Thu. Jul 9th, 2020
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जल न जाऊँ बस विरह अग्नि में मै आज, अब के सावन में  : इन्दु तोदी ,

" अब के सावन में  ""   रिम झिम पड़ी जो सावन की फुहार, बढ रही है हद से अधिक प्यास, गा रहा पत्ता पत्ता...

मैं सागर हूं, मैं खुद की शरहदें जानता हूं.. : नन्द सारस्वत स्वदेशी

----मैं सागर हूं---- मैं सागर हूं,मैं खुद की शरहदें जानता हूं.. अपनी मौज में बहता हूं,खुद की हदें पहचानता हूं, चाहूं तो कर सकता हूं...

अब ढूंढो एक प्रेम का नगर जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई क्लेश, : अंशु झा

रे पंछी अब ढूंढो, एक प्रेम का नगर, जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई क्लेश, रे पंछी अब ढूंढो,...

अनजान की मौत पर : वीरेन्द्र बहादुर सिंह

-वीरेन्द्र बहादुर सिंह | अमन बालकनी में खड़ा आराम से सिगरेट के कश पर कश लगाते हुए इस तरह धुआं उड़ा रहा था, जैसे इस...

वतन के वास्ते : स्मृति श्रीवास्तव

वतन के वास्ते एक दीपक जल रहा, देखो वतन के वास्ते। एक ही मंजिल सपहर की, ना अलग है रास्ते। एक दीपक जल रहा, देखो...

साहित्य अपडेट
साहित्य

जल न जाऊँ बस विरह अग्नि में मै आज, अब के सावन में  : इन्दु तोदी ,

” अब के सावन में  “” रिम झिम पड़ी जो सावन की फुहार, बढ रही है हद से अधिक प्यास, …
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मैं सागर हूं, मैं खुद की शरहदें जानता हूं.. : नन्द सारस्वत स्वदेशी

—-मैं सागर हूं—- मैं सागर हूं,मैं खुद की शरहदें जानता हूं.. अपनी मौज में बहता हूं,खुद की हदें पहचानता हूं, …
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अब ढूंढो एक प्रेम का नगर जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई क्लेश, : अंशु झा

रे पंछी अब ढूंढो, एक प्रेम का नगर, जहां न घृणा हो, न हो द्वेष, न कपट हो, न कोई …
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अनजान की मौत पर : वीरेन्द्र बहादुर सिंह

-वीरेन्द्र बहादुर सिंह | अमन बालकनी में खड़ा आराम से सिगरेट के कश पर कश लगाते हुए इस तरह धुआं …
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वतन के वास्ते : स्मृति श्रीवास्तव

वतन के वास्ते एक दीपक जल रहा, देखो वतन के वास्ते। एक ही मंजिल सपहर की, ना अलग है रास्ते। …
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वही तो शिक्षक कहलाता है : एस एस डोगरा

वही तो शिक्षक कहलाता है हम सब के जीवन में जो भी हमें कुछ अच्छा सीखा जाता है जी हां, …
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देश के अभिमान हैं ये, देश के स्वाभिमान हैं ये, इनसे है देश की शान, सलाम है उन वीर जवानों को

सलाम वीरो कोे रंजु गुप्ता सलाम उन वीरों को जिनके अदम्य साहस पर अभिमान करते जिनके शौर्यता के परचम लहराते …
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क्या खूब लगती हो…. “योग करो निरोग रहो” : कमला भंसाली जैन

कविता,राग-:क्या खूब लगती हो…. “योग करो निरोग रहो” योगासन करने से सारे सुख मिलते हैं, जीवन मे तन-मन के सारे …
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नेपाल की संस्कृति की जड़ो मे हिंदी है : प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, ग्वालियर । नेपाली संसद मे हिंदी भाषा को प्रतिबंधित करने की चर्चा बल पकड़ रही है। नेपाल मे …
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देश हमारा सिसक रहा है इसे कब तक रोने देंगे : श्यामानन्द ठाकुर

भबिस्य के प्रश्न …. बहु हमारी बोली एक दिन क्या है मेरा नाता । प्रथम नागरिक मैं बन नही सकती …
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