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नेपाल-भारत सम्बन्ध और बोर्डर इस्यू : कौशल कुमार सिंह

 

कौशल कुमार सिंह, सिरहा, २५ अगस्त । नेपाल-भारत संबंध का मुख्य आधार मधेश और मधेशीयों का ही रहा है । कहने के लिए जो कहा जाय, जिसका जो जैसा स्वार्थ हो लेकिन सच्चाई यही है । मधेश और मधेशी के धरातल पर ही नेपाल-भारत संबंध का नींव रखा गया था, जो अभी भी उसी के आधार पर बरकरार भी है । इस बात को सीमांचल क्षेत्र में रहने वाले लोग ही समझ पाते हैं । दोनों देशों के संबंध के भावनाओं और संवेदनशीलता को वे लोग ही समझते है । संबंध के अतित, वर्तमान और भविष्य को भी समझते हैं । लेकिन बिडम्बना, दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले नीति निर्माण में इस क्षेत्र के लोग सहभागी नहीं बन पाते ।
राष्ट्रीय स्तर पर नेपाल-भारत संबंध के लिए कार्य करने वाले सीमांचल क्षेत्र से बाहर रहने वाले दोनों देशों के लोग इस बात को नहीं समझते और वे लोग समझ पाने में समर्थ भी नहीं है । कारण इस संबंध का खट्टा मीठा स्वाद वे लोग चखे ही नहीं है । जिसको जिस चीज का स्वाद नहीं पता वह कैसे उसके बारे में मंथन कर पाएंगे । लेकिन यहाँ पर हो यही रहा है । दोनों देशों के ओर से संबंध को टिकाने और मजबूत बनाने के लिए अधिकत्तर वही लोग काम कर रहे हैं जो सीमांचल क्षेत्र से बाहर के हैं । वे लोग जो दोनों देशों के बारे में नीतियां बनाते हैं उनका उद्देश्य जनहित से अधिक राष्ट्रहित होता हैं । जो समस्या को बढ़ा रहा है । उन्हें ये पता होना पड़ा कि राष्ट्रहित जनहित पर ही कायम रहता है । अगर राष्ट्रहित से जनहित को हटा दिया जाय तो वो कैसा राष्ट्रहित ?
अभी दोनों देशों के संबंध को समय अनुसार आगे बढ़ाने के लिए जो नीतियां तय होती है, उनमें राष्ट्रहित के लिए जनहित को दरकिनार कर विश्वहितको केन्द्रीत किया जा रहा है । जिससे सीमांचल क्षेत्र के लोग आहत हो रहे हैं । सीमांचल क्षेत्र के लोगों की जो आवश्यकताएं हैं, उनको पूरी करने के बजाय विश्वहित के लिए राष्ट्रहित को आगे दिखाया जाता है । जिसके पक्ष में सीमांचल क्षेत्र के बाहर वाले लोग खड़े हो रहे हैं । क्योंकि सीमांचल क्षेत्र के बाहर वाले लोगों को सीमांचल क्षेत्र की दैनिकी और आवश्यकताओं की औचित्य का पता नहीं है ।
नेपाल-भारत बीच के संबंध को विशिष्ट संबंध क्यों कहा जाता है, इसके लिए सैद्धांतिक अध्ययन से अधिक व्यवहारिक अध्ययन  की आवश्यकता है । लेकिन आज के सूचना प्रविधि के आधुनिक युग में विश्लेषणकर्ता व्यवहारिक और स्थलगत अध्ययन न कर शहरी और प्रविधि मैत्री अध्ययन पर निर्भर है । जिससे तथ्य कोसों दूर रह जाता है और आवश्यक लोगों के विपरीत नीतियां बन कर काम करने लगती है ।
इन्हीं सब पीड़ा से मधेशी लोग पीड़ित हैं । मधेशी और सीमांचल क्षेत्र के बासियों का पारिवारिक संबंध भारत के सीमा क्षेत्र के लोगों के साथ है । इसका कारण है अभी का जो सीमांचल क्षेत्र है, पहले वह एक ही देश था । इसी कारण उन लोगों के बीच हजारों वर्षों से ये पारिवारिक और जातीय संबंध चला आ रहा है । जो अभी जनहित के विपरीत राष्ट्रहित में बने दोनों देशों के नीतियों के कारण कमजोर बनती जा रही है ।
सीमांचल क्षेत्र के जनता के इसी संबंध के कारण नेपाल-भारत संबंध को रोटी-बेटी का संबंध भी कहा जाता है । लेकिन अब ये संबंध कमजोर हो रहा है । जो एक प्रायोजित कार्य है । नेपाल के शासन सत्ता में रहे लोग मधेशी के सुख, शान्ति और समृद्धि के विरोधी होने कारण उनका सोच ही हमेशा इस संबंध के विरोध में रहता आ रहा है । वैसे ही, भारत के केंद्रीय सत्ता में भी सीमांचल क्षेत्र से बाहर के लोग की अधिकता होने के कारण इस संबंध को मजबूत और समय सान्दर्भिक बनाने की कोशिश नहीं होती । वे लोग भी मधेशी विरोधी नेपाली सत्ताधारी के हां में हां मिलकर अपना काम करते हैं । उनके दृष्टि में भी अब मधेशी का हित प्राथमिकता में नहीं रहा ।
भन्सार समस्या
नेपाल सरकार के ओर से एक सौ रुपैया से अधिक के सामान लाने पर भन्सार लेने की जो कानून लागू किया गया है । इससे दोनों देशों के बीच जो खुला सीमा है, उस पर असर पड़ा है । खुला सीमा दोनों देशों के नागरिकों के बीच जो सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध है उसी के मध्ये नज़र रखा गया है । विगत में मिथिला और अवध देश के क्षेत्र दो देशों में बांटने पर देश के भीतर कोई विद्रोह न हो, इसके लिए खुला सीमा कायम किया था । लेकिन नेपाल के शासक समय-समय पर सीमा क्षेत्र के जनता के ऊपर दबाव बनाने के लिए सीमा क्षेत्र में अनेक अड़चनें उत्पन्न करते रहते है । अभी का भन्सार नीति, इसी का एक कड़ी है । सीमा के नाम पर होने वाले किसी भी प्रकार के विवाद में हमेशा शोषण और दमन मधेशी का ही होता आ रहा है । जिसका असर भारत के सीमांचल क्षेत्र के लोग भी झेलते आ रहे है ।

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कमजोर बनती पारिवारिक संबंध

दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों से स्थापित पारिवारिक संबंध अब धीरे-धीरे कमजोर बन रहा है । सीमा पर सुरक्षा और भन्सार नीति के कारण वैवाहिक और पारिवारिक कृयाकलाप में सहभागी होने में समस्या बढ़ा दिया है । सामुहिक आन जान में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है । जैसे शादी में बाराती जाने और शादी में प्राप्त उपहार ले जाने में समस्याएं बढ़ गयी है । अब तो लगभग बन्द ही हो गया है । जिससे दोनों देश के नागरिक के बीच होने वाले वैवाहिक संबंध कम हो‌ गया है । विवाह और अन्य अवसरों पर अपने संबंधी के यहां जाने वाले उपहार पर भी पाबंदी लग रहा है । किसी वाहन से आने पर भन्सार जैसे कड़ा कानून का सामना करना पड़ता है । जिससे आन जान करने वालों की मन खिन्न हो रहा है । इसीलिए अब नये संबंध बनाने से लोग कतरा रहे है ।

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संबंध के प्रमुख आधार

१. सामाजिक/पारिवारिक
नेपाल-भारत के संबंध का प्रमुख आधार ‌सामाजिक/पारिवारिक संबंध प्रमुख हैं । दोनों देशों के लोगों के बीच जातिय एवं वैवाहिक संबंध होने से एक दूसरे के बीच सामाजिक संबंध को कायम रखा गया है । दोनों देशों के सरकारी नीति जो भी हो, लेकिन सीमांचल क्षेत्र के लोग एक-दूसरे के यहां सामाजिक, वैवाहिक, पारिवारिक संबंध को बना कर रखा है । वे लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में साथ खड़े रहते है । इस सामाजिक संबंध को कोई तोड़ नहीं सकता, चाहे परिस्थिति जैसा भी हो । संभावना ये भी है की तोड़नेवाले कहीं खुद न टुट जाय । सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों का पारिवारिक संबंध के कारण दो देश होते हुए भी अपने को एक मानते है । जन्म से लेकर मृत्यु तक के कृयाकलाप में सहभागी होते हैं और साथ खड़ा रहते है ।
२. आर्थिक
नेपाल-भारत संबंध का मजबूत आधार आर्थिक भी है । एक-दूसरे देश के लोग अपने आर्थिक कारोबार को दोनों देशों में कर रखा है । चाहे वह रोजगारी के क्षेत्र हो अथवा व्यापार के क्षेत्र में ।दोनों देशों के लाखों लोग अपने-अपने आर्थिक उन्नति के लिए दोनों देशों में काम कर रहे हैं । जिसको तोड़ पाना नामुमकिन जैसा है ।
इसके साथ, नेपाल एक भूपरिवेष्ठित राष्ट्र होने के कारण नेपाल तीसरी दुनियां से जुड़ने लिए भारत पर निर्भर है । दूसरी ओर नेपाल के दैनिक उपभोग वस्तु का बड़ा हिस्सा भारत पर निर्भर है । जिसका विकल्प नेपाल के पास अभी नहीं है । वैसे ही, भारत के निजी क्षेत्र का बड़ी लगानी नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में है ।
३. सांस्कृतिक/धार्मिक
नेपाल-भारत के लोगों के बीच का धार्मिक, सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्षों से चला आ रहा है । खास कर हिन्दू और बौद्ध धर्म/संस्कृति मानने वाले लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार को एक-दूसरे देश में जाकर करते हैं । विभिन्न पर्व त्यौहार के अवसर पर दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के समारोह में शामिल होते है और खुशियां मनाते हैं, खानपान में सरीक होते है ।
इस बात को सीमांचल क्षेत्र के लोगों से अधिक और कोई नहीं समझ सकते । क्योंकि ये परम्परा सीमांचल क्षेत्र के लोगों के बीच काफी समय से चला आ रहा है । सीमांचल क्षेत्र में रहने वाले दोनों देशों के लोगों के बीच धर्म, संस्कृति, भाषा, बोली, व्यवहार सभी एक समान हैं । जो संबंध का प्रमुख आधार बना हुआ है ।
४. भाषिक
दोनों देशों के संबंध का प्रमुख आधार भाषा भी हैं । जहां जाने पर आपसी संबंध बनाने में समय नहीं लगता । दोनों देशों के लोग एक-दूसरे देश में बिना हिचकिचाहट हिन्दी भाषा को एक माध्यम के रुप में प्रयोग करते है । नेपाल में पहाड़ी समुदाय के कुछ लोग ठीक से हिन्दी न बोले लेकिन वे जब भारत जाते है तो ठीक-ठाक हिन्दी बोलने लगते हैं । भाषिक सहजता के कारण दोनों देशों के नागरिक के बीच संबंध स्थापित आसानी से हो जाता है । जिसका प्रयोग व्यापार, शिक्षा, उपचार, धार्मिक/पर्यटकीय भ्रमण आदी में प्रयोग किया जाता है ।

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कौशल कुमार सिंह, सिरहा,

(लेखक, नेपाल में राष्ट्रिय पिछडावर्ग महासंघ के अध्यक्ष है ।)

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