29 अगस्त 1942 को रीगा के चार शहीदों ने शहादत देकर आज़ादी का रास्ता प्रशस्त किया

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर
भारत की आजादी की लड़ाई में भारत छोड़ो आंदोलन में 29 अगस्त 1942 को तत्कालीन मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी के रीगा क्षेत्र के मथुरा मंडल , मौजे झा, सुखराम महरा, और ननू मिया ने अपनी शहादत देकर आज़ादी का रास्ता प्रशस्त किया।
24 अगस्त 1942 को बाजपट्टी मे आंदोलनकारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार के एसडीओ, पुलिस इंस्पेक्टर, हवलदार इत्यादि की हत्या के बाद अंग्रेजी पुलिस द्वारा बाजपट्टी, पुपरी, सुरसंड मे पुलिस के साथ भिड़ंत में दर्जनों स्वतंत्रता सेनानियों के शहादत से अंग्रेजो के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी चारों ओर फैल चुकी थी।
29 अगस्त 1942 ई को आंदोलनकारियों ने रीगा रेलवे स्टेशन को कब्जे में लेकर तिरंगा झंडा फहराया।आंदोलन का नेतृत्व करते हुए रेल की पटरी उखाड़ने तथा टेलीफोन का तार काटते समय अंग्रेजी पुलिस की गोली से रीगा शेरबा टोल के मौजे झा तथा सुखराम महरा शहीद हो गए। पुलिस की गोली से घायल मेजरगंज के ननू मिया दो महीने बाद शहीद हो गए । बभनगामा के रामनीहोरा मंडल ने छात्रों की टोली का नेतृत्व किया था। प्रमुख आंदोलनकारियों में रीगा गांव के मोहनलाल शर्मा, रामाशीष् मंडल, रघुनाथ मंडल, इत्यादि थे।
रीगा के रेवासी गांव में अंग्रेजी पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच भयंकर मुठभेड़ हुआ। जिसमे पुलिस की गोली से रेवासी के मथुरा मंडल शहीद हो गए तथा राजाराम मंडल, लीला मंडल, रकटू मंडल, सूरज कुर्मी, बंगाली मंडल, यमुना मेहता, नेवी मंडल, नंदलाल मेहता, बुनीलाल राय, सहदेव राय, सुंदर मेहता इत्यादि घायल हो गए।
इस बावत शहीद रामफल मंडल जी के जीवनी के लेखक सह जिले के गुमनाम अमर शहीदों के शोधकर्ता शिक्षाविद बिनोद बिहारी मंडल ने सरकार, प्रशासन एवम् जनप्रतिनिधियों पर शहीदों एवम् उनके परिवार के प्रति उपेक्षा का आरोप लगाया है।

