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महाभारत और रामराज्य का जनकः ‘पौराणिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में एक विश्लेषण’ : अजय कुमार झा

 

अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक अप्रैल। मानव सभ्यता के इतिहास में जितनी प्रगति महान विचारों, दर्शन और सिद्धांतों के कारण हुई है, उतनी ही बड़ी त्रासदियाँ भी कुछ कट्टर, विकृत और अमानवीय विचारधाराओं के कारण घटित हुई हैं । विचार स्वयं में न अच्छे होते हैं न बुरे; उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार समझा, लागू और प्रचारित किया गया । जब कोई विचार मानवीय संवेदना, विवेक, सहिष्णुता और नैतिकता से कट जाता है, तब वही विचार व्यापक विनाश का कारण बनता है । मानव सभ्यता का समूचा इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि किसी भी युग का निर्माण पहले विचारों में होता है, बाद में वह व्यवहार, व्यवस्था और इतिहास का रूप लेता है । संसार में जितने भी महान परिवर्तन हुए–चाहे वे युद्ध के रूप में हों, क्रांति के रूप में हों, या आदर्श शासन–व्यवस्था के रूप में–उनका मूल कारण विचार ही रहा है । यही कारण है कि सनातनी मनीषा ने कहा है–“यद्भावं तद्भवति” अर्थात् जैसा विचार (भाव) होता है, वैसा ही परिणाम उत्पन्न होता है । भाव सघन होकर विचार में परिणत हो जाता है । फिर विचार सघन होकर व्यवहार में बदल जाता है ।

 

यदि इस सिद्धांत को भारतीय पौराणिक परंपरा के दो महानतम उदाहरणों–महाभारत के युद्ध और रामायण के रामराज्य–के संदर्भ में देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि विचार ही विनाशकारी महाभारत संग्राम का भी जनक था और लोक कल्याणकारी रामराज्य का भी ।
सनातनी मनीषाः में भाव को सृष्टि और जीवन–निर्माण का मूल कारण माना गया है । छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है–“यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति ततः प्रेत्य भवति ।” अर्थात मनुष्य जैसा संकल्प करता है, वैसा ही बनता है । यह “यद्भावं तद्भवति” का दार्शनिक रूप है । यह बताता है कि विचार केवल मानसिक क्रिया नहीं, सृजनात्मक शक्ति है । भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं–“श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।” (१७.३) अर्थात मनुष्य श्रद्धा और भाव से निर्मित होता है; जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही बन जाता है । यहाँ स्पष्ट है कि भीतरी भाव बाहरी व्यक्तित्व का निर्माता है । रामचरितमानस में विभीषण का भाव धर्ममय था, इसलिए वे राक्षस कुल में जन्म लेकर भी पूजनीय बने । परन्तु रावण ज्ञानवान होने पर भी उसका भाव अहंकारमय था; परिणाम विनाश । अर्जुन जब मोहग्रस्त भाव था, तो भ्रम उत्पन्न हुआ; जब ज्ञानभाव आया, विजय मिली । यह दर्शाता है कि भाव ही भाग्य की दिशा निर्धारित करता है । शिव पुराण, भागवत पुराण आदि में अनेक उदाहरण हैं जहाँ तपस्वियों के संकल्प से असंभव कार्य संभव हुए । ध्रुव का अटल भाव उन्हें ध्रुवतारा बना देता है । प्रह्लाद का ईश्वरभाव उन्हें अजेय बनाता है । यह प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि अडिग भाव वास्तविकता को रूपांतरित कर सकता है । आधुनिक विज्ञान भी इस सिद्धांत को कई स्तरों पर स्वीकार करता है ।
न्यूरोप्लास्टिसिटी – (ल्भगचयउबिकतष्अष्तथ)ः न्यूरोप्लास्टिसिटी बताती है कि बार–बार दोहराए गए विचार मस्तिष्क की संरचना बदल देते हैं । यदि व्यक्ति लगातार सकारात्मक, लक्ष्यकेंद्रित सोच रखता है तो मस्तिष्क उसी दिशा में नए तंत्रिका–पथ बनाता है । अर्थात–जैसा भाव, वैसा मस्तिष्क; जैसा मस्तिष्क, वैसा व्यवहार । प्लेसीबो प्रभाव सिद्ध करता है कि केवल विश्वास और मानसिक अपेक्षा शरीर में वास्तविक जैव–रासायनिक परिवर्तन ला सकती है । रोगी यदि विश्वास करता है कि वह स्वस्थ होगा, तो शरीर उसी दिशा में प्रतिक्रिया देता है । यह “यद्भावं तद्भवति” का वैज्ञानिक उदाहरण है । स्वयंसिद्ध भविष्यवाणी क्भाि–ागािष्ििष्लन उचयउजभअथ के अनुसार व्यक्ति जिस परिणाम की गहरी अपेक्षा करता है, उसके अनुरूप व्यवहार करने लगता है और अंततः वही परिणाम उत्पन्न कर देता है । क्वांटम भौतिकी में पर्यवेक्षक प्रभाव बताता है कि अवलोकन परिणाम को प्रभावित कर सकता है । हालाँकि इसे सीधे आध्यात्मिक भाव से जोड़ना अतिशयोक्ति होगी, पर यह संकेत देता है कि चेतना और वास्तविकता का संबंध सरल नहीं है ।

महाभारत संग्राम ः दूषित विचारों की परिणतिः महाभारत केवल एक युद्ध नहीं था; वह विचारों का भीषण संघर्ष था–धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, मर्यादा और उद्दंडता, अहंकार और सहिष्णुता, उदार और लालच के बीच संघर्ष । इस युद्ध का मूल कारण हस्तिनापुर की भूमि या राजसिंहासन मात्र नहीं था, बल्कि वह दूषित विचार था जिसने दुर्योधन के मन में जन्म लिया । अथबा कह सकते हैं कि दुर्योधन को तात्कालीन समय के प्रतिष्ठित राजकीय विद्वानों ने अपनी कुटिलता, लालच, इष्र्या,अहंकार,क्षुद्रता और बदले की भाव का शिकार दुर्योधन को बनाया । दुर्योधन को हम उस समय के वामपंथी और जेहादी मानशिकता के पृष्ठपोषक शकुनी, कंश, जरासंध, जयद्रथ, कर्ण, शैल्य, पितामह, द्रोणाचार्य, क्रिपाचार्य, दुःशासन और मोहान्ध ध्रितराष्ट्र आदि समष्टिगत विचारों के सशक्त संवाहक के रुपमे व्याख्या कर सकते हैं । दुर्योधन अपने भाइयो के सन्दर्भ में केशव से कहता है, “सूच्यग्रं नैव दास्यामि विना युद्धेन केशव ।” अर्थात् बिना युद्ध के सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा । यह विचार अहंकार, ईष्र्या और स्वार्थ का प्रतीक था । इसी विचार ने युद्ध की भूमिका तैयार की । दूसरी ओर शकुनि का प्रतिशोधात्मक विचार, धृतराष्ट्र की मोहांधता, कर्ण के अहंकार और सभा में अन्याय के प्रति मौन रहने वालों की निष्क्रिय मानसिकता ने महाभारत को जन्म दिया । भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।” अर्थात मनुष्य के बंधन और मुक्ति दोनों का कारण मन अर्थात विचार है । यदि दुर्योधन के भीतर न्याय और समन्वय का विचार होता, तो कुरुक्षेत्र का रक्तपात न होता । अतः महाभारत का जनक तलवार नहीं, दूषित विचार था ।

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रामराज्य ः लोकमंगलकारी विचारों की परिणतिः यदि महाभारत नकारात्मक विचारों की परिणति है, तो रामराज्य सकारात्मक, लोककल्याणकारी और धर्मनिष्ठ विचारों की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है । रामचरितमानस में भगवान राम केवल राजा नहीं, एक विचार हैं–त्याग, मर्यादा, न्याय और लोकसेवा का विचार । रामराज्य की स्थापना का आधार सत्ता–लिप्सा नहीं था । राम के पास अयोध्या का राज्य था, फिर भी उन्होंने पिता के वचन की रक्षा हेतु वनवास स्वीकार किया । यह निर्णय किसी बाहरी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि उनके अंतःकरण में स्थित धर्ममय विचार का परिणाम था । तुलसीदास ने रामराज्य का स्वरूप बताते हुए लिखा, “दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज नहिं काहुहि व्यापा । ।”यह केवल शासन व्यवस्था का वर्णन नहीं, बल्कि उस विचारधारा का चित्रण है जिसमें शासक स्वयं को सेवक मानता है, सत्ता को साधन मानता है और लोककल्याण को सर्वोच्च ध्येय । रामराज्य इसलिए संभव हुआ क्योंकि उसके मूल में मर्यादा, करुणा, सत्य और समन्वय का विचार था ।
सांस्कृतिक प्रमाण ः विचार से संस्कृति का निर्माणः सनातन संस्कृति स्वयं विचारप्रधान संस्कृति रही है । उपनिषद का उद्घोष–“सर्वे भवन्तु सुखिनः” एक विचार है, जिसने सनातन सामाजिक संरचना को करुणा और सह–अस्तित्व की दिशा दी । इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार भारतीय संस्कृति को विश्वबंधुत्व का स्वर देता है । जब समाज में यह विचार प्रबल रहा, तब भारत ज्ञान, नैतिकता और समृद्धि का केंद्र बना । जब विचार संकुचित हुए, तब विभाजन, संघर्ष और पतन हुआ ।

साहित्यिक प्रमाणः कलम विचारों की जन्मभूमिः साहित्य समाज के विचारों का दर्पण है । मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य से सामाजिक चेतना जगाई । रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा–“समर शेष है…”यह केवल कविता नहीं, विचार–जागरण का शंखनाद है । साहित्य पहले विचार गढ़ता है, फिर वही विचार समाज और इतिहास को दिशा देते हैं । मानव इतिहास को गहराई और गंभीरता से अध्ययन करने पर यह सिद्ध होता है कि जब वैज्ञानिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक विचार संतुलन, नैतिकता और मानवीय संवेदना से अलग होकर कट्टरता, स्वार्थ या अंधानुकरण में बदल जाते हैं, तब मानवता को भारी क्षति, कष्ट और विनाश झेलना पड़ता है । विचार स्वयं दोषी नहीं होते; उनका दुरुपयोग, अतिरेक और विकृत प्रयोग विनाश का कारण बनता है । नीचे चारों क्षेत्रों में मानवता को हुई प्रमुख क्षतियों का विवरण प्रस्तुत है–

वैज्ञानिक विचारों से हुई क्षतिः विज्ञान मानव कल्याण का साधन है, लेकिन जब इसका उपयोग विनाशकारी उद्देश्यों के लिए हुआ, तब गंभीर दुर्घटनाएँ हुईं ।

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(क) परमाणु विनाश; हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बमबारी, जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिराए गए । जिसमे लाखों लोग तत्काल या धीरे–धीरे मारे गए । पीढÞियों तक विकिरणजनित रोग के शिकार हो रहे हैं । मानसिक और सामाजिक आघात हो रहा है । यह वैज्ञानिक उपलब्धि का भयावह दुरुपयोग था ।

(ख) औद्योगिक दुर्घटनाएँ; भोपाल गैस त्रासदी । भोपाल में रासायनिक रिसाव से हजारों लोग मारे गए । कारणः तकनीकी लापरवाही और लाभ–केंद्रित वैज्ञानिक प्रबंधन ।

(ग) जैविक हथियार; वैज्ञानिक शोधों का उपयोग जैविक युद्ध और घातक प्रयोगों में हुआ । इससे महामारी, भय और नैतिक संकट उत्पन्न हुए ।

(घ) पर्यावरण विनाश; औद्योगिक वैज्ञानिक विकास ने–जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, प्रदूषण, जैव विविधता का विनाश को जन्म दिया । जलवायु परिवर्तन आज वैश्विक संकट है ।

धार्मिक विचारों से हुई क्षति; धर्म मूलतः शांति, करुणा और नैतिकता सिखाता है, पर कट्टरता ने हिंसा को जन्म दिया ।

(क) धर्मयुद्ध; क्रूसेड्स, ईसाई और मुस्लिम शक्तियों के बीच लंबे युद्ध हुए । क्षतिः लाखों मौतें, सांस्कृतिक विनाश, पीढÞियों तक वैमनस्य ।

(ख) धार्मिक उत्पीड़न; स्पेनिश इंक्विजिशनः धार्मिक असहमति पर यातनाएँ दी गईं ।

(ग) सांप्रदायिक दंगे । भारत विभाजनः धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजन ने भीषण रक्तपात कराया । क्षतिः लाखों मौतें, करोड़ों विस्थापित, सामाजिक अविश्वास

(घ) अंधविश्वासः धर्म के नाम पर–जादू–टोना हत्याएँ, स्त्री उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार, मानव गरिमा को ठेस पहुँची ।

राजनीतिक विचारों से हुई क्षतिः राजनीति जनकल्याण का माध्यम है, लेकिन सत्ता–लालसा विनाशकारी बनती है ।

(क) विश्व युद्धः प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और साम्राज्यवाद ने करोड़ों लोगों की जान ली । (ख) तानाशाहीः एडोल्फ हिटलर, होलोकॉस्ट, जातीय श्रेष्ठता की राजनीतिक विचारधारा ने नरसंहार कराया । (ग) शीत युद्धः वैचारिक प्रतिस्पर्धा ने दुनिया को परमाणु भय में रखा । (घ) गृहयुद्ध और क्रांतियाँः राजनीतिक ध्रुवीकरण ने कई देशों में अस्थिरता फैलाई ।
सामाजिक विचारों से हुई क्षतिः जब समाज में असमानता और भेदभाव संस्थागत बन जाते हैं, तो मानवता घायल होती है । (क) जातिवादः जातिगत भेदभाव, मानव गरिमा को पीढÞियों तक चोट पहुँची । (ख) नस्लवादः अपार्थाइड, रंगभेद ने लाखों लोगों को अधिकारों से वंचित किया । (ग) लैंगिक भेदभावः स्त्रियों को शिक्षा, संपत्ति और स्वतंत्रता से वंचित रखा गया । (घ) दासप्रथाः अटलांटिक दास व्यापार, मानव को वस्तु बना दिया गया । मूल कारण, इन सभी त्रासदियों के पीछे सामान्य कारण थे–कट्टरता, असहिष्णुता, सत्ता की लालसा, नैतिकता का अभाव, संवादहीनता और अज्ञान ।
ऐतिहासिक प्रमाण ः विचारों ने ही इतिहास बदला
इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहाँ विचारों ने राष्ट्रों की दिशा बदल दी ।
महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा का विचार साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती देता है । यह विचार ही था जिसने करोड़ों भारतीयों को संगठित किया । दूसरी ओर ब्मयाि ज्ष्तभिच के नस्लवादी विचारों ने विश्व को द्वितीय विश्व युद्ध जैसी विभीषिका दी ।
इतिहास प्रमाणित करता है कि विचार यदि मानवीय हों तो रामराज्य की रचना करते हैं; यदि स्वार्थी और हिंसक हों तो महाभारत रचते हैं । विश्व इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब किसी राजनीतिक, धार्मिक, नस्लीय या वैचारिक सिद्धांत ने करोड़ों लोगों के जीवन को समाप्त कर दिया । २०वीं शताब्दी में एडोल्फ हिटलर द्वारा प्रतिपादित नाजी विचारधारा “आर्य नस्ल की श्रेष्ठता” पर आधारित थी । इस विचार के अनुसार जर्मन आर्य नस्ल विश्व की सर्वश्रेष्ठ जाति थी और अन्य जातियाँ निम्नतर थीं ।
लगभग ६० लाख यहूदियों की हत्या हुई
लाखों रोमा, विकलांग, समलैंगिक और राजनीतिक विरोधियों को मारा गया
द्वितीय विश्व युद्ध में लगभग ७ से ८.५ करोड़ लोग मारे गए ।
यह विचारधारा इस बात का प्रमाण है कि जब राष्ट्रवाद अंध–नस्लवाद में बदल जाता है तो वह मानवता के लिए अभिशाप बन जाता है । इसी तरह साम्यवादी तानाशाही और वर्ग–संघर्ष को स्टालिन और माओत्सेतुंग ने कठोर राज्य नियंत्रण के साथ लागू किया । जबरन सामूहिकीकरण, श्रम शिविर, राजनीतिक शुद्धिकरण के कारण लगभग १ से २ करोड़ लोगों की मृत्यु हुई । चीन में माओ के न्चभबत ीभबउ ँयचधबचम और ऋगतिगचब िच्भखयगितष्यल के कारणः भीषण अकाल, राजनीतिक दमन, सामाजिक अराजकता से लगभग ३ से ४.५ करोड़ लोगों की मृत्यु हुई । यह सिद्ध करता है कि जब समानता का सिद्धांत स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों को कुचल देता है, तब वह जनसंहार का कारण बनता है । धार्मिक कट्टरता और धर्मयुद्धः इतिहास में धार्मिक श्रेष्ठता के विचार ने भी अनेक नरसंहार कराए । क्रूसेड्स ऋचगकबमभक में लाखों लोग मारे गए । यूरोप का धार्मिक संघर्षः कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट संघर्षों में लाखों लोग मारे गए ।
आधुनिक आतंकवादः कट्टरपंथी संगठनों द्वारा धार्मिक विचारधारा के नाम पर हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए । यह बताता है कि जब धर्म अध्यात्म से हटकर सत्ता का उपकरण बनता है, तब विनाश होता है । उपनिवेशवाद और सभ्यता–श्रेष्ठता का सिद्धांतः यूरोपीय शक्तियों ने “सभ्यता फैलाने” के नाम पर एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में उपनिवेश स्थापित किए । इसके परिणामः मूल निवासियों का नरसंहार, दास प्रथा, सांस्कृतिक विनाश, अमेरिका में लाखों आदिवासी मारे गए । अफ्रीका से करोड़ों लोगों को दास बनाकर ले जाया गया । यह “सभ्य बनाने” का विचार वास्तव में शोषण का औजार बना । इसीतरह जातीय राष्ट्रवाद और विभाजनकारी राजनीतिः एबचतष्तष्यल या क्ष्लमष्ब के दौरान धार्मिक–राजनीतिक विचारधारा के कारणः लगभग १० से २० लाख लोग मारे गए, डेढ़ करोड़ से अधिक विस्थापित हुए । इसी प्रकार च्धबलमबल न्भलयअष्मभ में जातीय श्रेष्ठता के विचार से लगभग ८ लाख लोग केवल १०० दिनों में मारे गए । अति–राष्ट्रवादः जब राष्ट्रप्रेम विवेक खोकर उग्र राष्ट्रवाद बन जाता है, तब युद्ध और हिंसा को वैधता मिल जाती है । विश्वयुद्ध प्रथम और द्वितीय में अति–राष्ट्रवादी विचारधाराओं ने करोड़ों लोगों की जान ली ।
निष्कर्ष
यह निर्विवाद सत्य है कि विचार ही किसी भी युग, व्यवस्था और इतिहास का वास्तविक जनक होता है । महाभारत संग्राम दूषित विचारों की परिणति था, जबकि रामराज्य उदात्त विचारों की उपलब्धि । मानवता को सबसे अधिक क्षति विचारों से नहीं, विचारों की कट्टरता और दुरुपयोग से हुई है । विज्ञान जब विवेकहीन हुआ तो विनाश बना । धर्म जब करुणा खो बैठा तो संघर्ष बना । राजनीति जब सेवा से हटकर सत्ता बनी तो अत्याचार बना । समाज जब समानता भूल गया तो शोषण बना । इसलिए मानव सभ्यता का भविष्य इसी में है कि विचारों को मानवता, नैतिकता, सहिष्णुता और विवेक से जोड़ा जाए । “विचार जब प्रकाश बनते हैं तो सभ्यता बनती है; और जब अहंकार बनते हैं तो विनाश ।” आज भी समाज जिन संकटों से जूझ रहा है–भ्रष्टाचार, हिंसा, असमानता, स्वार्थ और नैतिक पतन–उनकी जड़ विचारों में है । यदि विचार शुद्ध होंगे तो समाज में रामराज्य जैसी व्यवस्था संभव होगी; यदि विचार दूषित होंगे तो महाभारत जैसी विभीषिका अपरिहार्य होगी । अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि–“मनुष्य पहले विचारों में युद्ध हारता या जीतता है; इतिहास तो केवल उसका दृश्य परिणाम होता है । विचार ही महाभारत का भी जनक है और रामराज्य का भी ।” “यद्भावं तद्भवति” का अर्थ यह नहीं कि केवल सोचने से सब कुछ हो जाएगा । यदि कोई व्यक्ति केवल सफलता का भाव रखे पर कर्म न करे, तो परिणाम नहीं मिलेगा । भारतीय दर्शन में भाव के साथ कर्म अनिवार्य है । भगवद्गीता का संदेश है–संकल्प + पुरुषार्थ + धैर्य = सिद्धि अतः यह सूत्र जादुई कल्पना नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक नियम है ।
ध्यान रहे ! मूल समस्याः विचार नहीं, उसका अंधानुकरण है । मानवता को सबसे अधिक विनाश हथियारों से पहले विचारों ने दिया है । नाजीवाद, कट्टर साम्यवाद, धार्मिक उन्माद, नस्लवाद, उपनिवेशवाद और अति–राष्ट्रवाद–इन सभी ने सिद्ध किया कि जब विचार मानवता से ऊपर रखे जाते हैं, तब सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती है । इसलिए किसी भी विचार की कसौटी यह होनी चाहिएः क्या वह मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा, सहिष्णुता और करुणा को बढ़ाता है ? यदि नहीं, तो वह विचार चाहे कितना आकर्षक क्यों न लगे, अंततः विनाशकारी ही सिद्ध हुआ है ।

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अजय कुमार झा
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