सन् 1720 के प्लेग महामारी में भी मरे थे करोडों लोग
अजय श्रीवास्तव

ये घटना साल 1720 की है।ताकतवर फ्रांस के जान मर्सीले शहर में प्लेग का आक्रमण हुआ।लोगों के मरने की दर इतनी तेज थी कि एक को दफना कर आते तो पाँच निर्जीव शरीर अपने अंतिम संस्कार की बाट जोह रही होती।थोडे हीं समय में ये खूबसूरत शहर कब्रिस्तान में तब्दील हो गया।संक्रमण को रोकने के लिए 1,00,000 लोगों की हत्या की गई मगर मौत का ये सिलसिला अनवरत जारी थी।एक लाख की आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का 20% थी,जिन्हें मौत की नींद सुला दिया गया था।कुछ लोगों ने शहर को छोड़कर भागने की कोशिश की थी,जिन्हें पकडकर मार डाला गया।प्लेग को उन दिनों ब्लैक डेथ भी कहा जाता था।
प्लेग को उन दिनों ताऊन,ब्लैक डेथ,पेस्ट आदि नाम भी दिये गए थे।यह बीमारी मुख्य रूप से चूहों और पिस्सू से फैलता है।प्लेग को संसार की सबसे पुरानी महामारियों में शुमार किया गया है।पिस्सू के मरने के बाद विषाणु चूहों में प्रवेश करते हैं और फिर बाद में ये संक्रमण इंसानों में फैलता है।पेस्टिस नामक जीवाणु के संक्रमण के कारण यह बीमारी इंसानों मे फैलती है।इसमें तेज बुखार आता है और लसीका ग्रंथि सूज जाती है।कभी कभी प्लेग न्यूमोनिया का रूप धारण कर लेती है जिससे चिन्हित करना मुश्किल हो जाता है।

आपको बता दें इतिहास में प्लेग का जिक्र कई बार मिलता है।इस महामारी से यूरोप, अफ्रीका और एशिया में 07-20 करोड़ लोगों की जान गई थी।यह रोग कितना पुराना है इसका अंदाज इससे किया जा सकता है कि एफीरस के रूफुस ने,जो ट्राजन युग का चिकित्सक था “प्लेग के ब्यूबों” का जिक्र किया है और लिखा है कि ईसा पूर्व युग में 41 महामारियों के अभिलेख मिलते हैं।ईसा के समय से सन् 1500 तक 109 बडी महामारियां हुईं, जिनमें 14 वीं शताब्दी की ब्लैक डेथ प्रसिद्ध है।सन् 1500 से 1720 तक विश्वव्यापी महामारियां फैलीं।फिर 18 वीं और 19 वीं शताब्दी में शांति रही।सन् 1894 में हांगकांग में इसने फिर सर उठाया और जापान, भारत,तुर्की होते हुए सन् 1896 में यह रोग रूस जा पहुंचा।सन् 1898 में अरब,फारस,आँस्टि्या,अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका और हवाई द्वीप तथा सन् 1900 में इंग्लैंड, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में इसने तांडव किया।सन् 1898 से 1918 तक भारत में इसने एक करोड़ प्राणों की बली ली।
गौरतलब है कि प्लेग महामारियों के चक्र चलते रहते हैं।छठी शताब्दी में पचास वर्षों तक यूरोप में इसका एक दौर चला।समूचे रोमन साम्राज्य में प्लेग बंदरगाहों से आरंभ होकर दूरवर्ती नगरों की ओर फैला था।14 वीं शताब्दी में काली मौत के नए दौर आरंभ हुऐ, जिनमें मृत्यु संख्या भयावह थी।प्रथम दौर में तो अनेक नगरों की दो तिहाई से तीन चौथाई आबादी तक साफ हो गई।कहते हैं कि, इस चक्र में यूरोप में ढाई करोड़(अर्थात कुल आबादी के चौथाई)व्यक्ति मर गए।1664-65 में इतिहास प्रसिद्ध “ग्रेट प्लेग” का लंदन नगर पर आक्रमण हुआ।लंदन की आबादी चाढ़े चार लाख थी,जिसमें से दो तिहाई लोग डरकर भाग गए और बचे लोगों में से 68,596 प्लेग का शिकार हो गए।
सन् 1833 से 1845 तक मिस्र में प्लेग का तांडव होता रहा।पर इस समय यूरोप में विज्ञान का सूर्योदय हो रहा था और मिस्र के प्लेग का प्रथम बार अध्ययन किया गया।फ्रेंच वैज्ञानिकों ने बताया कि वास्तव में जितना बताया जाता है यह उतना संक्रमण नहीं है।सन् 1878 में वोल्गा महामारी से परेशान यूरोप ने सभी राज्यों में जाँच आयोग भेजे,जो महामारी समाप्त होने के बाद घटनास्थल पर पहुँचे।
इस समय तक भारत प्लेग से अछूता था।लोगों का विश्वास एक पुरानी कहावत पर था कि प्लेग सिंधु नदी नहीं पार कर सकता।19 वीं शताब्दी में ये मिथक भी टूटा।सन् 1815 में प्लेग ने सर्वप्रथम भारत में कदम रखा।उन दिनों गुजरात लगातार तीन वर्षों के अकाल से उबर रहा था।गुजरात के कच्छ और काठियावाड़ में इसने डेरा डाला,अगले वर्ष हैदराबाद(सिंध) और अहमदाबाद पर चढाई की।सन् 1836 में पाली(मारवाड़)से चलकर यह मेवाड़ पहुँचा पर रेगिस्तान की तप्त बालू में अधिक चल न पाया।
सन् 1823 में केदारनाथ(गढ़वाल)में,सन् 1834 से 1836 तक उत्तरी भारत के अन्य स्थलों पर आक्रमण हुए और सन् 1849 में यह दक्षिण की ओर बढा।सन् 1876 में प्लेग का एक और दौर शुरू हुआ।सन् 1898 से अगले 20 वर्षों तक इसने बंबई और बंगाल को हिला डाला।
आपको सितंबर 1994 गुजरात के सूरत शहर में प्लेग के ताडंव याद हीं होंगे।एकाएक प्लेग महामारी ने पूरे सूरत शहर को अपने आगोश में ले लिया।लोगों के मरने का सिलसिला इतनी तेजी से शुरू हुआ कि अस्पताल पहुँचने से पहले मौत ने उन्हें निगलना शुरू कर दिया था।सूरत में बडे पैमाने पर पलायन शुरू हो गया।पहले शहर के रईसों ने शहर को छोडा फिर तो एक हफ्ते के अंदर सूरत शहर की 25% आबादी बाहर चली गई।सूरत में बडी संख्या में उप्र और बिहार के गरीब मजदूर रहते थे जब उनका पलायन शुरू हुआ तो वो अपने साथ प्लेग के किटाणु अपने घर ले गए और फिर वहां भी प्लेग फैल गया।एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1994 में देश में 1800 करोड़ का नुकसान हुआ।कई हजार लोग इस महामारी में मारे गए थे और सूरत के पलायन को आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन कहा गया।ब्रिटिश अखबारों में इसे मध्यकालीन श्राप कहा गया।
भारत में प्लेग की वैक्सीन सर्वप्रथम 1897 में डाँक्टर हाँफकाइन ने मुंबई के ग्रांट मेडिकल कालेज के दो कमरे के लैब में बनाया था।यह देश में बनने वाली पहली वैक्सीन थी और ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे भेजा।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि प्लेग भूमध्यसागर के अत्यंत उष्ण प्रदेश को छोड़कर संसार के किसी भी प्रदेश में हो सकता है।इस दावे पर विश्वास करने का मन इस लिए भी करता है कि जब प्लेग 1836 में पाली(मारवाड़) से चलकर मेवाड़ पहुंचा तो उन दिनों पाली भीषण गर्मी से तप रहा था।बताते हैं कि प्लेग के विषाणु इस गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सके और यहाँ प्लेग तुरंत खत्म हो गया।कुछ लोगों का कहना है कि मौसम का प्लेग के विषाणुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
आज कोरोना वायरस महामारी से हम जूझ रहें हैं।सन् 1818-20 की स्पेनिश महामारी के बाद आज फिर इंसानी जिंदगी संकट में है।इन संक्रमण का एकमात्र इलाज इसका बचाव है जो लोग कर रहें हैं।भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने लोगों से अपील की है कि वे जितना कम हो सके घर से बाहर निकलें और सही मायने में यही कारगर इलाज है।

