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बौद्धिक सड़ांध और कचरा राजनीति : अजय कुमार झा

 

अजय कुमार झा, हिमालिनी पत्रिका, जनवरी, 2021 अंक । प्रधान मंत्री के पी शर्मा ओली के द्वारा किए गए संसद विघटन को लेकर उठे विवाद और संसद पुनस्र्थापना हेतु सर्वोच्च अदालत में पंजीकरण किए गए एक दर्जन से अधिक रिट निवेदनों का एक साथ जबाब देते हुए प्रधानमन्त्री ओली ने कहा कि प्रतिनिधिसभा विघटन विशुद्ध राजनीतिक निर्णय है, इसके लिए अदालत नहीं जनता के बीच जाने की हिम्मत दिखाइए ।

उन्होंने अपनी ही पार्टी के बहुमत की सरकार होते हुए भी समय से दो साल पहले चुनाव में जाने की बाध्यात्मक अवस्था को सार्वजनिक करते हुए कहा कि, “सरकार सञ्चालन में पार्टी भीतर से विदेशियों के इशारे पर बार–बार अवरोध उत्पन्न करना और वैकल्पिक सरकार गठन की सम्भावना भी नहीं होने कारण प्रतिनिधिसभा विघटन करना पड़ा । जबकि यथार्थ व्यक्तिगत अहंकार और ईष्र्या है । प्रधानन्त्री का पद खोने और राष्ट्रपति के ऊपर विरोधियों द्वारा महाअभियोग लगाने के डर का प्रतिरक्षात्मक कदम है । चीन, भारत और अमेरिकी योजनाओं के टकराव का परिणाम है ।

वर्तमान नेपाल के सभी पार्टी और प्रमुख नेताओं को विदेशी अपने–अपन खेमे में ले चुके हैं । किसी एक पार्टी और नेता पर यह दोष लगाना मूढ़ता होगी । मधेस में लोग अपने अधिकार के लिए आंदोलन करने पर बहादुरी के साथ भून दिए गए और ओली जी ने कहा था कि दो चार आम पेड़ से गिर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, अर्थात मधेस के लोग नेपाली नागरिक नहीं है । मधेसी को नेपाली सरकार द्वारा मानसिक रूप से विदेशियों के श्रेणी में रखा गया है । इस पुनीत कार्य के लिए फिलहाल चीन से भरपूर सहयोग मिल रहा है । चीन जानता है कि मधेस के लोग कदापि मेरे साथ खड़े नहीं होंगे । सुक्ष्म रूप में यही स्थिति यूरोपियन और अमेरिकन के भीतर भी है । भविष्य में वह भी मधेसी के साथ सौतेला व्यवहार ही करेंगे । अमेरिकी योजनाकार नेपाल को विशेष रणभूमि के रूप में देख रहे हैं ।

 

उसे नेपाल में अपनी स्थिति मजबूत करने के पीछे नेपालियों के विकास की योजना नहीं है, बल्कि एक संगठित हिन्दू संस्कृति के मूल को नष्ट करना है । साथ ही भारत और चीन के बढ़ते सामरिक शक्ति पर नियंत्रण करना है । आज चीन के साथ यूरोप के किसी भी देश में सामना करने की हैसियत नहीं है । एक दो करोड़ की जनसंख्या वाला यूरोपियन देश एक सौ चालीस करोड़ वाले भीषण जनसंख्या के सामने कितनी देर टिक सकेगा ? आज के कोरोना रूपी जैविक हथियार के चपेट में ही यूरोप की जनसंख्या स्वाहा होने के करीब है । यह जैविक आक्रमण ही है जो अनेक रूपों में हमारे समक्ष उपस्थित हो रहा है । आज जैविक हथियारों का अंबार लगा हुआ है, वो कहीं–न–कहीं तो अवश्य प्रयोग किया जाएगा । विश्व–शक्ति बन चुका चीन अब हर हाल में यूरोप को तबाह करना चाहेगा । जिसके लिए उसने कदम उठा लिया है । कभी अमेरिका अपनी जिस जैविक हथियारों पर गौरव करता था आज वह उसी जैविक आक्रमण के कारण भीषण आर्थिक और भौतिक तबाही को झेल रहा है । भारत एक पूर्ण लोकतांत्रिक देश होने के कारण इसकी आंतरिक समस्या अपने ही ढंग का होने से भारत के विकास की गति मंद है ।

 

भारत के आंतरिक उतार–चढ़ाव ही सबसे बड़ी समस्या है । इस तथ्य से चीन पूरी तरह वाकिफ है । चीन, भारत के इस कमजोरी से अच्छी तरह से लाभ लेना जानता है । जो चीन अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति के चुनाव को प्रभावित कर सकता है, उसके लिए राहुल गांधी और केजरीवाल जैसे को खरीदने में कितना समय लगेगा! इस प्रकार आज चीन ने दक्षिण एशिया में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपने दबाव से लोगों को प्रभावित कर दिया है । निश्चित राजनीतिक प्रणाली, एका हुकुम, आजन्म राष्ट्रपति, यह अपने–आप में एक विशेष सामथ्र्य को दर्शाता है । इस तरह की प्रणाली भारत अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में संभव नहीं है । चार–पांच वर्ष के भीतर में इन देशों के सरकार को बदलना है, और चीन अपने स्वाभाविक चरित्र के कारण अपने पक्ष के नेताओं के लिए इन देशों में भी दबाव बढ़ाएगा ही । इस तरह निकट भविष्य में ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चीन का शासन यूरोप और एशिया के अधिकांश देशों पर फलता–फूलता नजर आ रहा है ।

ऐसे में चीन के दबाव को नजरंदाज करने की हिम्मत नेपाल जैसा छोटा सा देश किस आधार पर कर सकता है! वर्तमान में नेपाल को त्रिकोणात्मक शक्ति संतुलन के वाह्य और आंतरिक संघर्ष को झेलना पड़ रहा है । देउवा, राउत और भट्टराई आदि कांग्रेस और कम्युनिस्ट के कुछ लोग अमेरिकी समर्थक माने जाते हैं तो वहीं प्रचण्ड, कोइराला परिवार और मधेसी नेताओं को भारत पक्षीय माना जाता है । इधर वर्तमान सरकार के मुखिया लोग चीन समर्थक कहे जाते हैं । राप्रपा को राजा और भारत समर्थक के रूप में ही लेना होगा । वैसे व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो इनमे से एक भी न देश के समर्थक हैं न किसी देश के सच्चे मित्र ही । ये सब के सब अर्थ–पद भक्त हैं । इन्हें सत्ता और संपत्ति चाहिए ।

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पड़ोसी देशों के पास धन की कमी है नहीं, उन्हें अपनी सुरक्षा और स्वार्थ पूर्ति करनी है । कोई हिमालय कब्जा करने में लगा है, तो कोई नदी का पानी कब्जा कर रहा है । हम बस चुपचाप देखने को मजबूर हैं । जिस प्रकार की हमारी राजनीतिक सोच है, उससे निकट भविष्य में ही नेपालियों को नेपाल में ही शरणार्थी बनकर जीने को बाध्य होना पड़ेगा । जातीय , क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अब हममें कटुता बढ़ायी जा रही है । धर्म परिवर्तन के नाम पर नेपालियों के बीच भयानक बिष घोला जा रहा है । राजनैतिक रूप से चरित्रहीन, भ्रष्ट तथा अदूरदर्शी नेता कार्यकर्ताओं को संरक्षण और संवर्धन किया जा रहा है, जो भविष्य में तीव्र रूप लेनेवाला है । नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता लाने में जितना दोष हम नेपाली नेताओं को देते हैं, उससे अधिक दोषी वैदेशिक षड़यंत्रकारी हैं ।

एकबार पुनः नेपाल अस्थिरता के चक्रव्यूह में फस चुका है । इस भयानक चक्रव्यूह को तोड़कर निकलने के लिए फिलहाल नेपालियों के पास कोई हथियार नहीं है । न कोई पार्टी और ना ही कोई राजनेता ऐसा है जिसपर देश भरोसा कर सके । जनता को फिर से इन कचरों में से ही किसी एक को अपना भविष्य मानकर सुख के आशा में खुश रहना होगा । ऋण में डूबते नेपाली नागरिक एक दिन ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाएंगे और आधुनिक गुलाम की जिंदगी जिएंगे । क्या हमें यह कहकर गौरवान्वित होते शर्म नहीं होता कि हम अपने पुर्वजों के साहस और शौर्य के कारण गुलाम नहीं रहें! वास्तव में हम तो मानसिक गुलामी के आदि हो गए हैं । जैसे गंदे नाली के कीड़े को गंदगी का भान नहीं होता, उसी प्रकार मानसिक गुलामों को गुलामी का अहसास नहीं होता है ।

हमें राणा, पंचायती और राजाओं से मुक्ति दिलाने वाला राष्ट्र भारत है । आज सरकार को विदेशियों ने गिराया है, और विदेशियों के इशारे पर अगला कदम भी उठाए जाने की प्रबल संभावना है । प्रधानमंत्री द्वारा राजनैतिक विषय को सर्वोच्च अदालत में पहुंचाना उचित नहीं है कहने के पीछे कुछ तो राज होगा । भारतीय पूर्व अधिकारियों द्वारा नेपाली संसद के पुनस्र्थापना के समर्थन में अभिव्यक्ति देना भी कुछ कहता है । कानूनविदों की चुप्पी भी कुछ रहस्य लिए हुए है । वैसे संसद रहे या चुनाव मे जाए, देश को पटरी पर लाना लगभग असम्भव है । माओवादी समझौता और मधेसी आंदोलन को हुए भी १२ वर्ष हो चुका है । अतः एक नया आंदोलन भी प्राकृतिक तौर पर भी संभव है । क्योंकि प्रत्येक १२ वर्ष पर सौर मंडल पर विशेष विस्फोट होता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर मनुष्य के मस्तिष्क पर पड़ता है । शायद वह समय फिर से लौट आया है । आम नेपालियों के मन–मस्तिष्क पर किसी अज्ञात खतरे की शंका उपशंका होने लगी है ।

अभी–अभी प्रधान मंत्री को उनके अभिन्न सहयोगी तथा सलाहकार नीरू पल ने अपने फेसबुक एकाउंट पर लिखा है कि, ‘सम्माननीय प्रधानमन्त्री जी! हिम्मत कीजिए, संघीयता को खारिज कर प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रधानमन्त्री और संसद के सीट को १०५, तथा केन्द्र में मन्त्रिमण्डल की संख्या अधिकतर १५ सदस्यीय कीजिए । साथ ही भ्रष्टाचारियों को जेल की कालकोठरी में ही नष्ट करने की हिम्म्त कीजिए! इससे आप नेपाली जनता के मनमस्तिष्क में सदा के लिए विराजमान रहेंगे । यह मेरा व्यक्तिगत विचार है । ’ इन्होंने आज से दो वर्ष पहले भी यह विचार संसद में रखा था । आज नेपाल के अधिकतर लोग इस विचार से सहमत भी हैं । प्रधान मंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव का मैं खुद ही बहुत बड़ा समर्थक और प्रचारक रहा हूं । भ्रष्टाचारी और देश बेचने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए । यदि प्रधानमंत्री जी इस तरह का क्रांतिकारी कदम उठाते हैं तो उन्हें नेपाली जनता अपने हृदय में ही नहीं बल्कि इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित करेगी । सत्ता सुख लेना अलग बात है जबकि ऐतिहासिक कदम उठाना एक महान चेतना का प्रतीक है । युग पुरुष का प्रतीक है । समाज सुधारक महर्षि का प्रतीक माना जाएगा । वैसे भी ओली जी का राजनीतिक भविष्य अब ज्यादा नहीं है । शारीरिक और तात्कालिक सामाजिक वातावरण अब उनके पक्ष में नहीं है । जबकि वो जाते–जाते युग पुरुष का खिताब ले सकते हैं । कोरोना महामारी के कारण विश्व की राजनीति में एक अलग स्वरूप खड़ा हो गया है । सारे किए कराए पर क्षण भर में पानी फिर सकता है । अतः नेपाली राजनीति में एक सृजनात्मक भूचाल लाने की क्षमता होने के कारण इस मौका का सदुपयोग करने के लिए हम आग्रह करते हैं ।

कोरोना महामारी और राजनैतिक खींचातानी के कारण छाए आर्थिक मंदी को लेकर लोगों में भारी निराशा छाया हुई है । जनजीवन अस्त–व्यस्त है । उधर भारत से कभी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु आवाज सुनाई देती है तो कभी पूर्व राजदूत श्री श्यामशरण जी जैसे अधिकारियों के द्वारा राजा को दूर रखने की बात कही जाती है । राजा का भारत के बजाय चीन परस्त होने की संभावना भारतीयों को अधिक लग रही है । वैसे भारत विरोधियों का नेपाल में कोई हैसियत नहीं रहा है । भारत विरोधी योजना से ही राजा वीरेंद्र को दुख झेलना पड़ा था, तो भट्टराई के सरकार को अविश्वास के मत को झेलना पड़ा । प्रचण्ड हो या बाबूराम चाहे कोई भी शीर्षस्थ नेता किसी भी पार्टी के क्यों न हो, उसे भारत के आगे झुकना ही पड़ा है । दिनभर भारत को गालियां बकने वाले भी रात को भारत के श्रीचरणों में नमन करते हैं । इसप्रकार नेपाली राजनीति में भारत का प्रभाव अत्यधिक होते हुए भी भारत विरोधी माहौल बना ही रहता है । कारण सिर्फ व्यक्तिवादी दृष्टिकोण है । नेपाली राजनीति में भारत ने सिर्फ व्यक्ति को आगे लाने का काम किया है । जिस प्रकार बच्चों को खेल सिखाया जाता है उसी प्रकार से नेपाली नेताओं को राजनीति का पाठ सिखाता रहा है भारत । “यूज एंड थ्रो“ के घृणित राजनीति से परेशान नेपाली नेता पैसा और पद तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन अपनी नजरों में सदा के लिए बुरी तरह गिर जाते हैं । पद लोलुपता, निकम्मापन और चाकड़ीबाजी प्रवृत्ति के कारण खुद तो अपना जमीर बेचते ही हैं, देश की आत्मा को और जनता के भरोसा तक को भी बेच देते हैं ।

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माओवादी जनांदोलन के बाद पार्टी और नेताओं की खरीद बिक्री का दर भी तीव्र हो गया है । जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण बिना जनता के मांग को ही देश को धर्म निरपेक्ष घोषित करना है । इनमें सारे के सारे बिके हुए थे । गणतंत्र के बाद देश में ईसाईकरण व्यापक रूप में सक्रिय होना, हिन्दू सनातन संस्कृति के विरुद्ध अपमान जनक शब्दों का प्रयोग कर वैमनस्य फैलाकर धार्मिक सहिष्णुता को खंडित कर द्वंद्व–सृजना करने की भूमिका तैयार करना । सामाजिक विभेद और वैमनस्य बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करना । गैर सरकारी संस्थाओं को इसमें सक्रिय कर अपना अभीष्ट प्राप्त करने की कोशिस करना । विश्व के मानचित्र से धीरे–धीरे हिन्दू धर्म और संस्कृति को विलुप्त करने की साजिश के तहत यूरोपियन यूनियन तथा अमेरिका के धार्मिक कट्टर पंथी द्वारा षडयंत्र रचकर एक मात्र हिन्दू देश नेपाल से हिन्दुओं को समाप्त करने की योजना पर काम करना ही इनका मौलिक उद्देश्य है ।

पदीय अहंकार और लालच के आगे न कोई सिद्धान्त होता है और न राष्ट्रीयता ही’ इसका ज्वलंत उदाहरण ओली के संसद विघटन प्रकरण से लिया जा सकता है । इससे पहले कांग्रेस के नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला ऐसे पुण्य कर्मो का आरंभ कर ख्याति कमा चुके है । इससे क्या प्रमाणित होता है कि नेपाल में सत्तावाद के अलावा अन्य कोई सिद्धान्त नहीं है । अर्थात सबके सब राजावादी हैं । कोई आजीवन पार्टी अध्यक्ष रहने के लिए नियम कानून तोड़ रहा है, तो कोई कांग्रेस आई की तरह पारिवारिक वर्चस्व के आगे जनता को तुच्छ समझ रहा है । कोई जातीय सत्ता स्थापित करने के अहंकार से प्रभावित है तो कोई राजा की छत्र छाया में राणाबाद को स्थापित कर आम नागरिक को गुलाम बनाने में व्यस्त है । यहां हर कोई दूसरों को गुलाम बनाने और खुद को राजा बनाने में लगा हुआ है । अतः इतने शकुनियों और कंसो के बीच हम अपने को कैसे सुरक्षित अनुभव कर सकते हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है! आज नेपाली जनता पूर्णतः निरीह और अभिभावक विहीन अवस्था में खुद को पा रही है । २००७ साल के सशस्त्र आंदोलन में आम जनता को बलिदान देना पड़ा, माओवादी जनयुद्ध में २५ हजार आम नागरिकों का जीवन बर्बाद हुआ । लेकिन हम आम लोग क्या पाए! मधेसी, थारू, जनजाति, किराती, नेबार, लामा, शेर्पा ने तो हजारों बलिदानी के बावजूद नए संविधान में खुद को सुरक्षित तक नहीं कर पाए । वाहुन क्षेत्री के अलावा इस संविधान का सब ने विरोध ही किया था, लेकिन हुआ क्या! रेशम चौधरी संसद होते हुए जेल काट रहे हैं, जबकि अदालत से दण्डित लोग ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं, क्योंकि संविधान और न्याय कानून व्यवस्था किसी खास जाति और व्यक्ति से निर्देशित है । जसपा के लाख चिल्लाने पर भी सरकार ने रेशम चौधरी की हथकड़ी को नहीं खोला, जबकि प्रचण्ड के एक हुंकार से पूरी व्यवस्था कम्पायमान हो जाती है । इससे यही तथ्य निकलता है कि नेपाल में संविधान और कानून, सरकार के आगे नतमस्तक हैं, जबकि लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि होता है और व्यवस्था किसी भी व्यक्ति से ऊपर होता है, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और प्रधान न्यायाधीश ही क्यों न हो । विडंबना देखिए! जब मधेस मूल के राष्ट्रपति थे तब एक दो कौड़ी के नेता भी चेतावनी भरा अमर्यादित वक्तव्य संप्रेषित कर देता था, लेकिन आज उनकी जुबान बंद है । इसी को जातीय दंभ और राजवादी सोच से ग्रसित होने की संज्ञा दी जाती है ।

आज सोशल मीडिया की सक्रियता के कारण हर कोई इस तथ्य और षड़यंत्र से वाकिफ है । हर किसी के दिल में इन सामंतियों के प्रति घृणा है, बदले की भावना पनप चुकी है, हर कोई अवसर की तलाश में है, ऐसी परिस्थिति में समाज का कल्याण कदापि संभव नहीं । सिंह दरबार में मंत्री लूट रहे हैं तो स्याल दरबार जंत्री लूट रहा है । देश को मंत्री और गांव को अध्यक्ष खोखला करने पर तुला है । जनता हर हाल में दीनता को प्राप्त हो रही है । सफल उन्मुक्ति का कोई रास्ता नहीं दिख रहा । आकुलता और व्याकुलता से त्रस्त नागरिक किसी दिव्य तारणहार की कल्पना तो कर रही है लेकिन घने अंधकार में, जहां कदम–कदम पर ठोकर ही मिल रही हैं । विदेशी हस्तक्षेप सर से पांच तक जकड़े जा रहा है । भ्रष्टाचारी संस्कार के कारण वैदेशिक ऋण में जनता डूबती जा रही है । व्यक्तिगत लाभ के लिए देश के धर्म, संस्कृति और भूगोल को गिरवी रखा जा रहा है । समग्र आधिकारिक संयंत्र को क्षणिक लाभ के लिए दूषित किया जा रहा है । आखिर जनता करे तो क्या करे? वह जाय तो जाय कहां? क्या सड़क पर चिल्लाने से समस्या का समाधान हो जाएगा! क्या सरकार बदलने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा? क्या सिद्धान्त का नाम बदलने से व्यक्ति के संस्कार मिट जाएंगे? नहीं! फिर से नया अतिवाद स्थापित हो जाएगा । नया राष्ट्रवाद स्थापित हो जाएगा । हो सकता है वह अति राष्ट्रवाद अपने ही देशवासियों के खिलाफ हो! मधेसी और जनजाति तथा थारूओं के खिलाफ हो जाय! यहां कुछ भी संभव है ।

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आज का पाखंड से भरा मानवतावाद और सेक्युलरवाद धीरे–धीरे फेल हो रहा है, लोग दूसरे विचारों की और देख रहे हैं, इसी के लिए आने वाले दिनों में समकालिक विचार से प्रभावित होते हुए, युवा और आधुनिक सोच को आत्मसात किये हुए, राष्ट्रवाद का प्रबल और प्रभावी प्रस्तुतिकरण करने वाले हजÞारों विचारकों का सृजन कैसे हो उसकी चिंता हमें करनी होगी, हम पहले से ही देरी से चल रहे हैं ।
एक संप्रभु राज्य की सीमा के भीतर समान संस्कृति, समान भाषा, समान जातीयता और समान ऐतिहासिकता में पली बढीे जनता मिलकर जब एक सामूहिक सामुदायिक अस्मिता की रचना करती है तब हम उसे राष्ट्रीयता का एक रूप मानते हैं ।

जिसमें समानता एवं स्वतन्त्रता की प्रत्याभूति, राजनीतिक अधिकार, सुशासन का स्तर, आत्मनिर्भर अर्थतन्त्र, सामाजिक न्याय, सामाजिक विविधता से संयुक्त विकास के तह और दूरगामी समझदारी के आधार पर ही राष्ट्रीयता का मापन और राष्ट्रवाद की व्याख्या की जा सकती है ।
राष्ट्रवाद स्वाभाविक रूप में सांस्कृतिक एकरूपता स्थापित करने अथवा एकल सांस्कृतिक वर्चश्व को निरंतरता देने की प्रवृत्ति से प्रेरित होता है । यही एकल वर्चस्व वाली अवधारणा राष्ट्र के लिए आंतरिक संधर्ष का कारण भी बन जाता है । जिसे हम नेपाल के परिप्रक्ष्य में भी महसूस कर सकते हैं ।

पृथ्वी पर मनुष्य का प्रादुर्भाव होने के साथ ही उसकी आवश्यकताओं का क्रम भी आगे बढ़ा और इन आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयासों के साथ ही मनुष्य और समाज का जुड़ाव अस्तित्व की रक्षा हेतु संघर्ष आर्थिक क्रियाकलाप और शक्ति संचय के अभिप्राय से हुआ जो आज न देशभक्ति को समझ पाता है न राष्ट्रीय अखंडता को । सत्ता सर्वोपरि होने की सोच से ग्रसित नेता, सामाजिक अभियंता, साहित्यकार, कलाकार, लेखक, विचारक, धर्मगुरु, शिक्षक, विश्वविद्यालय आदि के कारण आज हम अपनी सांस्कृतिक विरासतों और भौगोलिक अखंडता को नेस्तनाबूत करने पर तुले हैं । हम वैदेशिक आयातीत षड़यंत्रपूर्ण वामपंथी विचारधारा से वशीभूत हो चंद पैसों और क्षुद्र पदों के लिए अपने ही हाथों से अपने संतानों की बर्बादी का कब्र खोदकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं ।
ध्यातव्य हो, राष्ट्रवाद विशेष कालखंड में एक विशेष अवधारणा को लेकर आगे बढ़ता है । आज चीनी मोबाइल एप, रक्षाबन्धन की राखी, दीपावली के दीप और होली के रंग पर प्रतिबंध गौरव पूर्ण राष्ट्रवाद का परिचायक साबित हुआ, जो कभी हमारे व्यापार तथा राष्ट्रीय उन्नति के लिए राष्ट्रवाद का आधार था । भारत को टुकड़ा कर पाकिस्तान बनाना कभी नेहरू और गाँधी के लिए राष्ट्रवाद का प्रतीक था, जिसका प्रमाण उन दोनों को मिल रहे राष्ट्रीय सम्मान से मिलता है, तो वहीं पर पटेल के द्वारा सैकड़ों रियासत और राज्यों को भारत मे विलय करा एक शक्तिशाली विशाल भारत का निर्माण भी राष्ट्रवाद का ही द्योतक था । आज काश्मीर को अलग राज्य का दर्जा हटाना राष्ट्रवाद है तो कभी यह दर्जा देना भी राष्ट्रवाद ही था ।

जनसंख्या नियंत्रण कानून आज का एक मजबूत राष्ट्रवाद है तो वही लोकल को वोकल और आत्मनिर्भरता एक मजबूत राष्ट्रवाद की आधारशिला साबित होनेवाली है । शिक्षा में क्रांति के तहत दक्ष जनशक्ति का निर्माण विश्व महाशक्ति भारत का एक मजबूत कदम इसी का पोषण करता है । इसी प्रकार मधेस और भारत विरोधी नारा तब का चुनावी राष्ट्रवाद था तो आज प्रधान मंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव, भ्रष्टाचारियों को कड़ी सजा और हिन्दू राष्ट्र की घोषणा दीर्घकालीन वैज्ञानिक राष्ट्रवाद होगा । वैसे कूड़ा–कचरा से पूरित मस्तिष्क में इन लोकप्रिय दिव्य उपदेशों के लिए कोई स्थान नहीं होता है । देश के प्रमुख पद पर आसीन होकर भी अपनों को अभद्र शब्दों से संबोधित करना व्यक्तिगत घटियापन तथा सामाजिक कुसंस्कार के साथ साथ राष्ट्रीयता को भी कलंकित करता है । इस स्तर की सड़ी हुईं मानसिकता वाले नेताओं से देश को बचाना आज की सर्वोत्तम राष्ट्रीयता मानी जाएगी ।

अजयकुमार झा, जलेश्वर

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