१०० रुपये की सरहद और लहूलुहान स्वाभिमान: क्या सिंहदरबार ने मधेश की गरिमा की यही कीमत लगाई है?
तस्करों की महफ़िल में बैठकर जो कानून सिखाते हैं,
वो क्या जानें कि १०० रुपये में घर कैसे चलाते हैं।
मेरी त्वचा का रंग गहरा है तो शक मत करना ऐ हाकिम,
हम वो हैं जो मिट्टी में मिल कर देश का पेट पालते हैं
सरहद की उस धूल में लिपटी सिसकियाँ, जहाँ एक ७९ साल का बुजुर्ग अपने ही वतन में ‘परदेशी’ बना दिया जाता है। यह कहानी उस लहूलुहान स्वाभिमान की है, जिसे बालेन सरकार ने मात्र १०० रुपये की रसीद में तौल दिया है। जहाँ सगुन की पोटलियाँ वर्दी के अहंकार तले रौंदी जाती हैं और ‘रोटी-बेटी’ के पवित्र रिश्तों को तस्करी का नाम दिया जाता है। क्या सिंहदरबार की चकाचौंध में मधेशी पसीने की गूँज खो गई है, या आज भी हमारी पहचान का फैसला केवल हमारी त्वचा के रंग से होगा? यह महज़ एक लेख नहीं, बल्कि उस माटी का विलाप है जिसे विकास के नाम पर केवल आश्वासन मिले और नागरिकता के नाम पर सिर्फ संदेह। जहाँ प्रशासनिक ‘प्रतिभा’ संवेदनाओं से कोसों दूर खड़ी है, वहाँ हर मधेशी का लहू आज अपने वजूद और वफ़ादारी का हिसाब माँग रहा है। आइए, उस कड़वे सच का सामना करें जहाँ कानून ‘शिकारी’ है और आम नागरिक उसका ‘नियत शिकार’।
मधेश डायरी स्थान: नेपाल-भारत सीमा
१. प्रतीकों का भ्रम और यथार्थ की कड़वाहट
जब काठमांडू के वातानुकूलित ड्राइंग रूम में सत्ता के गलियारों की चर्चा होती है, तो वहां के संभ्रांत वर्ग (Elite Class) बड़े गर्व से तर्क देते हैं— “देखो, डॉ. रामवरण यादव राष्ट्रपति बने, परमानंद झा उपराष्ट्रपति बने और अब बालेन शाह प्रधानमंत्री हैं। फिर मधेशी खुद को उपेक्षित कैसे कह सकते हैं?” लेकिन ये लोग एक बुनियादी और मर्मस्पर्शी सच्चाई भूल जाते हैं। “गमले में गुलाब रोपना और गुलाब की खेती करने में बहुत फर्क होता है।” गमले का गुलाब सत्ता की सजावट के लिए होता है; उसे अपनी सुविधा के अनुसार धूप और पानी दिया जाता है ताकि वह दुनिया को ‘समावेशिता’ का भ्रम दे सके। लेकिन गुलाब की खेती वह है जहाँ पूरी मिट्टी महके, जहाँ हर पौधे को बराबर पोषण मिले और जहाँ कांटों के बीच खिलने वाले हर फूल का अपना सम्मान हो।
नेपाल की सत्ता ने कुछ मधेशी चेहरों को ‘गमले के गुलाब’ की तरह ऊंचे पदों पर तो सजाया, लेकिन मधेश की पूरी ‘खेती’—यानी वहां की आम जनता—को आज भी उपेक्षा, धूल और अपमान की आग में झुलसने के लिए छोड़ दिया है।
२. रंग का दंश: राष्ट्रवाद की संकीर्ण दीवारें
“सूरज की तपिश ने बदन काला किया तो क्या हुआ, खून मेरा भी इसी मिट्टी की वफ़ा में लाल है।
पर अफ़सोस, कि मेरे देश के हुक्मरानों की नज़र में,मेरा रंग ही आज मेरा सबसे बड़ा सवाल है।”
पूरी दुनिया में आज नस्लवाद के खिलाफ युद्ध छिड़ा है, लेकिन नेपाल के प्रशासनिक मानस से यह जहर आज २०२६ में भी नहीं निकला। मधेश की तपती धूप में जलकर काली पड़ी हमारी त्वचा आज भी यहाँ के शासक वर्ग के लिए तिरस्कार का विषय है।
“काली त्वचा लेकर मधेश में जन्म लेना ही सबसे बड़ा अपराध है।” यह वाक्य किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी है। नेपाल के राष्ट्रवाद को लंबे समय तक एक खास रंग, एक खास भाषा और एक खास वेशभूषा के दायरे में कैद रखा गया। आज भी, एक वर्दीधारी जब किसी मधेशी को देखता है, तो उसकी पहली प्रतिक्रिया ‘अपनत्व’ की नहीं, बल्कि ‘संदेह’ की होती है।
एक नागरिक को जब हताशा में यह कहना पड़े कि “अगर हमारे बस में होता तो हम भी खस-आर्य कुल में पैदा होते,” तो समझ लीजिए कि उस देश का सामाजिक ताना-बना पूरी तरह सड़ चुका है। जब एक इंसान अपनी पहचान और अपने वजूद से नफरत करने लगे, तो यह उस राष्ट्र की सबसे बड़ी नैतिक हार है।
३. ७९ साल का बुजुर्ग और २८ साल का अहंकार: “ए तुम, इधर आओ!”
“तस्करों की गाड़ियों को रास्ता मिल जाता है, यहाँ तो सगुन की पोटली भी रोती है।
उस ७९ साल के बुज़ुर्ग के ‘तुम’ वाले ज़ख्म से पूछो,कि स्वाभिमान की कीमत कितनी कड़वी होती है।”
अपमान की सबसे कड़वी घूँट तब पीनी पड़ती है जब ७९ साल का एक वयोवृद्ध, जो शायद एक रिटायर्ड प्रथम श्रेणी अधिकारी या एक वरिष्ठ डॉक्टर है, सीमा की चौकी पर पहुँचता है। वर्दी का अहंकार उसकी सफेद दाढ़ी और उसके कांपते हाथों का मोल नहीं समझता। २८ साल का एक पुलिस अधिकारी, जो उसके पोते के समान है, केवल उसके गहरे रंग और मधेशी हुलिए को देखकर कर्कश स्वर में चिल्लाता है— “ए तुम! इधर आओ। क्या है इस थैले में?”
काठमांडू के लोगों के लिए बालेन शाह प्रधानमंत्री हो सकते हैं, लेकिन सीमा पर उस ७९ साल के बुजुर्ग के लिए सिस्टम आज भी वही ‘क्रूर शिकारी’ है। वहां आपकी डिग्री, आपका अनुभव या आपकी ७९ साल की तपस्या काम नहीं आती, वहां आपका ‘रंग’ आपकी सजा बन जाता है।
४. “बचत” बनाम “तस्करी”: अस्तित्व की जंग
काठमांडू की सत्ता जब नीति बनाती है, तो वह आंकड़ों में ‘राजस्व’ (Revenue) देखती है, लेकिन मधेश की धूल भरी सड़कों पर वह ‘अस्तित्व’ (Existence) का सवाल होता है।
इस ‘मजबूरी के गणित’ को अगर विस्तार से देखा जाए, तो यह शासन की संवेदनाओं पर कुछ गंभीर प्रश्न खड़े करता है:
१. “बचत” को “अपराध” का नाम देना
एक मध्यवर्गीय परिवार के लिए ५००-१००० रुपये की बचत महज कुछ नोट नहीं हैं। यह मधेश की उस वास्तविकता का हिस्सा है जहाँ:
वह बचत बच्चों की स्कूल की कॉपियाँ बन जाती है।
वह बचत बुजुर्गों की मासिक दवा का सहारा बनती है। जब सरकार एक आम आदमी को, जो अपनी साइकिल पर दो किलो चीनी और एक पैकेट दाल लेकर आ रहा है, ‘राजस्व चोर’ की श्रेणी में खड़ा करती है, तो वह उस नागरिक के संघर्ष का अपमान करती है।
२. आर्थिक मजबूरी बनाम सुशासन का ढोंग
सीमा पार के बाजारों (रक्सौल, जोगबनी…..) का सस्ता होना मधेशी जनता की गलती नहीं है, बल्कि यह नेपाल के भीतर बाजार नियंत्रण और आपूर्ति तंत्र की विफलता है।
यदि घर के पास का बाजार किफायती होता, तो कोई भी ७९ साल का बुजुर्ग चिलचिलाती धूप में सीमा पार जाने का जोखिम नहीं उठाता।
सरकार अपनी विफलता को छिपाने के लिए ‘सख्ती’ का सहारा ले रही है, जो सीधे तौर पर ‘गरीब पर प्रहार’ है।
३. “मगरमच्छ” सुरक्षित, “मछलियाँ” जाल में
यह सबसे कड़वा सच है कि भन्सार की नई नीतियां और बालेन सरकार की सख्ती केवल उन पर लागू होती है जिनके पास सत्ता का संरक्षण नहीं है।
संगठित तस्करी: जो ट्रकों में माल लाते हैं, वे सिस्टम के ‘हिस्सेदार’ हैं। उनके लिए सीमाएं हमेशा खुली हैं।
आम नागरिक: जो केवल अपनी ‘उत्तरजीविता’ के लिए संघर्ष कर रहा है, वह पुलिस का ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन जाता है क्योंकि उसे डराना और उससे जुर्माना वसूलना सबसे आसान है।
“जिसे तुम ‘राजस्व की चोरी’ कहते हो ऐ हुक्मरान, वह किसी गरीब के घर के चूल्हे की आस है।
तुम्हारी फाइलों में जो आंकड़ा महज एक नंबर है, वह सरहद पर बसे नागरिक के स्वाभिमान का उपहास है।”
यह प्रशासनिक विफलता का चरम है: जब राज्य अपने सबसे वफादार और मेहनती नागरिकों को ही ‘चोर’ समझने लगे, तो समझ लीजिए कि सत्ता का नैतिक आधार पूरी तरह ढह चुका है। २०२६ का नेपाल अगर केवल काठमांडू के चश्मे से मधेश को देखेगा, तो वह कभी एक ‘राष्ट्र’ नहीं बन पाएगा।
५. “माफिया” को संरक्षण, “आम आदमी” पर वार
यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जो बॉर्डर माफिया और बड़े तस्कर हैं, वे ट्रकों के ट्रक माल सीमा पार करा देते हैं।
गठबंधन: इन माफियाओं का स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ गहरा “सेटिंग” का रिश्ता होता है। उनके लिए न कोई १०० रुपये का नियम है और न ही कोई चेकिंग। वे सिस्टम के हिस्से हैं।
सॉफ्ट टारगेट: पुलिस को अपनी बहादुरी दिखाने और ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए केवल वही आम नागरिक मिलता है जो अपनी साइकिल पर ५ किलो चीनी ला रहा है। माफिया को ‘सलाम’ और नागरिक को ‘गाली’—यही आज की व्यवस्था है।
६. बालेन शाह और नई नीति का प्रभाव (2026): खौफ का सुशासन
प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने २०२६ में सीमा पर जो ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ और सख्ती की नीति अपनाई, उसका धरातल पर एक वीभत्स रूप सामने आया है। जिस सख्ती का उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और तस्करी रोकना था, उसने वास्तव में भ्रष्ट अधिकारियों को भ्रष्टाचार का एक नया और वैध हथियार थमा दिया है।
१. १०० रुपये की जंजीर और रिश्वत का नया रेट
१०० रुपये की सीमा ने सीमावर्ती प्रशासन के लिए ‘लूट का नया लाइसेंस’ जारी कर दिया है।
भय का व्यापार: एक आम नागरिक, जो केवल ५०० रुपये बचाने के लिए सीमा पार गया था, उसे भन्सार कार्यालय की पेचीदगियों और भारी जुर्माने का डर दिखाया जाता है।
सेटिंग का खेल: गरीब नागरिक के पास दो ही विकल्प बचते हैं—या तो वह अपना सामान (सगुन की पोटली) जप्त करवा दे, या फिर ‘सेटिंग’ के नाम पर ५००-७०० रुपये उस अधिकारी की जेब में डाल दे। यह व्यवस्था सुशासन नहीं, बल्कि सरकारी वसूली का संगठित तंत्र बन चुकी है।
२. ‘किताबी प्रतिभा’ बनाम ‘सांस्कृतिक शून्यता’
लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा पास करके आए अधिकारियों में ‘किताबी मेधा’ तो भरपूर है, लेकिन मधेशी समाज की सांस्कृतिक समझ (Cultural Intelligence) शून्य है।
अंधा कानून: जब एक अधिकारी यह नहीं समझ पाता कि सीमा पार से आने वाला ‘दही-चिवड़ा’ या ‘साड़ी’ कोई व्यावसायिक वस्तु नहीं बल्कि एक ‘पवित्र भेंट’ है, तो उसकी शिक्षा केवल एक बोझ बन जाती है।
सुरक्षा नहीं, खौफ: जब कानून मानवीय चेहरे के बजाय केवल ‘कागजों’ से बात करता है, तो वह जनता के लिए सुरक्षा का एहसास नहीं, बल्कि अपमान और खौफ का कारण बन जाता है।
३. इंटेलिजेंस की विफलता या माफिया को अभयदान?
यह कहना कि सरकार के पास सरहद के बड़े माफियाओं और तस्करों की जानकारी नहीं है, २०२६ का सबसे बड़ा सफेद झूठ है।
निशाने पर कौन? सरकारी इंटेलिजेंस और खुफिया तंत्र का उपयोग आज ‘असली अपराधियों’ को पकड़ने के बजाय उन ‘सॉफ्ट टारगेट्स'(आम नागरिकों) की पहचान करने में किया जा रहा है, जिनसे आसानी से पैसा वसूला जा सके।
मगरमच्छों का सुरक्षा कवच: बड़े तस्कर आज भी ट्रकों के काफिले बेखौफ निकालते हैं क्योंकि वे सिस्टम के ‘संरक्षक’ हैं। यह दोहरा मापदंड मधेशी जनता के साथ किया जा रहा एक मानवीय अपराध है।
७. १०० रुपये की जंजीर: रोटी-बेटी के रिश्तों पर भन्सार
नेपाल-भारत सीमा दुनिया की सबसे अनोखी सरहद है। २०२६ की बालेन सरकार ने इन रिश्तों की कीमत १०० रुपये लगा दी है।
दही-चिवड़ा का अपमान: मधेशी संस्कृति में जब कोई रिश्तेदार आता है, तो वह दही, चिवड़ा, मिठाई और सगुन के कपड़े लाता है। क्या वित्त मंत्री को पता है कि आज की महंगाई में एक किलो मिठाई भी १०० रुपये में नहीं आती?
सगुन की नीलामी: जब पुलिस उस सगुन की पोटली को सड़क पर बिखेर देती है, तो वह केवल सामान नहीं बिखेरती, वह एक भाई की भावना और एक बहन के स्वाभिमान को नीलाम करती है।
निष्कर्ष: स्वाभिमान की पुकार
बालेन शाह और सिंहदरबार के अधिकारियों को समझना होगा कि मधेश को ‘नियमों की कि़ताब’ से ज्यादा ‘संवेदना की भाषा’ की ज़रूरत है। प्रशासनिक प्रतिभा का क्या लाभ, अगर वह एक ७९ साल के बुजुर्ग के आंसुओं की भाषा न पढ़ सके?
जब तक सरकार सीमा पर “बड़े मगरमच्छों” (Big Fish) को नहीं पकड़ेगी, तब तक आम जनता को परेशान करना केवल एक मानवीय अपराधहै। जिस दिन सीमा पर तैनात सिपाही ७९ साल के बुजुर्ग को “बाबा” कहकर पुकारेगा, उसी दिन नेपाल वास्तव में एक राष्ट्र बनेगा।
“हमें ‘शिकार’ समझना बंद करो। हमारी गरिमा १०० रुपये की मोहताज नहीं है, वह इस मिट्टी के हजारों साल पुराने इतिहास में दफन है।”. विजय यादव


