भारत-नेपाल संवाद का अधूरा सच: ‘नेपाल को समझने’ के विमर्श में मधेस आखिर कहाँ है ? : जयप्रकाश आनन्द
27 अगस्त को काठमांडू में आयोजित होने वाले NDTV World के ‘Anviksha: Ideas Across Borders—The India-Nepal Dialogue’ को महज़ एक सामान्य मीडिया कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता। आयोजकों के अनुसार, यह एक ऐसा संवाद है जो नेपाल को उसके अपने दृष्टिकोण, प्राथमिकताओं, आकांक्षाओं और भविष्य के सपनों के माध्यम से समझने का प्रयास करेगा। इस मंच पर राजनेता, मंत्री, राजनयिक, सांसद, व्यवसायी, रणनीतिक विश्लेषक, कलाकार, खिलाड़ी और युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि एक साथ मौजूद हैं।
लेकिन यहीं एक असहज करने वाला प्रश्न खड़ा होता है— यह ‘नेपाल’ आखिर किसका नेपाल है ?
काठमांडू के मंच से मधेस की बेदखली
सार्वजनिक की गई वक्ताओं की प्रारंभिक सूची में सत्ता, विपक्ष, कूटनीति, व्यापार, उद्योग, संचार, संस्कृति और खेल जगत की दो दर्जन से अधिक नेपाली-भारतीय हस्तियां शामिल हैं। लेकिन नेपाल की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले मधेस और मधेसी समुदाय का प्रतिनिधित्व इस सूची में लगभग अदृश्य है।
नेपाल-भारत संबंधों के सबसे संवेदनशील और गहरे भौगोलिक क्षेत्रों में से एक मधेस है। यह भारत के साथ संबंधों का कोई परिधीय (किनारे का) हिस्सा नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक सेतु है। इसलिए, ऐसे गंभीर विमर्श से मधेस की आवाज़ को गायब कर देना महज़ एक भूल नहीं है। यदि आयोजक पूर्वाग्रहों से परे जाकर नेपाल को उसकी अपनी आवाज़ में सुनना चाहते हैं, तो मधेस की आवाज़ कहाँ है?
प्रतिनिधित्व का सवाल या अंतिम क्षण का अपमान ?
मधेस का प्रतिनिधित्व मांगना कोई जातीय आरक्षण या कोटा मांगना नहीं है। जब विषय भारत-नेपाल संबंध हो, तो भारत के साथ सबसे गहरा सामाजिक संपर्क रखने वाले भूगोल और समुदाय के दृष्टिकोण को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना के बाद, अंतिम समय में प्रतिनिधि सभा के एक मधेसी चेहरे को वक्ता के रूप में शामिल किया गया। लेकिन यह कदम प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि ‘क्षतिपूर्ति प्रबंधन’ (Damage Control) है:
“अगर आमंत्रित नहीं किया गया तो इतना रोदन किस बात का?… नीति कहती है कि अगर किसी आयोजन में अंतिम समय में निमंत्रित किया जाए तो वहाँ कभी न जाएँ क्योंकि यह आपका अपमान है।” — सच्चिदानंद मिश्र की टिप्पणी
पहले संरचना से बाहर रखना और विरोध होने पर एक नाम जोड़ देना, एक गहरे राजनीतिक मनोविज्ञान और अपमान को दर्शाता है।
मूल प्रश्न: काठमांडू-केंद्रित मानसिकता
यह घटना केवल ‘निमंत्रण न देने’ की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता (Mindset) की है जो मधेस को ज्ञान के स्रोत या नीति-निर्माण के साझीदार के बजाय केवल दो रूपों में देखती है:
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एक राजनीतिक समस्या के रूप में।
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एक वोट बैंक या मतदाता के रूप में।
काठमांडू में बैठकर नेपाल के बारे में बोलने वालों को ‘राष्ट्रीय’ माना जाता है, जबकि काठमांडू के बाहर से उठने वाली आवाज़ों को ‘क्षेत्रीय’, ‘जातीय’ या ‘मधेसी’ कहकर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। मधेसी होना नेपाल का नागरिक होने का विकल्प नहीं है; यह नेपाली आवाज़ का ही एक अभिन्न स्वर है।
मधेस अब ‘अतिथि’ नहीं, ‘हितधारक’ (Stakeholder) है
भारत के साथ नेपाल के संबंधों पर चर्चा करते समय मधेस को शामिल करना केवल ‘समावेशिता’ नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है। मधेस के अनुभवों को सुने बिना द्विपक्षीय संबंधों की पूरी तस्वीर कभी तैयार नहीं हो सकती। निम्नलिखित विषयों पर मधेस की भूमिका निर्णायक है:
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सीमा और जन-स्तरीय संबंध: मधेस इस संपर्क का मुख्य केंद्र है।
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व्यापार, पारगमन और जल संसाधन: इन आर्थिक और सामरिक साझेदारियों में मधेस की ज़मीनी हकीकत अहम है।
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संघीयता और राज्य पुनर्संरचना: मधेस नेपाल के लोकतांत्रिक और संघीय निर्माण का एक प्रमुख साझीदार है।
यह किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं है, बल्कि अस्तित्व और सम्मान का सवाल है। मधेस कोई ‘विशेष निमंत्रण’ की प्रतीक्षा करने वाला समुदाय नहीं है; वह नीति-निर्माण की मेज़ पर अपनी समान नागरिक हैसियत मांग रहा है।
अगर मधेस को छोड़कर ‘नेपाल’ की बात की जाती है, तो वह पूर्ण नेपाल नहीं है। NDTV के संपादक ने इस संवाद का मूल प्रश्न रखा था— “How does Nepal see the world?” (नेपाल दुनिया को कैसे देखता है?)
लेकिन असली सवाल यह है कि नेपाल के भीतर का आधा आसमान न देख पाने वाली आंखें, दुनिया को कैसे देखेंगी?
(स्टेटस से )
(सप्तरी, सुन्दरी)



