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अब चुप रह न सकुंगी मै : निशा अग्रवाल

 

अब चुप रह न सकुंगी मै

 

सदि से सदियों तक
निःशब्द यंत्रवत
मैं वही करती आई
जो तुमने कहा
वही देखा वही सोचा
जो तुम्हें सही लगा ।

पर अब, घुट रही हूं मै
भीतर से कहीं मिट रही हूं मै
शब्द मानो सब चीर कर
बाहर निकलने को आतुर
मेरा साहस – मेरी कुंठाएं
मन फिर भी भयातुर

छटपटाहत है मन में
मेरे दर्द, मेरी आहों से
निजात पाने की
पराधीनता की तोड़ बेड़ियाँ
खोया अस्तित्व खोज लाने की

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एहसास करवाया तुम्हें दर्द का
तुम अनदेखा कर गए
मौन तोड़, दर्द की दवा मांगी
तुम अनसुना कर गए

क्या करूं……..
मजबूर कर दिया है तुमने
ये दर्द अब सह न सकुंगी
ये जंजीरें अब ढो न सकुंगीं
लावा जो अंतस में मेरे
उबल रहा है सदियों से
अब इसे थाम न सकुंगी

न तुम्हें पुकारूंगी अब
न तुमसे कुछ मांगुगी
अब खुद के लिए मै
खुद को सम्भालूंगी

सिंहनाद बहुत हुआ
मुझे कुचलने को सदा
अब होगा एक सिंहनी का नाद
क्योंकि अब ………
चुप रह न सकुंगी मै।
कुछ करके रहूंगी मैं।।।।

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निशा अग्रवाल
धरान

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