अंशु झा रचित ‘पवित्र रजस्वला’ हिन्दी काव्य संग्रह का विमोचन
काठमांडू, जेठ २९ । ‘पवित्र रजस्वला’ हिन्दी काव्य संग्रह का विमोचन वृहस्पतिवार (जेठ २८) को उमा मंदिर, बल्खु, काठमांडू में किया गया । लेखिका अंशु कुमारी झा की यह पहली पुस्तक है । अपनी पहली ही पुस्तक में उन्होंने ‘रजस्वला’ जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय को उठाया है ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता त्रिभुवन विश्वविद्यालय, हिन्दी केन्द्रीय विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ श्वेता दीप्ति ने की । इस अवसर पर हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका के प्रबंध निदेशक सच्चिदानंद मिश्र, प्रमुख अतिथि अबकाश प्राप्त प्रा. डॉ प्रमोद कुमार झा, विशिष्ठ अतिथि माननीय रेखा यादब, नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय की डॉ पूनम झा सहित सभी ने संयुक्त रुप से पुस्तक का विमोचन किया ।
कार्यक्रम में लेखिका अंशु झा जी अपने काव्य संग्रह को लेकर कहा कि – यह संग्रह मेरे जीवन के उन अनमोल क्षणों का प्रतिबिम्ब है, जो मेरे हृदय और मन की गहराई से अंकित हो गए हैं । कविता मेरे लिए एक ऐसा संसार है जिसमें भावनाएं अपने अनोखे रुप में जीवंत होती है ।
शुभकामना मतंव्य देते हुए माननीय रेखा यादव ने ‘पवित्र रजस्वला’ के संदर्भ में कहा कि नारी मन की व्यथा को इस काव्य संग्रह में समेटा गया है । उन्होंने कहा कि कोई महिला यदि रजस्वला न हो तो यह सृष्टि कैसे चलेगी ? खासकर उन्होंने आज के समाज को लेकर प्रश्न उठाए । अगर कोई महिला संतान को जन्म देने में असमर्थ हो, तो पहला निशाना समाज महिला को ही बनाता है । ऐसे में जिस रजस्वला से जीवन का संबंध है वो अपवित्र कैसे हो सकता है ।
शुभकामना के ही क्रम में हिन्दी– मैथिली साहित्यकार करुणा झा ने विचार को रखते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने तो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए कोई भी नियम बहुत सोच समझकर बनाया होगा । रजस्वला के दिनों में महिला की कठिनाइयों को देखा होगा । माना होगा कि इन चार पाँच दिनों में उसे आराम की जरुरत होगी । तब कुछ नियम बनाए होंगे । किन्तु समय के साथ इनमें विकृतियाँ आ गईं ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अवकाश प्राप्त प्रा.डॉ. प्रमोद कुमार झा पुस्तक ‘पवित्र रजस्वला’ के बारे में कहा कि रजस्वला कभी अपवित्र हो ही नहीं सकती ।
कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ श्वेता दीप्ति ने कहा कि ‘पवित्र रजस्वला’ को लेकर मैं यही कहूँगी कि समय के साथ समाज में बदलाव आया है और आज लोग इस विषय पर खुलकर चर्चा कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि पुस्तक के शीर्षक और फिर उसके आवरण को पाठक सबसे पहले देखते हैं । ये दोनों ही अगर आकर्षक हों तो पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा पाठक में बढ़ जाती है । उन्होंने रजस्वला के वैज्ञानिक पक्षों पर भी प्रकाश डाला ।
‘पवित्र रजस्वला’ हिन्दी काव्य संग्रह का विमोचन वृहस्पतिवार (जेठ २८) को उमा मंदिर, बल्खु, काठमांडू में किया गया । लेखिका अंशु कुमारी झा की यह पहली पुस्तक है । अपनी पहली ही पुस्तक में उन्होंने ‘रजस्वला’ जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय को उठाया है ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता त्रिभुवन विश्वविद्यालय, हिन्दी केन्द्रीय विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ श्वेता दीप्ति ने की । इस अवसर पर हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका के प्रबंध निदेशक सच्चिदानंद मिश्र, प्रमुख अतिथि अबकाश प्राप्त प्रा. डॉ प्रमोद कुमार झा, विशिष्ठ अतिथि माननीय रेखा यादब, नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय की डॉ पूनम झा सहित सभी ने संयुक्त रुप से पुस्तक का विमोचन किया ।
कार्यक्रम में लेखिका अंशु झा जी अपने काव्य संग्रह को लेकर कहा कि – यह संग्रह मेरे जीवन के उन अनमोल क्षणों का प्रतिबिम्ब है, जो मेरे हृदय और मन की गहराई से अंकित हो गए हैं । कविता मेरे लिए एक ऐसा संसार है जिसमें भावनाएं अपने अनाखे रुप में जीवंत होती है ।
शुभकामना मतंव्य देते हुए माननीय रेखा यादव ‘पवित्र रजस्वला’ के संदर्भ में कहा कि नारी मन की व्यथा को इस काव्य संग्रह में समेटा गया है । उन्होंने कहा कि कोई महिला यदि रजस्वला न हो तो यह सृष्टि कैसे चलेगी ? खासकर कर उन्होंने आज के समाज को लेकर प्रश्न उठाए । अगर कोई महिला संतान को जन्म देने में असमर्थ हो, तो पहला निशाना समाज महिला को ही बनाता है । ऐसे में जिस रजस्वला से जीवन का संबंध है वो अपवित्र कैसे हो सकता है ।
शुभकामना के ही क्रम में हिन्दी– मैथिली साहित्यकार करुणा झा ने विचार को रखते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने तो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए कोई भी नियम बहुत सोच समझकर बनाया होगा । रजस्वला के दिनों में महिला की कठिनाइयों को देखा होगा । माना होगा कि इन चार पाँच दिनों में उसे आराम की जरुरत होगी । तब कुछ नियम बनाए होंगे । किन्तु समय के साथ इनमें विकृतियाँ आ गईं ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अवकाश प्राप्त प्रा.डॉ. प्रमोद कुमार झा पुस्तक ‘पवित्र रजस्वला’ के बारे में कहा कि रजस्वला कभी अपवित्र हो ही नहीं सकती ।
कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ श्वेता दीप्ति ने कहा कि ‘पवित्र रजस्वला’ को लेकर मैं यही कहूँगी कि समय के साथ समाज में बदलाव आया है और आज लोग इस विषय पर खुलकर चर्चा कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि पुस्तक के शीर्षक और फिर उसके आवरण को पाठक सबसे पहले देखते हैं । ये दोनों ही अगर आकर्षक हों तो पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा पाठक में बढ़ जाती है । उन्होंने रजस्वला के वैज्ञानिक पक्षों पर भी प्रकाश डाला ।









