुर देउवा जैसी राष्ट्रीय पहुँच और प्रभाव वाला नेता सुदूरपश्चिम में फिलहाल कोई नहीं है। उनके हटने से क्षेत्र की राजनीतिक पहुँच पर भी असर पड़ेगा।”

अन्तमे :

देउवा का संसद से बाहर होना चुनावी हार नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक कीमत है। यह घटना नेपाली कांग्रेस के इतिहास में उस मोड़ के रूप में दर्ज होगी, जहां पुराने सत्ता केंद्र को हटाकर नया नेतृत्व स्थापित हुआ — और उसी प्रक्रिया में एक युग का संसदीय अध्याय समाप्त हो गया।

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