31 अगस्त सोमवार को अनंत चतुर्दशी व्रत : आचार्य राधाकान्त शास्त्री
31 अगस्त सोमवार को अनंत चतुर्दशी व्रत:-
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी व्रत किया जाता है। और चतुर्दशी इस वर्ष 31 अगस्त सोमवार को प्रातः 8:30 से चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ हो रही है , और चुकी यह मध्यान्ह व्यापिनी व्रत है अतः इस व्रत को 31 अगस्त सोमवार को ही मनाया जाएगा।
इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है, जिससे भक्तों के सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। अनंत चतुर्दशी के दिन हीं विघ्नहर्ता श्रीगणेश जी का विसर्जन भी किया जाता है, ऐसे में अनंत चतुर्दशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। जो लोग गणेश चतुर्थी से 10 दिनों के लिए गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित करते हैं, वे अनंत चतुर्दशी को हर्षोल्लास के साथ बप्पा को विदा करते हैं और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथों के अनुसार
अनंत चतुर्दशी व्रत एवं पूजा विधि :-
व्रत करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि चतुर्दशी के दिन प्रातः काल में स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे। उसके पश्चात व्रत का संकल्प करके वास स्थान को स्वच्छ और सुशोभित करें।
फिर किसी चौकी पर मंडप बना उसमें भगवान विष्णु की साक्षात् मूर्ति अथवा कुश से बनाई हुई सात फणों वाली शेष स्वरुप भगवान अनन्त की मूर्ति स्थापित करें। फिर उसके आगे 14 गांठ का अनन्त का धागा रखें, इस अनंत सूत्र सूत के धागे को हल्दी में भिगोकर 14 गांठ लगाकर तैयार किया जाता है।
पुनः संकल्प विधि से भगवान का पाद्य, अर्घ्य, स्नान गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादि से भगवान का पूजन करें। पूजन में पंचामृत, पंजीरी, केले और मोदक आदि का प्रसाद श्रीहरि को अर्पण करें।
और नीचे दिए गए मंत्र से उनको प्रणाम करें
‘नमस्ते देव देवेश नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते सर्वनागेन्द्र नमस्ते पुरुषोत्तम।।’
पढ़ कर प्रणाम करें।
और कथा सुनें।
अनंत चतुर्दशी व्रत कथा :-
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथों के अनुसार,
प्राचीन काल में सुमन्तु ब्राह्मण की सुशीला कन्या का विवाह कौण्डिन्य के साथ हुई थी । और उसने अपने के साथ सर्व प्रथम इस व्रत को किया था। और अनन्त व्रत धारण किया। जिसके प्रभाव से वह महान धनी व सुखी हो गया। किन्तु एक बार कुयोगवश कौडिन्य ने अनन्त के डोरे को तोड़ कर आग में फेंक दिया, जिससे उसकी संपत्ति नष्ट हो गई। तब वह दुखी होकर अनन्त को देखने वन में चला गया। वहाँ उसने आम्र, गौ, वृष, खर, पुष्करिणी और एक वृद्ध ब्राह्मण मिले।
ब्राह्मण स्वयं अनन्त थे। वे उसे गुफा में ले गए, वहां जाकर बताया कि वह आम पेंड पूर्व में वेद पाठी ब्राह्मण था। किन्तु अपने विद्यार्थियों को न पढ़ाने से आम का पेंड हुआ है। ये गौ पृथ्वी थी, बीजापहरण से गौ हुई। वृष धर्म, खर क्रोध और पुष्करिणी बहनें थीं।
दानादि परस्पर लेने देने से पुष्करिणी हुई और बृद्ध ब्राह्मण मैं ही अनंत हूं। अब तुम घर जाओ। रास्ते में जो आम्रादि मिले तो उसको उसकी करनी का उनसे संदेशा कहते जाओ।
तुम दोनों स्त्री-पुरुष अनंत का व्रत पूरे श्रद्धा विश्वास के साथ करो, व्रत के प्रभाव से तुम्हारा गया हुआ राज्य व धन सब कुछ प्राप्त हो जाएगा एवं आनंदमय जीवन की प्राप्ति होगी।
और व्रत राज के प्रभाव से गया हुआ सब कुछ परिपूर्ण हुआ।
इस प्रकार इस व्रत को 14 वर्ष या (यथा सामर्थ्य) करना चाहिए, और नियत अवधि पूरी होने पर इसी दिन उद्यापन करें। उसके लिए सर्वतोभद्रस्थ कलश पर कुश निर्मित या सुवर्णमय अनन्त की मूर्ति और सोना, चांदी, ताँबा, रेशम या सूत्र का (14 ग्रंथ युक्त) अनंत भगवान का स्थापन करें।
उनका वेद मंत्रों से पूजन और तिल, घी, खांड, मेवा आदि से हवन करो। गोदान, शय्यादान, अन्नदान (14 घट, 14 सौभाग्य द्रव्य और 14 अनंत दान) करके 14 युग ब्राह्मणों को भोजन कराएं और फिर स्वयं भोजन करके व्रत को पूर्ण करें।
व्रत राज अनंत देव के प्रभाव से सभी भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री,
9431093636,
9934428775,

