क्या चुनाव से पहले उपेंद्र यादव को घेरने की रणनीति है ? 19 साल बाद गौर हत्याकांड फिर सुर्खियों में
काठमांडू, हिमालिनी विश्लेषण, 9दिसम्बर ।
गौर कांड की फाइल खुली, सवाल भी खुले: न्याय की तलाश या मधेश को बदनाम करने की सियासत?

19 साल बाद गौर हत्याकांड फिर चर्चा में
न्याय की प्रक्रिया या चुनावी राजनीति का औजार?
रौतहट के गौर में चैत 2063 को हुए 27 लोगों के निर्मम हत्याकांड की फाइल 19 साल बाद एक बार फिर खुली है। सर्वोच्च अदालत के परमादेश के बाद पुलिस ने जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद जगी है, लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी तेज़ हो गया है कि क्या यह कदम केवल न्याय के लिए है, या इसके पीछे चुनावी राजनीति भी छिपी है?
यह वही मामला है, जो वर्षों तक सत्ता, समझौतों और राजनीतिक दबावों के बीच दबा रहा। माओवादी, तत्कालीन मधेशी जनअधिकार फोरम और राज्य सत्ता—तीनों पर जांच रोकने के आरोप लगते रहे। अब जब देश एक बार फिर चुनावी माहौल की ओर बढ़ रहा है, तो इस फाइल का अचानक खुलना संयोग है या संकेत?

उपेंद्र यादव पर फिर फोकस क्यों?
इस मामले में जसपा नेपाल के अध्यक्ष उपेंद्र यादव का नाम पहले से ही एफआईआर में दर्ज है। पीड़ित परिवार उन्हें प्रमुख दोषियों में से एक मानते हैं, जबकि उपेंद्र यादव बार-बार इस आरोप को खारिज करते आए हैं। उनका कहना है कि वे घटना के दिन रौतहट में थे ही नहीं और यह घटना दो राजनीतिक समूहों के बीच हुई हिंसक झड़प थी।

लेकिन सवाल यह है कि—
- अगर यह मामला पहले ही “जांच हो चुका” था, तो 19 साल तक दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- अगर यह जघन्य अपराध था, जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने माना, तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
- और अगर अब जांच जरूरी है, तो ठीक चुनाव से पहले ही क्यों?
मधेश बनाम सियासत?
मधेशी राजनीति लंबे समय से आरोपों के घेरे में रही है—कभी भारत कार्ड, कभी अलगाववाद, कभी हिंसा। गौर कांड को फिर से उछालने के बाद मधेश में यह भावना गहराने लगी है कि पूरे मधेश आंदोलन को एक हिंसक फ्रेम में फिट करने की कोशिश हो रही है।
खासतौर पर तब, जब—
- मधेश आधारित दलों के एकीकरण की चर्चा तेज़ है
- वे FPTP में बड़ी पार्टियों के लिए खतरा बन सकते हैं
- और चुनाव बाद वे किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या गौर कांड को फिर से उछालकर मधेशी नेतृत्व को नैतिक और राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश हो रही है?
न्याय जरूरी है, लेकिन चयनात्मक क्यों?
इसमें कोई दो राय नहीं कि 27 लोगों की हत्या एक जघन्य अपराध है और दोषियों को सज़ा मिलनी ही चाहिए—चाहे वे किसी भी दल या विचारधारा से हों।
लेकिन चयनात्मक न्याय भी उतना ही खतरनाक होता है।
अगर गौर कांड की जांच होती है, तो—
- राजपुर बमकांड
- माओवादी हिंसा के अन्य मामले
- 2006–2010 के राजनीतिक हत्याकांड
इन सबकी जांच भी उसी गंभीरता से होनी चाहिए।
वरना यह संदेश जाएगा कि कानून नहीं, सत्ता तय करती है कि कौन दोषी है और कब दोषी है।
निष्कर्ष: न्याय या रणनीति?
गौर हत्याकांड का सच सामने आना जरूरी है। पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए।
लेकिन जिस समय, जिस रफ्तार और जिस राजनीतिक माहौल में यह मामला फिर से खोला गया है, उसने संदेह भी पैदा किया है।
क्या यह सिर्फ न्याय की प्रक्रिया है?
या फिर यह संदेश देने की कोशिश कि—
“मधेश की राजनीति अगर मजबूत होगी, तो पुराने घाव कुरेदे जाएंगे”?
इस सवाल का जवाब जांच से ज्यादा राजनीतिक ईमानदारी देगी।

