Wed. Aug 5th, 2020

भगवान विष्‍णु को तुलसी अतिप्रिय है, एकादशी करने पर श्री हरि की पूजा , जप एवं उनका जागरण होता है

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एकादशी करने पर श्री हरि की पूजा , जप एवं उनका जागरण होता है। इस शुभ अवसर पर भक्‍तजन नियम संयम के साथ व्रत रखकर भगवान विष्‍णु की उपासना करते हैं और अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करते हैं। इस व्रत के पारण में कुछ विशेष चीजों का प्रयोग करने से आप व्रत का संपूर्ण फल प्राप्‍त होता है और देवतागण भी प्रसन्‍न होते हैं।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथों के अनुसार आइए जानते हैं किस महीने में किस चीज से करना चाहिए पारण…

1, कार्तिक में तुलसी पत्र और गंगाजल,
2, अगहन में तुलसी पत्र आंवला और गंगाजल,,
3, पौष में ईंख तुलसी पत्र और, गंगाजल
4, माघ में तिल का लड्डू तुलसी पत्र और गंगाजल,
5, फाल्गुन में, सेम का दाना, तुलसी पत्र और गंगाजल,
6, चैत्र में अगहनी चावल, तुलसी पत्र गंगाजल
7, वैशाख में जौ का सत्तू, मिश्री तुलसी पत्र एवं गंगाजल,
8, ज्येष्ठ में जीरे का पंजीरी , तुलसी पत्र और गंगा जल
9, आषाढ़ में चना दाल , तुलसी पत्र और गंगा जल,
10, सावन में तुलसी पत्र एवं शहद गंगाजल,
11 भादो में तुलसी पत्र गुड़ रोटी और गंगाजल,
1,अश्विन में तुलसी पत्र गंगाजल एवं दही चूड़ा या पुआ,

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भगवान विष्‍णु को तुलसी अतिप्रिय है। भगवान विष्‍णु से जुड़े सभी प्रकार के व्रत और अनुष्‍ठानों में भोग लगाने के वक्‍त तुलसी का प्रयोग अनिवार्य है। बिना तुलसी के भगवान भोग ग्रहण नहीं करते। इसलिए जो लोग एकादशी का व्रत रखकर अगले दिन तुलसी के पत्‍ते और गंगाजल से उसका पारण करते हैं उन्‍हें श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्‍त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
आंवले के पेड़ पर भगवान विष्‍णु का वास माना जाता है, इस कारण आंवले का महत्‍व बढ़ जाता है। देवोत्‍थान एकादशी व्रत का पारण आंवला खाकर करने सेस अखंड सौभाग्‍य, आरोग्‍य और संतानसुख की प्राप्ति होती है। आंवले की उत्‍पत्ति ब्रह्माजी के आंसुओं से हुई मानी जाती है। इस कारण भी इसे धार्मिक फल माना जाता है।
एकादशी व्रत के अगले दिन द्वादशी पर आप चावल खाकर भी व्रत का पारण कर सकते हैं। दरअसल एकादशी के दिन व्रत नहीं रखने वालों को भी चावल न खाने की मनाही होती है। मान्यता है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है। लेकिन द्वादशी को चावल खाकर व्रत का पारण करने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से सेम को कफ और पित्त नाशक माना गया है। यह व्रत शीतकाल में होता है जिस समय शरीर शीत से जल्दी प्रभावित हो सकता है। व्रत के बाद शरीर को बल और पुष्टि की जरूरत होती है। इन दिनों यह आसानी से उपलब्ध भी हो जाती है। इसलिए संभव है कि सेम से पारण की परंपरा चली आ रही हो।
पारण करने के लिए आप गाय के शुद्ध घी का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसे आध्‍यात्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्‍वपूर्ण माना गया है। सभी प्रकार के पूजापाठ यज्ञ और अनुष्‍ठान में घी का प्रयोग किया जाता है। भगवान का भोग प्रसाद बनाने के लिए भी घी का प्रयोग किया जाता है। इस कारण घी को सबसे शुद्ध पदार्थ माना गया है। वहीं दूसरी ओर व्रत के बाद शरीर को पोषक पदार्थों की आवश्‍यकता होती है और घी में वे पोषक गुण मौजूद होते हैं।
पारण करते समय कुछ चीजें गलती से भी न खा लें, इस बात का भी ध्‍यान रखना जरूरी होता है। इन चीजों में मूली, बैंगन, साग, मसूर दाल, लहसुन प्याज शामिल हैं। इस बात का ध्‍यान रखना जरूरी है कि आप खाने की जिन चीजों से व्रत का पारण करने जा रहे हैं उनको बनाने में इन चीजों का कतई प्रयोग न किया गया हो। बैंगन पित्‍त दोष को बढ़ाता है। साथ ही उत्‍तेजना वर्द्धक होने के कारण यह काम भाव को भी बढ़ाता है जो कि व्रत रखने के तुरंत बाद सही नहीं है। वहीं मसूर की दाल को भी अशुद्ध माना जाता है। इसलिए व्रत के आरम्भ एवं पारण में इसके सेवन से बचें,
मूली की तासीर ठंडी मानी जाती है। व्रत रखने के बाद शरीर कमजोर पड़ जाता है। शीत ऋतु में शरीर के कमजोर पड़ने पर ज्‍वर पकड़ने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में मूली का सेवन इसे और बढ़ावा दे सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि आप पारण करने में मूली न खाएं। वहीं लहसुन प्‍याज भी खाना वर्जित है। इन दोनों को तमोगुण वर्धक माना गया है। ये काम के भाव को भी बढ़ाते हैं। शास्‍त्रों में इसे राक्षसी भोजन कहा गया है। इनकी उत्‍पत्ति राहु नामक एक राक्षस के रक्‍त से हुई है, इसलिए इनमें तीक्ष्‍ण गंध है। ये उत्‍तेजना, क्रोध, हिंसा और अशांति पैदा करते हैं। इसलिए व्रत के पारण के प्‍याज लहसुन के पाने का प्रयोग भूलकर भी न करें।
आचार्य राधाकान्त शास्त्री,

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