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लोभी ब्राह्मण और राजनैतिक परिदृश्य :अमरदीप मोक्तान

 
अमरदीप मोक्तान ( लेखक )
अमरदीप मोक्तान
( लेखक )

शीर्षक देखकर निश्चित रूप से ऐसा लगना जायज है कि एक जाति विशेष को लोभी शब्द से विभूषित किया गया जबकि, ऐसा बिल्कुल नहीं है, शब्दों पर यदि गम्भीरता पूर्वक ध्यान दिया जाय तो यह विशुद्ध रूप से लोभी प्रवृति के ब्राह्मणों के प्रति मात्र इंगित है । लोभी शब्द का प्रयोग ब्राह्मण प्रति इंगित क्यों किया गया, इसका कारण क्या है इसके लिए कृष्ण लीला के एक प्रसङ्ग का उल्लेख करना अति जरूरी है । द्वापर में कंश नामक एक प्रभावशाली राजा हुआ करते थे, भविष्यवाणी के अनुसार कंश कोे ज्ञात था उसका वध उनके भान्जा कृष्ण के हाथों होना है इसलिए कंश ने अपने मृत्यु के कारक कृष्ण की हत्या करने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन हमेशा असफलता ही हाथ लगी । कृष्ण के हाथों अपनी मृत्यु होने की बातों से चिन्तित और त्रसित कंश ने अपने विश्वासपात्र सेनापति को कहा अबकी बार किसी भी हालत में कृष्ण का वध सुनिश्चित हो सके ऐसे सक्षम योद्धा की तलाश कर दरबार में पेश किया जाय । कुछ दिन पश्चात सेनापति ने कृष्ण वध करने को सक्षम अचुक अस्त्र प्राप्ति की सूचना दरबार में भिजवाई, सूचना प्राप्त होते ही कंश ने तत्काल उस अचूक अस्त्र को जाँचने परखने लिए दरबार में पेश होने का आदेश दिया, सेनापति उस अचुक अस्त्र के साथ दरबार परिसर में हाजिर हुए । कंश ने सेनापति को एक कपड़े में लिपटे हुए निरीह ब्राह्मण के साथ प्रवेश करते देखा, कंश ने सेनापति से पूछा क्या यही वह अचूक अस्त्र है जो कृष्ण का वध कर सकता है, सेनापति ने उत्तर दिया महाराज निश्चित रूप में आप इस निरीह ब्राह्मण को देखकर सोच रहे हाेंगे क्या यह निरीह सा दिखने वाला ब्राह्मण कृष्ण वध कर सकता है, लेकिन महाराज इस ब्राह्मण की शारीरिक दुर्वलता पर मत जाइए यह ब्राह्मण मायावी विद्या में पारगंत है इसकी मायावी शक्ति के आगे बडेÞ से बडेÞ योद्धा भी नहीं टिक सकते है ।  सेनापति की बात को सुनने के बाद कंश ने ब्राह्मण की मायावी शक्ति को देखने की इच्छा जाहिर की ब्राह्मण ने तत्काल मंत्र से विशालकाय राक्षस को प्रकट कर कंश को चकित कर दिया । ब्राह्मण के मायावी शक्ति को देखकर कंश को विश्वास हो गया कि यही है वह अचूक अस्त्र जो कृष्ण वध कर सकता है । कंश ब्राह्मण के मायावी शक्ति पर संतुष्ट तो नजर आए लेकिन कंश के हृदय में एक उत्सुकता और शंका बनी रही, अपने भीतर उठ रही शंका को दूर करने के लिए सेनापति को ब्राह्मण से कुछ दूर ले जाकर कहा इसमे कोई संदेह नहीं की इस ब्राह्मण में कृष्ण वध करने की अपार शक्ति विद्यमान है लेकिन याद रहे यह व्यक्ति “ब्राह्मण” है, जिसका कृष्ण से दूर–दूर तक कोई नाता एवं वैरभाव नहीं वह चन्द पैसो के खातिर आखिर कृष्ण वध जैसे गम्भीर अपराध का भागीधार क्यों बनेगा ? कंश के भीतर उपजे हुए शंका को दूर करने लिए हुए सेनापति ने उत्तर दिया महाराज यदि “ब्राह्मण” में लोभ समा जाय  और वह लोभी बन जाय तो उसका चरित्र “चाण्डाल” से भी बदतर हो जाता है अतएव आप निश्चिन्त रहे महाराज यह ब्राह्मण कृष्ण वध करने में सफल हो कर रहेगा । २०४८ साल से ले कर २०७२ बैशाख के महाभूकम्प तक नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य का विश्लेषण किया जाय तो कृष्ण प्रसाद से लेकर सुशील कोइराला तक और भविष्य में अपेक्षित के. पी. ओली, जिसे देखे लोभी ब्राह्मण के समूह के अलावा कुछ नहीं दिखता जहाँ देंखे वहीं उनका ही बोलवाला है । २०४८ साल पश्चात मनमोहन अधिकारी और कृष्ण प्रसाद भट्टराई को छोड़कर प्रायः सत्ता की बागडोर असफल सत्ता लोभी ब्राह्मण गिरिजा प्रसाद कोइराला, माधव नेपाल, झलनाथ खनाल, बाबुराम भट्टराई, सुशील कोइराला के इर्द–गिर्द ही घूमता रहा हाल आकर रुग्ण के. पी. ओली के कंधो पर राष्ट्रीय सरकार सौपने की तैयारी तीब्र गति में चल रही है । गौर से ध्यान दिया जाय तो पहाड़ पर अन्याय नहीं होने देंगे ऐसी वकालत करते हुए पहाड़ी लोभी ब्राह्मणों का झुण्ड नजर आता है तो दूसरी तरफ मधेस का मसीहा बनने की होड़ में अल्पसंख्यक लोभी ब्राह्मणों का झुण्ड अग्रपंक्ति में नजर आता है जबकि इन दोनो के चाल, चरित्र में रत्तीभर फरक नहीं है, २०४८ साल से २०७२ साल तक के २४ वर्षों के काल खण्ड को देखा जाए तो यह २४ वर्षो के काल खण्ड में जनता का अभिमत मात्र विभिन्न ब्राह्मणाें को स्थापित करने के अलावा कुछ नहीं हुआ, नेपाली जनता का राष्ट–विकास के लिए दिया हुआ अभिमत भट्टराई, कोइराला, खनाल, नेपाल और हाल आ कर ओली वंश स्थापित करने में खर्च हो रहा है,  आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा ? नेपाल लोभी ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त होकर कब विकास की गति में तीव्रता से दौड़ेगा ? सर्वगुणयुक्त नेपाल सत्तालोभी ब्राह्मण के बर्चस्व के कारण क्रमशः पतन की ओर अग्रसर होता जा रहा है, कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है मानो नेपाल मात्र ब्राह्मणो का देश है, यहा कोई अन्य समुदाय रहते ही नहीं हंै ।
२०७२ बैशाख १२ के महाभूकम्प पश्चात पराकम्पन में न्यूनीकरण से जनजीवन तो सामान्य हो रहा है इसके साथ राष्ट्रीय आवश्यकता का जामा पहनाकर राष्ट्र सरकार निर्माण की चर्चा जोरो पर है और राष्ट्रीय सरकार का नेतृत्व तथा स्वरूप के विषय में चर्चा एवं बैठक में वही लोभी ब्राह्मण का समूह दिख रहा है जो विगत में भी सत्ता–प्राप्ति के अग्रपंक्ति में थे आज भी अग्रपंक्ति में नजर आ रहे हैं । महाप्रलयकारी भूकम्प से क्षतिग्रस्त नेपाल स्वस्थ बनाने के लिए राष्ट्रीय सरकार की आवश्यकता अपरिहार्य है लेकिन साथ ही साथ यह भी जरुरी है राष्ट्रीय सरकार की जिम्मेवारी किस प्रकार के मजबूत कन्धे पर सौपी जा रही है यह नेपाली जनता को भी मान्य होना जरुरी है । जनता एक साधारण व्यक्ति को अपना अमूल्य मत देकर नेता बनाता है तो क्या राष्ट्रीय सरकार का स्वरूप कैसा हो और नेतृत्व किसे सौपा जाए इस बारे में जनता का अभिमत लेना जरुरी नहीं है ? लोकतन्त्र की विडम्बना यह है इसमे अंको को प्राथमिकता दी जाती है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए राष्ट्रीय विपत्ति से जूझ रहे नेपाल को संकट मुक्त करने के लिए राष्ट्रीय सरकार की आवश्यकता पर चर्चा एवम् बहस है, इसलिए भयावह स्थिति से जूझ रहे नेपाल मं अब भी नेताओ द्वारा अंको का खेल खेला गया तो यह निश्चित रूप में घातक सिद्ध हो सकता है । भूकम्प के ताण्डव ने राष्ट्र को जर्जर बना दिया दातृ राष्ट्र वर्तमान राजनीतिक दल प्रति संदेह प्रकट कर रहे हंै दातृ राष्ट्र द्वारा वचन मुत्ताविक सरकार को सहयोग राशि  देने  का मतलव स्पष्ट है दातृ राष्ट्र नेपाल के राजनीतिक दल के चरित्र पर संदेह प्रकट कर रहे हंै इन सारी वातों को ध्यान में रखते हुए नेताओ को लोभ मोह स्वार्थ से उपर उठकर पद प्राप्ति नहीं राष्ट्रीय स्वार्थ को प्राथमिकता देनी चाहिए ।
महाभूकम्प पश्चात राज्य विल्कुल नाकाम, निरीह एवं असफल सावित हुआ है । सरकार के गैर जिम्मेवार पूर्ण कार्यशैली के कारण वर्तमान सरकार के बजाए राष्ट्रीय सरकार निर्माण की गूँज कुछ दिन पहले तक धीमे स्वर में सुनाई दे रही थे लेकिन कॉमरेड प्रचण्ड द्वारा राष्ट्रीय सरकार के प्रधानमन्त्री के रूप में के.पी. ओली का नाम प्रस्तावित कर नेपाली राजनीतिकवृत में तरंग पैदा कर दी है, कल तक एक दूसरे के घोर विरोधी रहे प्रचण्ड ने के.पी. ओली का नाम राष्ट्रीय स्वार्थ के लिए प्रस्तावित किया है ऐसा सोचना मुर्खता होगी वास्तव में के.पी. ओली का नाम प्रस्तावित कर कॉमरेड प्रचण्ड ने एक तीर से तीन शिकार किया है, पहला कांग्रेस, एमाले गठबन्धन सरकार में दरार और शंका पैदा करना, दूसरा के.पी. ओली के भीतर छुपे हुए प्रधानमन्त्री बनने की लालसारूपी अग्नि में घृत डालकर प्रज्ज्वलित करना और तीसरा यदि सौभाग्यबश ओली प्रधानमन्त्री बन जाते हैं तो प्रचण्ड एवं एमाओवादी को विशेष प्राथमिकता मिलना तय है । प्रचण्ड ने रुग्ण के.पी. ओली का नाम प्रस्तावित कर राष्ट्र हित नहीं बल्कि राष्ट्र के साथ विश्वासघात किया है, मनन करने वाली बात यह है, के.पी. ओली राष्ट्र के करोड़ौ लगानी के फलस्वरूप आज आंशिक रूप में स्वस्थ नजर आ रहे हंै, यदि कोई सामान्य नागरिक के.पी. ओली की तरह विभिन्न रोगों से ग्रस्त होता तो क्या वह व्यक्ति अब तक जीवित रहता ? कहने का अर्थ यह है जो व्यक्ति अपने रुग्ण शरीर को सम्हाल नहीं सकता, महीने दो महीने के अन्तराल में स्वास्थ्य जाँच कराने के लिए विदेश जान पड़ता है, वैसे व्यक्ति के कमजोर कंधो पर राष्ट्रीय सरकार की जिम्मेदारी सौपने की बात मुर्खता की पराकाष्ठा होगी ।
एक तरफ राष्ट्रीय सरकार निर्माण पर चर्चा और बहस जोरो के साथ चल रही है सरकार में मन्त्री पद प्राप्ति को आतुर चेहरे उमंग से भरे हुए हंै, उनके मन में लड्डु फूट रहे है, तो दूसरी तरफ व्यक्तिगत आकांक्षा और स्वार्थ के कारण मतभेद के स्वर भी सुनाई पड़ रहे हैं । राष्ट्रीय सरकार के निर्माण सम्बन्ध में के.पी. ओली और बामदेव गौतम बीच वाक युद्ध के समाचार में राष्ट्र–हित के विपरीत निजी महत्वकांक्षा और स्वार्थ निहित है । कांग्रेस पार्टी पहले संविधान निर्माण बाद में राष्ट्रीय सरकार और यदि वर्तमान सरकार को अपदस्थ कर राष्ट्रीय सरकार निर्माण करने का प्रयास किया गया तो कांग्रेस विपक्ष में बैठने का संकेत देकर सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस, एमाले का मतभेद और स्वार्थगत महत्वकांक्षा स्पष्ट रूप में उजागर हो रहा है । वर्तमान नेपाली राजनीति में राष्ट्रीय सरकार के प्रधानमन्त्री के लिए के.पी. ओली के साथ गिरिजा पुत्री सुजाता कोइराला ने एक पत्रकार भेटघाट कार्यक्रम के दौरान अपनी दावेदारी पेश कर हास्यास्पद बना दिया है, पुत्री मोहग्रस्त पिता स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला की विशेष अनुकम्पा के कारण असक्षम होते हुए भी सुजाता कोइराला गरिमामय परराष्ट्र मन्त्री बनने वाली भाग्यवान महिला बनी । अब तक लोभी ब्राह्मणों का समूह मात्र दिखता था लेकिन ब्राह्मण महिला सुजाता कोइराला ने प्रधानमन्त्री पद के लिए अपने को प्रस्तुत कर नेपाल के राजनीति को मनोरञ्जक बना दिया है । कान्तिपुर के कार्यक्रम फायर साइड में के.पी. ओली ने राष्ट्रीय सरकार के कार्य सञ्चालन के तौर तरीका प्रस्तुत करते हुए भविष्य में नेतृत्वदायी भूमिका के लिए अपने को सक्षम होने का संकेत दिया । राष्ट्रीय सरकार का निर्माण होता है या नहीं यह सव बातें भविष्य के गर्भ में छिपी हुई हैं लेकिन इसके बावजूद पंक्तिकार पूर्ण विश्वस्त हैं कि विभिन्न नौटंकी के बाद आखिर के. पी. ओली ही राष्ट्रीय सरकार के नेतृत्वदायी भूमिका में दिखेंगे क्योकि नेपाल ज्भचय दथ ःष्कतबपभ अर्थात् भूलवशतः नायकों का देश है, इस देश में जो असक्षम है वही सक्षम स्थान पर विराजमान है, यहाँ जो असंभव है वही बात संभव होने की परम्परा है । राजनीति से लेकर जिस ओर भी नजर दौड़ाएँ अधिकांश असफल और भ्रष्ट चेहरे ही महत्वपूर्ण स्थान में विराजमान नजर आते हैं । अन्धेर नगरी चौपट राजा के देश नेपाल में जनता को मानकर चलना होगा अगला प्रधानमन्त्री रुग्न के.पी. ओली ही होने वाले हैं । यदि के.पी. ओली प्रधानमन्त्री बन जाते हंै तो उनके सामने चुनौतियों के पहाड़ हैं, के.पी. ओली की छवि एक जाति विशेष के पक्षपोषक के रूप में देखी जाती है, आदिवासी मधेसी समुदाय प्रति जो तुच्छ वचन प्रहार और विषवमन के.पी. ओली ने किया है क्या उन सव बातो को भूलकर आदिवासी मधेसी समुदाय हृदय से राष्ट्रीय सरकार के प्रधानमन्त्री के रूप में के.पी. ओली को स्वीकार कर गले लगा लेंगे । के.पी. ओली के बड़बोले तीखे शब्दबाण से मर्माहत हुए आदिवासी मधेसी समुदाय के छलनी हुए हृदय को कौन सी जड़ी–बुटी का प्रयोग कर घाव भरने का प्रयास करेंगे खड्ग वली ? २०४८ साल पश्चात नेपाल की राजनीति में लोभी ब्राह्मणों का झुण्ड प्रधानमन्त्री बनने के लिए आदिवासी और मधेसियो ंको भेंड़ बनाते रहे और आदिवासी, मधेसी विभिन्न लोभी ब्राह्मण के गुट के हनुमान बनकर घुटना टेक समर्थन करके मुर्खता का प्रदर्शन करते रहे और यह परम्परा अब भी यथावत् जारी है ।
राष्ट्रीय सरकार के नाम पर विगत जैसी दलीय ठेकेदारी को प्राथमिकता दी जा रही है साथ ही साथ राष्ट्रीय शब्द की धज्जी उड़ाई जा रही है । राष्ट्रीय सरकार निर्माण और स्वरूप के बैठक में एक बात में समानता दिखी जो विगत में भी देखी गई वह है राष्ट्र« निर्माण हेतु गठन होने वाले राष्ट्रीय सरकार निर्माण की चर्चा और बहस में सबसे ज्यादा संख्या वाले आदिवासी प्रतिनिधि की उपस्थिति नगण्य है, इस तरह के पूर्वाग्रही आचरण से निर्मित होने वाली सरकार को राष्ट्रीय सरकार का नाम देना हास्यास्पद है । भूकम्प पश्चात राहत वितरण में कांग्रेस, एमाले कार्यकर्ता को प्राथमिकता दिए जाने की खवरे आई इसका स्पष्ट मतलव है कांग्रेस, एमाले से सम्बन्ध नहीं रखने वाले स्वतन्त्र व्यक्ति नेपाली नागरिक नहीं हैं । वर्तमान मन्त्रीमण्डल के एक प्रभावशाली मन्त्री के स्वकीय सचिव (जो उनके पारिवारिक सदस्य भी है ) ने राहत के लिए आए हुए जस्ता के बन्डल को बेचने की कुचेष्टा की लेकिन जनता के आन्दोलित होने पर घोटाला का पर्दाफास हुआ साथ ही साथ मन्त्री के स्वकीय सचीव को इस्तीफा देना पड़ा । ऐसी स्थिति में दातृ राष्ट्र जो नेपाल के वर्तमान सरकार को संदेह की दृष्टि से देख रहे है ऐसी घिनोनी हरकतों को देखकर उनका संदेह शतप्रतिशत जायज है । अदभुत वात तो यह है मन्त्री जी के सचिव रंगे हाथो पकड़े जाने के बावजुद मन्त्री जी अपने स्वकीय सचिव की, घोटाले में संलग्नता को नकारते हैं लेकिन सत्ता साझेदार दल एमाले के महासचिव के.पी. ओली ने फायर साइड कार्यक्रम में जस्ता घोटाले प्रकरण का जिक्र कर सत्यता की पुष्टि कर दी है ।
राष्ट्रीय विपत्ति का सामना करने के लिए निश्चित रूप में एक मजबूत राष्ट्रीय सरकार आवश्यक है पर यह शर्त विल्कुल न थोपी जाय कि राष्ट्रीय सरकार का नेतृत्व राजनीति के असफल नेताओ के हाथों में ही हो, क्योंकि नेपाली जनता असफल नेताओ कोे झेलते झेलते परेशान हो चुकी है , जनता अब कुछ नया उर्जावान चेहरा देखना चाहती है । वर्तमान नेपाल के कुछ एक नेताओ को छोड़कर अधिकांश नेता जनता की दृष्टि में असफल और निकम्मा सावित हो चुके है । राष्ट्रीय सरकार निर्माण के नाम पर जर्जर वृद्ध सुशील कोइराला के स्थान पर रुग्ण के.पी. ओली के पक्ष में लविङ्ग चल रही है, भयंकर राष्ट्रीय विपदा से गुजर रहे नेपाल को एक स्वच्छ कुशल और मजबूत कन्धे की जरुरत है न कि जर्जर सुशील के स्थान पर रुग्ण के.पी. ओली की । पंचायती काल को निरंकुश कहा जाता या क्योंकि न चाहते हुए भी जनता उदण्ड पारस को युवराज स्वीकार करने को मजबूर थे । पंचायती निरंकुशता से कुछ फरक रूप में अब भी निरंकुशता विद्यमान है जनता को चाह विपरित सुजाता को मन्त्री बनते देखना पड़ा, जर्जर सुशील को लड़खड़ाते राष्ट्र की जिम्मेदारी सम्भालते देख रहे हैं और अब आ कर रुग्ण के.पी. ओली के कमजोर कंधो पर राष्ट्रीय सरकार की जिम्मेदारी सौपने की बात निरंकुशता नहीं है तो क्या है ? नेपाली जनता का दुर्भाग्य, उनके चाहने न चाहने की परवाह किसे है । जिसको प्यार स्नेह और अपना अमूल्य मत देकर नेता बनाते हैं वही नेता जनता की भावना को कुचलकर हम नहीं सुधरेंगे वाले रोग से ग्रस्त हो व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त हो जाते हैं । याद रहे राष्ट्रीय सरकार का प्रधानमन्त्री कुशल दक्ष और सर्वस्वीकार्य व्यक्तित्व होना वर्तमान समय की माँग है, इसलिए राष्ट्रीय विपदा को सम्भालने के लिए राष्ट्रीय सरकार के प्रधानमन्त्री के रूप में वृद्ध जर्जर रुग्ण लोभी पात्र को सत्ता से बाहर रख कर राष्ट्रभक्त, दक्ष, पूर्वाग्रहरहित मजबूत कंधो पर जिम्मेदारी सौपना ही राष्ट्रहित और बुद्धिमानी सावित होगी ।
डाँडाखर्क, दोलखा

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