शक्तिहीन संघीयता का साजिश

सुझाव संकलन या शक्ति प्रदर्शन
२०७२ के संविधान का मसौदा अपने साथ कई उलझनपूर्ण सवालों के साथ सामने आया । जिसमें नया तो कुछ नहीं है हाँ जो कुछ नया अंतरिम संविधान में जोड़ा गया था उसे हटाकर और पूर्व की बातों को ही नया जामा पहना कर जनता के सामने पेश किया गया । मधेशी, आदिवासी,
नेपाल में तीन मुख्य समुदाय नजर आते हैं जो लगभग समान स्थिति में हैं—खसवादी, मधेशी और जनजाति किन्तु विडम्बना यह है कि समान स्थिति होने के बावजूद खसवादी वर्चस्व सदियों से कायम रहा है और आज भी जो मसौदा सामने आया है उसमें उनकी स्थिति को ही और भी अधिक मजबूती के साथ प्रस्तुत किया गया है
जनजाति, दलित, पिछड़ावर्ग, मुस्लिम, महिला इन सबने देश में वर्षों से शोषण होने की जिस पीड़ा को भोगा था, उस उत्पीड़न और विभेद से मुक्त होने की उम्मीद संविधान से की थी । किन्तु उनके समक्ष जो प्रस्तावित मसौदा आया, उसमें ये सारी बातें कहीं नहीं हैं । उपेक्षा की इस पीड़ा का असर सुझाव संकलन के समय देखने में आया । स्वतःस्फूर्त रूप से मधेश की जनता सड़क पर आई और विरोध का प्रदर्शन किया । इस प्रदर्शन में भी वही हुआ, जो हमेशा होता आया है । सुझाव संकलन स्थल पर जनता से अधिक प्रहरी की उपस्थिति और भय त्रास का माहोल बनाया गया । मधेश को छावनी में परिवर्तित कर दिया गया था । ये थी लोकतंत्र की बानगी जिसमें जनता से यह उम्मीद की जा रही थी कि वो स्वतंत्रता के साथ अपनी बात और सुझाव दर्ज कराएँ । लाठी चार्ज, महिलाओं के साथ बदसलुकी, अश्रुगैस प्रस्तावित मसौदे के साथ मधेश की जनता और आदिवासी जनजाति को यही मिला । निर्दोष जनता, यहाँ तक कि बच्चे भी पुलिस दमन का शिकार हुए और आज भी जीवन मरण के बीच झूल रहे हैं । किन्तु इस पीड़ा को ना तो यहाँ की राष्ट्रीय संचार माध्यम ने देखा और ना ही इस बहते खून पर राज्य की नजर गई । प्रशासन की इस अमानवीय हरकत पर कोई भी वक्तव्य गृहमंत्री या प्रधानमंत्री की ओर से जारी नहीं हुआ । सरकार की इस नीति से देश का एक हिस्सा आखिर क्या समझे ? किसी भी राष्ट्र में वहाँ का एक व्यक्ति भी महत्व रखता है, यहाँ तो एक पूरा प्रदेश दमन का दंश भोग रहा है और इसके साथ ही सरकार की उपेक्षा भी । इस दंश को मधेश ही नहीं जनजातियों ने भी झेला । सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक जर्रा भी अगर रुख बदल ले तो तबाही का रूप अख्तियार कर लेती है ।शक्तिविहीन संघीयता की साजिश
संघीयता, स्वशासन, सम्मान और न्याय के साथ समग्र मधेश एक प्रदेश ये सारे शब्द अस्तित्वविहीन हो गए हैं । जिनके लिए मधेश आन्दोलन हुआ, सड़कों पर खून बहे उन्हें न तो संविधान के प्रस्तावित मसौदे में शामिल किया गया और न ही उनका सम्मान किया गया । जाहिर तौर पर देखा जाय तो नेपाल में तीन मुख्य समुदाय नजर आते हैं जो लगभग समान स्थिति में हैं—खसवादी, मधेशी और जनजाति किन्तु विडम्बना यह है कि समान स्थिति होने के बावजूद खसवादी वर्चस्व सदियों से कायम रहा है और आज भी जो मसौदा सामने आया है उसमें उनकी स्थिति को ही और भी अधिक मजबूती के साथ प्रस्तुत किया गया है । अर्थात् शोषण और शोषक की स्थिति समान रूप से कायम है ।
दबाव के बाद संघीयता और सीमांकन के नाम पर जो सहमति बनाने की प्रक्रिया जारी है, उसमें भी मधेश को शक्तिविहीन बनाने की पूरी तैयारी की जा रही है । प्राप्त जानकारी के हिसाब से मधेश के ६ हिस्से करने की तैयारी हो रही है । जिसे मधेश कभी स्वीकार नहीं कर सकता । मधेशी दलों ने इसे मानने से साफ इन्कार कर दिया है । इतना ही नहीं १६ बुन्दे समझौता में जो मधेशी नेता शामिल हैं उन्होंने भी इसे मानने से साफ मना कर दिया है । मधेश के हिस्से को पहाड़ के साथ जोड़ा जा रहा है जो मधेश की इच्छा के बिल्कुल विपरीत है । एक मधेश एक प्रदेश की बात तो कहीं गुम सी हो गई है, फिर भी मौके की नजाकत को भाँपते हुए तीन प्रदेश तक के लिए मधेशी दल खुद को तैयार कर रहे हैं किन्तु ऐसा होगा इसकी सम्भावना तत्काल दिखाई नहीं दे रही । चार दल के प्रमुख नेता अपने अपने गृहजिला के स्वार्थ में उलझ रहे हैं । पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा अखण्ड सुदूर पश्चिम के अड़ान में हैं । कैलाली के थारु बहुल क्षेत्र को तराई प्रदेश में रखने की बात पर कोई विचार विमर्श ही नहीं करने दिया जा रहा है । दूसरी ओर एमाले अध्यक्ष के.पी.ओली, काँग्रेस महामंत्री कृष्णप्रसाद सिटौला पूर्व के झापा, मोरंग और सुनसरी को ऊपरी पहाड़ी प्रदेश में जोड़ने पर अड़े हुए हैं । यह बहुमत का असर है या दम्भ का किन्तु यह तो मानी हुई बात है कि यह मधेश के हित में नहीं है ।
सरकार और मधेशी मोर्चा के बीच २०६४फाल्गुन १६ गते आठ बुन्दें समझौता किया गया जिसमें मधेशी जनता की स्वायत्त मधेश प्रदेश के साथ नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक राज्य बनने और सरकार द्वारा सुरक्षा अंग के साथ ही सभी निकायों में मधेशी, आदिवासी जनजाति, महिला, दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की समावेशी, समानुपातिक सहभागिता आदि को शामिल किया गया था । किन्तु पेश किया गया मसौदा इन सबको सम्बोधित करने में लगभग असफल सिद्ध हुआ है । सुझाव संकलन का भी तमाशा खत्म हो चुका है । क्या लाखों की संख्या में आए सुझाव का सरकार अध्ययन कर पाएगी ? क्या पारदर्शिता के साथ उसे परखा जा सकेगा ? फास्ट ट्रैक के साथ क्या इन सुझावों पर काम किया जा सकता है ? इन सारे तथ्यों में वैज्ञानिकता का पूर्ण अभाव दिख रहा है । ये सही है कि मसौदा सामने आया है, आना भी चाहिए था क्योंकि, एक प्रारुप सामने आया है जिसमें सुधार की अपेक्षा है, जिसे सहमति और समझदारी से पूर्ण किया जा सकता है, परन्तु इसे बहुमत के आधार पर लागु करने की कोशिश कतई सही नहीं है । इस प्रारुप को समय दिया जाय, उसपर बहस की जाय, सब की भावनाओं और इच्छाओं का सम्मान करते हुए उसका निचोड़ निकाला जाय और तब इसे लागु किया जाय । अगर ऐसा नहीं किया जाता है और जिद के तहत लागु किया जाता है तो द्वन्द्ध की स्थिति लगातार मजबूत होती चली जाएगी ।
शंकित मधेश
जोड़–तोड़ की राजनीति पूरे शबाब पर है । वैसे भी राजनीति में जो दिखता है वो नहीं होता, बल्कि पर्दे के पीछे कुछ और ही चल रहा होता है । पदों का लोभ सर चढ़ कर इतना बोलता है कि उसमें जनता और जनता की इच्छा कहीं बहुत पीछे छूट जाती है । उड़ती सी खबर है कि प्रचण्ड जी को राष्ट्रपति का पद मिलने वाला है और उपराष्ट्रपति का पद फिर किसी मधेशी नेता के झोली में आने वाली है । इस हालात में मधेश की जनता मधेशी नेताओं पर भी विश्वास नहीं कर पा रही है । कल तक उपेन्द्र यादव जी को मधेश का नेता माना जा रहा था और मधेशी जनता यह उम्मीद कर रही थी कि वो शुद्ध रूप से मधेश के साथ हैं किन्तु उनके नए मोर्चे ने उन्हें जनता की नजर में मधेश की धार से अलग कर दिया है । विजय गच्छदार जी से पहले ही मधेशी जनता निराश हो चुकी है । जिन मुद्दों को भड़का कर प्रचण्ड जी ने राजनीति की और एक बड़े जन आन्दोलन के संवाहक बने, वो कहीं पीछे छूटता चला गया । मधेशवादी दलों के नेता आज भी कोई दृढ़ निश्चय नहीं कर पा रहे हैं ।
पेश किए हुए मसौदे से सिर्फ मधेशी जनता ही नहीं दलित और जनजाति सभी असंतुष्ट हैं और मोर्चाबन्दी कर के विरोध जता रहे हैं । नागरिकता के सवाल पर भी सरकार को ध्यान देना ही होगा, क्योंकि सुझाव संकलन में इस सवाल से जुड़ी बातें अधिक आई हैं । मधेश की जनता नागरिकता के सवाल पर चिन्तित है । क्योंकि मधेश का सम्बन्ध सबसे अधिक भारत से है । भारत से ब्याह कर लाई गई महिला को अंगीकृत नागरिकता मिलती थी किन्तु, उसकी संतान को वंशज के आधार पर नागरिकता मिलती थी, आज जो प्रावधान सामने आ रहा है, उससे अंगीकृत महिला की संतान अपने अधिकार से वंचित हो रही है । इससे तो स्पष्ट हो रहा है कि मधेशी जनता को एक सोची समझी नीति के तहत कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जिसका दूरगामी असर निःसन्देह मधेश के पक्ष में नहीं है । विभेदकारी और प्रतिगमनकारी मसौदे को बिना सुधार के लागु करना राष्ट्र के हित में नहीं हो सकता । किन्तु, नेतागण के रवयै से साफ नजर आ रहा है कि वो जनता से अधिक अपने विषय में सोच रहे हैं । ओली जी किसी भी सुधार की जगह इस कोशिश में लगे हुए हैं कि, किसी भी तरह संविधान लागु हो और उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल हो । वो अच्छी तरह समझ रहे हैं कि, जितनी देर होगी उनके प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना भी क्षीण होती जाएगी । प्रधानमंत्री के सुर थोड़े बदले हैं, अब उन्हें लग रहा है कि सीमांकन और संघीयता के बिना संविधान लाना हितकर नहीं है, किन्तु इसके पीछे उन्हें पदच्यूत होने का भी डर सता रहा है । देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति महोदय भी इसी चिन्ता से ग्रसित नजर आ रहे हैं । बाबुराम जी कहीं ना कहीं प्रचण्ड जी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी से खुश हैं क्योंकि अगर यह होता है तो भविष्य में उनकी पार्टी से प्रधानमंत्री के दावेदार वो अकेले होंगे । यानि हर ओर शक्ति और पद हासिल करने की रस्साकशी में हमारे प्रतिनिधि व्यस्त नजर आ रहे हैं । उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं है कि, अगर उक्त मसौदा अपने जिस रूप में आज है, उसी रूप में जनता पर थोपा गया तो जाहिर सी बात है कि यह राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बरकरार रखने में नाकाबिल साबित होगा ।
फिलहाल सुझाव संकलन पर सहमति की समय सीमा गुजर चुकी है इससे श्रावण के अंतिम सप्ताह में संविधान जारी करने की बात भी असमंजस की अवस्था में है । कहीं से यह सम्भव नहीं लग रहा कि जनता के बीच से आए सुझाव का इतनी जल्दी अध्ययन हुआ हो । अगर उस पर ध्यान ही नहीं देना था तो देश की अरबों की राशि उस विषय पर खर्च करने का कोई औचित्य ही नहीं था और अब तो संविधान लागू होने की भी सम्भावना क्षीण होती जा रही है । खैर, ये शांति का देश नेपाल है यहाँ कुछ भी हो सकता है और यहाँ की जनता में इतना धैर्य है कि वो सब सहन भी कर सकती है ।

