जनयुद्ध को अपराधीकरण करने वालों से ७ सवाल : गोपाल ठाकुर
बीरगंज । सर्वोच्च अदालत ने प्रधानमंत्री प्रचंड के खिलाफ याचिका दर्ज करने का दिया आदेश देने के बाद भूचाल सा आ गया है जिस पर अलग-अलग क्रिया-प्रतिक्रिया, आरोप-प्रत्यारोप, शंका-उपशंका पैदा हो रहा है। इन्ही बिषयों के मद्देनजर रखते हुए बहुचर्चित भाषाविज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक गोपाल ठाकुर ने ७ प्रश्न किए है, इन प्रश्नों ने नेपाल के इतिहास के गर्भ में दबे ज्वलंत तथ्यों को चिंगारी लगा दी है।
जनयुद्ध को अपराधीकरण करने वालों से सवाल है कि :—
१. क्या गोरखा राज्य विस्तार अभियान अहिंसात्मक था ?
२. राजा को अघोषित बंदी बनाकर खड़ा किया गया राणाशासन अहिंसात्मक था ?
३. क्रांति कही गई १९५०-५१ का नेपाली काँग्रेस का सशस्त्र आंदोलन हिंसात्मक था ?
४. क्या १९६० का राजा महेन्द्र का सैनिक कु अहिंसात्मक था ?
५. क्या धर्मराज ढकाल सहित के सामंतो के खिलाफ झापाली कम्युनिष्टों का सशस्त्र आंदोलन अहिंसात्मक था ?
६. क्या १९७९ में विद्यार्थी आंदोलन पर राजा वीरेन्द्र का सैनिक दमन अहिंसात्मक था ?
७. क्या १९९० में संयुक्त जनांदोलन पर राजा वीरेन्द्री दमदम गोली वर्षा अहिंसात्मक थी ?
अगर ये सभी हिंसात्मक थे और जायज भी तो जनयुद्ध भी हिंसात्मक और जायज ही था जिसकी बुनियाद पर अभी संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र खड़ा है । अतः जनयुद्ध को अपराधीकरण करने का प्रयास आततायी राजशाही को फिर से न्यौता देने का राज्य विरुद्ध का राजनीतिक अपराध है जिसके लिए पुनः ऐसे प्रतिगामियों को दंडित करना जरूरी है ।
याद रहे :— राजनीतिक सत्ता का जन्म और खात्मा हिंसा के जरिए ही संभव है ।
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति ईश्वर प्रसाद खतीवाड़ा और न्यायमूर्ति हरि प्रसाद फुयाल की संयुक्त पीठ द्वारा शुक्रवार को पारित आदेश के बाद सत्तारूढ़ पार्टी के महासचिव देव गुरुंग ने एक बयान में कहा कि सर्वोच्च अदालत द्वारा पारित आदेश ने नेकपा (माओवादी केंद्र) का गंभीरता से ध्यान आकर्षित किया है। हम ऐसी गतिविधियों की निंदा करते हैं जो नेपाल के संविधान द्वारा गारंटीकृत धर्मनिरपेक्षता, समावेशिता और लोकतांत्रिक गणतंत्र प्रणाली की उपलब्धियों के खिलाफ हैं। बयान में कहा गया है, ऐसे समय में जब ‘सत्य और सुलह आयोग’ और ‘गायब होने के मामलों के लिए आयोग’ संक्रमणकालीन न्याय के तहत अपना काम कर रहे हैं, ऐसा आदेश शांति प्रक्रिया के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करेगा।
नेकपा (माओवादी केंद्र) के प्रमुख प्रचंड ने 15 जनवरी, 2020 को कहा था कि वह एक दशक से चल रहे विद्रोह का नेतृत्व करने वाली माओवादी पार्टी के नेता के रूप में 5,000 लोगों की मौत की जिम्मेदारी लेंगे और राज्य को शेष मौतों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। वकील ज्ञानेंद्र आरन और कल्याण बुधाथोकी ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कर मांग की कि प्रचंड के बयान की जांच की जाए और उन पर मुकदमा चलाया जाए।
हालांकि, प्रशासन ने पिछले साल नवंबर में यह दावा करते हुए उनके खिलाफ मामला दर्ज करने से इसलिए इनकार कर दिया था कि यह मुद्दा संक्रमणकालीन न्याय से संबंधित है। सत्य और सुलह आयोग मामलों को देख रहा है।
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रशासन को विद्रोह के दौरान 5,000 मौतों के लिए ‘प्रचंड’ के खिलाफ रिट याचिकाएं दर्ज करने का आदेश दिया था। व्यस्त कार्यक्रम और श्रमबल की कमी के कारण रविवार को मामला दर्ज नहीं किया जा सका और संभावना है कि सोमवार को होली के त्योहार के बाद मामला दर्ज किया जाएगा।
13 फरवरी, 1996 को शुरू हुआ विद्रोह आधिकारिक तौर पर 21 नवंबर, 2006 को तत्कालीन सरकार के साथ एक व्यापक शांति समझौते के बाद समाप्त हो गया। एक दशक तक चले विद्रोह के दौरान करीब 17,000 लोगों की जान जाने का अनुमान है।

