रूस-यूक्रेन संकट चुनौतीपूर्ण सहअस्तित्व : प्रेमचंद्र सिंह
प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ, 11 मार्च। अमेरिका सहित यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों तथा उनके सहगामी अन्य देशों और उनके संचारतंत्रों (मीडिया) द्वारा रूस-यूक्रेन सैन्य संघर्ष के संबंध में एक सोची-समझी रणनीति के तहत रूस के खिलाफ जोरदार मुहिम छेड़ी गयी है कि यूक्रेन की संप्रभुता पर रूस का एकतरफा आक्रमण है। इनमें से कोई भी देश यह नही कह रहा है कि अमेरिका के नेतृत्ववाली पश्चिमी देशों का सैन्य संगठन नार्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के असीमित सैन्य प्रसार से रूस की सुरक्षा को मिल रही चुनौती के समक्ष वर्तमान संकट रूस की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।अगर यूरोपियन यूनियन तथा नाटो में सम्मिलित देश रूस की सुरक्षा चिंता के प्रति संबेदनशील रबैया अपनाते और उसकी शांतिपूर्ण समाधान का प्रयास करते, तो वर्तमान सैन्य संकट से बचा जा सकता था। हद तो तब हो गयी जब मास्को से केवल 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यूक्रेन को नाटो का ‘अग्रगणी संभावित सदस्य’ के रूप में पश्चिमी देशों ने भड़काऊ घोषणा कर दिया। ऐसे में अमेरिका सहित नाटो देशों की ओर से रूस के लिए इससे बड़ा उकसावा और क्या हो सकता था कि यूक्रेन के नाटो के परिधि में आते ही मास्को से मात्र 300 किलोमीटर दूर रूस-यूक्रेन बॉर्डर पर रूस के खिलाफ नाभकीय मिसाइल सिस्टम सहित अन्य अति आधुनिक विध्वंसक सैन्य उपकरणों और नाटो सेनाओं की तैनाती हो जाये।
रूस,यूक्रेन,बेलारूस सहित पूर्वी यूरोप के देशों में आमतौर पर स्लाव जाति के लोग बहुसंख्यक है और रूसी भाषा बोलने बाले इन देशों में कही बहुसंख्यक हैं, तो कही अल्पसंख्यक। ऐसे में वर्ष-1991 से पूर्व पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश सोवियत यूनियन का ही हिस्सा थे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी यूरोप के देशों ने रूस की बढ़ती सामरिक ताकत और कम्युनिस्ट विचारधारा के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए नाटो साझा सैन्य-संगठन बनाया।वर्ष-1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध और वॉरसॉ संधि की समाप्ति के बाद नाटो अप्रासंगिक हो गया, उसके बाद भी नाटो को अस्तित्व में रखना और लगातार रूस सरीखा सैन्यशक्ति संपन्न देश की यूरोपीय सीमा की ओर उसका प्रसार करना सीधे तौर पर रूस को डराने और धमकाने जैसा रबैया था। यूरोप में रूस की सामरिक अहमियत इसीसे समझा जा सकता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी को अकेले दम पर रूस ने केवल हराया ही नही बल्कि जर्मनी की शहर बर्लिन के आधे भाग तक अपना आधिपत्य जमा लिया और बर्लिन के बीचोबीच दीवार खड़ा करा दिया, जबकि यूरोपीय देश और अमेरिका भी एक साथ मिलकर जर्मनी का कुछ नही बिगाड़ पाए। आज भी रूस यूरोप की गैस और पेट्रोलियम ऊर्जा का सबसे बड़ा निर्यातक है और यूरोप के उद्योग की जीवन रेखा ही रूस की गैस और पेट्रोलियम पाइपलाइन नॉर्द स्ट्रीम-1 और नॉर्द स्ट्रीम-2 है। यूरोप में जर्मनी जैसे उन्नत औद्योगिक देश से लेकर ब्रिटैन,नीदरलैंड तथा हंगरी सरीखे देशों ने भी रूस से गैस और पेट्रोलियम आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाने सरीखे किसी भी अमेरिकी तथा अन्य यूरोपीय देशों के प्रयास का खुलकर विरोध किया है, साथ ही यूक्रेन को ‘नो फ्लाई जोन’ घोषित करने के मसले पर भी पोलैंड सहित कई अन्य यूरोपीय देश विरोध कर रहे है। स्पष्टतया रूस के मामले में यूरोप दो हिस्सों में बंटा दिखता है। वैश्विक स्तर पर यूएनजीए और यूएनएससी में भारत, चीन, पाकिस्तान सहित 31 देशों ने रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रायोजित प्रस्ताव का समर्थन नही किया और अन्य 5 देशों ने खुलकर उन प्रस्तावों का विरोध किया, उसके बाद अफगानिस्तान की तालिवान सरकार, म्यांमार की सैन्य जून्टा सरकार सहित कई अन्य देशों की सरकारों ने भी रूस का समर्थन किया है।
पश्चिमी देशों में इस वैश्विक मानव त्रास्दी के प्रति दूरदृष्टि की कमी दिखती है। ऐतिहासिक रूप से यूक्रेन रूस का हिस्सा रहा है और इसकी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति रूस की सुरक्षा के लिए अहम है। मिसाल के तौर पर वर्ष-1812 में जब फ्रांस का शासक नेपोलियन ने रूस पर आक्रमण किया,तो वह भी बेलारूस-यूक्रेन के जमीनी रास्ते से ही रूस में घुसा था, दुबारा वर्ष-1941 में भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इसी रास्ते से जर्मनी के शासक हिटलर द्वारा रूस पर आक्रमण किया गया। इन सब का भयानक असर रूस के सामरिक सोझ-समझ पर पड़ा और उसका गहरा असर आजतक रुस के दिलोदिमाग मे बना हुआ है।
जब पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के बिघटन के साथ ही शीत-युद्ध जीत ली और वर्लिन की दीवार के गिरने के साथ ही जर्मनी का एकीकरण हो गया।उसके बाद पश्चिमी देशों ने रूस को आश्वासन दिया था कि अब वे नाटो को समाप्त कर देंगे, उस समय रूस ने यह भी कहा था कि नाटो के खत्म न होने की स्थिति में रूस भी नाटो में आने की इच्छा रखता है। जब सोवियत रूस का विघटन हो गया, उसके बाद रूस सरीखे महत्वपूर्ण यूरोपीय देश को यूरोपीय सुरक्षा कबच का हिस्सा बनाना यूरोप की जिम्मेवारी थी।इसके बाबजूद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने जबरदस्त तरीके से नाटो का विस्तार शुरू कर दिया और रूस को अपमानित करना शुरू कर दिया। सोवियत संघ से टूटे 15 देशों में से अधिकांश देशों को नाटो में ले लिया गया और वहां भारी सैनिक साजो सामान के साथ सैनिक उपस्थिति सुनिश्चित की गई। अगर जंगी हालात बनते हैं तो नाटो के सभी 30 से अधिक देश मिलकर रूस और उसके सहयोगी देशों को दबोच लेंगे। इसका रूस के मनोस्थिति पर जो असर पड़ेगा, वह समझना किसी के लिए मुश्किल नही है।
इतना ही नही, रूस के साथ पश्चिमी देशों की जितनी सामरिक संधियां थी उन्हें इन पश्चिमी देशों ने एकतरफा तोड़ना शुरू कर दिया। वर्ष-2002 में एन्टी बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी को तोड़ा, वर्ष-2019 में आईएनएफ संधि (इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फ़ोर्स ट्रीटी) को तोड़ दिया, स्ट्रेट ट्रीटी तोड़ा गया और फिर वर्ष-2020 में ओपन स्काई संधि से निकल गए।
वर्ष-2008 में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कहा कि जॉर्जिया को नाटो में शामिल कर लेंगे, तब रूस द्वारा अपनी प्रतिक्रिया के तहत जॉर्जिया के अबखाजिया और दक्षिणी ओसेटिया क्षेत्र पर आक्रमण किया गया। अब फिर से पश्चिमी देशों ने वर्ष-2020 में रूस के साथ वही सब करना शुरू कर दिया, मसलन यूक्रेन को ‘एडवांस्ड पोटेंशियल पार्टनर’ का दर्जा दे दिया और इसके बहाने यूक्रेन को हथियार देना शुरू कर दिया। साथ ही रूस को धमकी दिया कि अगर रूस इस मामले में कुछ भी किया तो वे रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा देंगे। ऐसे में व्लादिमीर पुतिन ऐसा मजबूत नेता जब रूस का राष्ट्रपति है, तो इन पश्चिमी देशों को राष्ट्रपति पुतिन की मनोदशा समझना चाहिए कि वह उनके उकसावे पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देगा। यह सब समझे बिना पश्चिमी देशों ने अतिवादी रुख अपना लिया। उसका नतीजा जमीन पर दिख रहा है कि रूस ने अपना बचाव के लिए सैन्य आक्रमण को सबसे अच्छा विकल्प माना। इसपर पश्चिमी देशों की ओर से असैनिक प्रतिक्रिया के रूप में रूस पर एक के बाद एक आर्थिक प्रतिबंध लग रहा है, जिसका असर केवल रूस तक ही सीमित नही रहेगा, इसका असर संपूर्ण यूरोप, यूक्रेन,एशिया सब पर पड़ेगा। पश्चिमी देशों ने एकवार फिर अपनी राष्ट्रीय अहंकारपूर्ण भू-राजनीति के कारण विश्व को संकट में डाल दिया है।
इस पृष्ठभूमि में रूस ने ‘ग्रेज-ऑन कनफ्लिक्ट’ रणनीति के तहत उक्रेन के पूर्वी हिस्सा दोनबास की डोनेस्क और लोहांस्क क्षेत्र में आक्रामक कार्यवाही शुरू कर दिया। इन क्षेत्रों में रूसी भाषी बहुसंख्यक है और
रूस उनको हथियार देकर यूक्रेन के भीतर अलगाववादी उपद्रव शुरू करा दिया। यह उपद्रव इसलिए शुरू हुआ क्योंकि वर्ष-2014 में यूक्रेन और यूक्रेन के भीतर दोनबास क्षेत्र के रूसी भाषी अलगाववादियों के बीच हुई ‘मिन्स्क संधि’ में पश्चिमी देशों ने रूस के सामरिक और रणनीतिक हितों की जो गारंटी दी थी, उसका अनुपालन यूक्रेन ने नही किया और पश्चिमी देशों ने भी अमल करने के लिए यूक्रेन पर दबाव नही बनाया। उसके बाद रूस ने यूक्रेन में सामान्य गैर-परंपरागत युद्ध (लो लेवल एसिमेट्रिकल युद्ध) मसलन इनफार्मेशन वारफेयर, साइबर अटैक, अलगाववादियों (नॉन-स्टेट एक्टर) का इस्तेमाल आदि सबकुछ शुरू कर दिया। जब पश्चिमी देशों ने यूक्रेन को रूस के खिलाफ मोहरा बनाकर रूस की बर्दास्त सीमा को तोड़ा, तो रूस ने गैर-पारंपरिक संघर्ष को हाइब्रिड लड़ाई में बदल दिया जिसमें गैर-परंपरागत और परंपरागत लडाई के दोनों तरीको को यूक्रेन के खिलाफ उपयोग करना शुरू कर दिया। इसमें रूस ने तीन फौजी कोर को बेलारूस और दक्षिण-पूर्व रूस के बॉर्डर पर तैनात कर दिया। इसके अतिरिक्त रूस ने काला समुद्र में अपने दोनों नेवी फ्लीट को सक्रिय कर दिया। काला समुद्र रूस के लिए मेडिटरेनियन समुद्र में जाने के लिए महत्वपूर्ण रास्ता है और मेडिटरेनियन समुद्र में रूस के दो महत्वपूर्ण सैन्य बल तैनात है जो पश्चिम एशिया के लिए आवश्यक रूसी सामरिक नीति का हिस्सा है। रूस की रणनीति यह है कि क्रिमिया के समुद्री तट से लेकर मारियूपोल और दोनबास होते हुए रूस तक एक लैंड कॉरिडोर बनाया जाए, ताकि अजोव समुद्र और काला सागर पर रूस का एकाधिकार रहे। दूसरी चीज यह कि यूक्रेन की राजधानी कीव पर दवाब बनाई जाए और वहां रूस समर्थक सरकार बनाई जाए। उस सरकार से क्रिमीआ को रूस का हिस्सा मानने के लिए समर्थन हासिल की जाय और यूक्रेन को तटस्थ रहने की गारंटी ली जाए। तीसरी बात यह है कि रूस यूक्रेन को गैर-सैन्य देश बनाना चाहता है। साथ ही नाटो की सेना को इस सैन्य अभियान से दूर रखने के लिए रूस ने अपने नाभिकीय बल को सक्रिय रखा हुआ है। रूस काला सागर स्थित खेरसन और ओडेसा पोर्ट सिटी पर कब्जा कर यूक्रेन को काला सागर से काटते हुए यूक्रेन को लैंडलॉक्ड देश बनाने की योजना पर काम करता दिख रहा है। रूस ने यूक्रेन के सभी नाभकीय प्रतिष्ठानों को अपने कब्जे में ले लिया है और अमेरिका द्वारा यूक्रेन में पोषित करीब 30 ‘जैविक हथियार लैब’ (जो चीन के वुहान स्थित वाईरोलॉजी लैब के समतुल्य) को ध्वस्त कर दिया है। अब वह कीव की ओर पूरी ताकत से बढ़ रहा हैं। नाटो यूक्रेन की रक्षा के लिए आने से मना कर दिया है और यूक्रेन को ‘नो फ्लाई ज़ोन’ घोषित करने की हिम्मत पश्चमी देश नही जुटा पा रहे हैं,ऐसे में यह कुछ ही दिनों की बात है कि रूस कीव को कब्जा में ले लेगा। उसके बाद जो भी यूक्रेनी नेतृत्व बचेगा उसके साथ रूस सीजफायर करके बातचीत के माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेगा। सैन्य अभियान के धीमा होने के पीछे यूक्रेन की शहरी आवादी और उसके बागी तेवर तथा शहरों के पुराने रिहायसी इलाके की सकड़ी गलियों के रास्ते टैंक तथा बख्तर बंद गाड़ियों के जखीरे को जाने में मुश्किलात एक बड़ी कारण रही है, साथ ही विदेशी नागरिकों खासकर भारतीयों के निकासी का मसला भी उनके लिए अहम है। जो भी हो रूस-यूक्रेन सैन्य संकट के लिए यह सप्ताह निर्णायक होगा।
“खिलाफ- ए-ज़ुल्म बगावत भी करनी पड़ती है,
गलत निजाम को आखिर बदलना पड़ता है “
यूरोप की शक्ति संतुलन स्पष्टया रूस के पक्ष में ही है अन्यथा पश्चिमी देशों


