यदि जनता और लोकतंत्र समाप्त हो गया, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे – अमरेश सिंह
काठमांडू, आषाढ़ ३० – कल तक राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के सांसद अमरेश कुमार सिंह को लगता था कि यही एक पार्टी है जो देश में बदलाव ला सकता है या फिर देश को विकास की ओर ले जा सकता है । चुनाव के समय में जनता ने उनका प्रधानमंत्री बालेन और रास्वप सभापति रवि लामिछाने के प्रति प्रेम देखा है । आम जनता कुछ नहीं भूलती । न ही उसे याद दिलाने की जरुरत पड़ती है । लेकिन चुनाव के बाद जिस तरह रास्वपा और प्रधानमंत्री ने अपना रुख अपनाया है उसने मधेश और मधेश के नेताओं को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है । सांसद सिंह पहले भी रास्वपा की कुछ मुद्दों को लेकर अपना विरोध जता चुके हैं । आज उन्हें बाकी सभी दलों की याद आई है । आज संसद में उन्होंने यह बात कही कि सभी दलों को मिलकर राष्ट्र को बचाने और जनता की निराशा दूर करने के लिए एक राष्ट्रीय मुद्दा तय करना चाहिए ।
आश्चर्य है कल तक केवल एक ही पार्टी थी जनता की निराशा को दूर करने के लिए और आज जब बात संभलती नजर नहीं आ रही है तो सभी पार्टियों का साथ चाहिए । वैसे आज एक दो को, धीरे–धीरे बहुतो को समझ में आने लगेगी । उन्होंने आज संसद में बोलते हुए कहा कि देश संकट में है और सभी को एकजुट होकर इसका सामना करना होगाा जिससे ही इस संकट से पार उतरा जा सकता है । उन्होंने कहा, “आज देश पर संकट है, आज जनता पर संकट है । व्यापारी, नागरिक, युवा से लेकर विद्यार्थी तक निराश हैं । इस निराशा को बढ़ने न दें, इसका समाधान खोजें । मैं सभामुख से कहना चाहता हूँ— संसद में मौजूद सभी दलों को एकजुट करें, राष्ट्रीय मुद्दा तय करें । हम सभी दल मिलकर ही इस राष्ट्र को बचा सकते हैं और यहाँ की निराशा दूर कर सकते हैं । देश निर्माण की जिम्मेदारी लेकर हम सभी यहाँ उपस्थित हुए हैं।” अपने बोलने के ही क्रम में कुछ दिन पहले आत्मदाह करने वाले सर्लाही–४ के युवा विवेक मंडल के निधन पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते उनके परिवार के प्रति संवेदना भी व्यक्त की । इसके साथ ही उन्होंने दो सप्ताह के भीतर तीन युवाओं द्वारा आत्मदाह किए जाने की घटना का उल्लेख करते हुए सभी को श्रद्धांजलि दी ।
इसके बाद उन्होंने एक अनुभवी सांसद के रूप में राष्ट्र के संकट का सामना करने के लिए सभी राजनीतिक दलों के एकजुट होने की आवश्यकता पर जोर दिया ।
उन्होंने कहा कि ‘इस देश में जीना संभव नहीं, कुछ करना संभव नहीं’—ऐसी धारणा कम से कम इस संसद से न बने । मैं सभी राजनीतिक दलों से अनुरोध करता हूँ कि इसे आपसी आरोप–प्रत्यारोप का विषय न बनाएं। यदि राज्य रहेगा, लोकतंत्र रहेगा और जनता रहेगी, तो हम फिर राजनीति कर लेंगे—कोई सत्ता पक्ष से, कोई विपक्ष से । सत्ता और विपक्ष स्थायी नहीं हैं। लेकिन यदि जनता और लोकतंत्र समाप्त हो गए, तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे ।


