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भारतीय राजदूतावास, काठमांडू द्वारा ‘हिंदी दिवस समारोह 2026’ का आयोजन: ‘हिंदी पखवाड़ा’ का हुआ शुभारंभ

 

कृतिका यादव, ​काठमाडौँ, १४ सितंबर । 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ के पावन अवसर पर भारतीय राजदूतावास, काठमाडौँ द्वारा एक विशेष साहित्यिक व सांस्कृतिक समारोह का गरिमामय आयोजन किया गया। इस अवसर पर 14 सितंबर से 28 सितंबर तक चलने वाले ‘हिंदी पखवाड़ा’ का औपचारिक शुभारंभ किया गया, जिसे पूरे उत्साह के साथ ‘हिंदी मास’ के रूप में मनाया जा रहा है।

भारतीय दूतावास PIC के ​प्रथम सचिव वशिष्ठ नंदन जी का स्वागत वक्तव्य

​समारोह के प्रारंभ में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारतीय राजदूतावास के प्रथम सचिव (संस्कृति) वशिष्ठ नंदन जी ने दूतावास परिवार, परिसर स्थित केंद्रीय विद्यालय के शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं नेपाल व भारत से पधारे गणमान्य साहित्यकारों और अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने बताया कि इस पखवाड़े के दौरान विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी और 28 सितंबर को पखवाड़े के समापन अवसर पर पुरस्कार वितरण किया जाएगा।

​ *केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी का वर्चुअल संदेश: “स्वभाषा और स्वाभिमान ही स्वराज का आधार”*

​समारोह में भारत के माननीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी का वर्चुअल संदेश प्रसारित किया गया, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:
*विविधता में एकता:* भारत की बहुभाषी संस्कृति ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हर भाषा अपने साथ इतिहास, लोक परंपरा और जीवन दृष्टि लेकर चलती है।
संवाद और समन्वय की भाषा* : हिंदी किसी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के बीच आत्मीय संवाद और राष्ट्रीय एकता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
*अ-हिंदी भाषियों का योगदान* : स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी (जिन्होंने 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की) और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अ-हिंदी भाषी महापुरुषों ने हिंदी को जन-संवाद का माध्यम बनाया।
*स्वराज और स्वभाषा:* स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वदेशी, स्वराज और स्वभाषा के विचारों ने राष्ट्रीय चेतना को ऊर्जा दी। स्वतंत्रता सेनानियों ने माना कि स्वभाषा और स्वाभिमान के बिना स्वराज अधूरा है। आजादी के बाद भी हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्र निर्माण और जन-कल्याण का मुख्य आधार बनी हैं।

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अध्यक्षीय वक्तव्य: श्रीमती भुवन ढुङ्गाना जी

​कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रही नेपाल की वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती भुवन ढुङ्गाना जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में सभी कवियों व संचालकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने महाकवि विद्यापति जी तथा अमृता प्रीतम जी के साहित्य का विशेष उल्लेख किया।
​उन्होंने अपने वक्तव्य में बहुत ही आत्मीय भाव से कहा कि— भाषा और साहित्य की कोई सीमा नहीं होती, यह किसी भौगोलिक सरहद में नहीं बंधती। नेपाल और भारत के बीच वर्षों से यह सुंदर परंपरा रही है कि साहित्यकार व कवि बिना किसी सीमा के बंधनों के एक-दूसरे के देश आते-जाते रहे हैं और अपने विचारों तथा रचनाओं का आदान-प्रदान करते रहे हैं। विश्व में हिंदी बोलने और समझने वाले अनेक देश हैं, और नेपाल-भारत के बीच तो यह भाषाई व सांस्कृतिक सेतु सदैव से जीवंत रहा है।
​श्रीमती भुवन ढुङ्गाना जी स्वयं नेपाली भाषी हैं और उनकी मातृभाषा नेपाली है, लेकिन वे हिंदी में भी अत्यंत सुंदर और प्रभावपूर्ण रचनाएं लिखती हैं। उन्होंने विशेष रूप से साझा किया कि उनकी पहली हिंदी कविता ‘जाड़े की धूप’ पहली बार ‘हिमालिनी’ पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी। उन्होंने बताया कि साहित्य रचना का भाव सीमाओं से परे जाकर सीधा हृदय से जुड़ता है।

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*​साहित्यिक विचार-मंथन एवं विचार*

​मंच पर उपस्थित विद्वानों और साहित्यकारों ने भाषाई विविधता और उसके संवर्धन पर गहन विचार रखे:
​ धीरेंद्र प्रेमर्षि जी (वरिष्ठ साहित्यकार व मैथिली सेवी): उन्होंने अपनी मातृभाषा में कार्य करने के अनुभव साझा करते हुए कहा कि— “व्यक्ति चाहे किसी भी भाषा में बोले या कार्य करे, लेकिन अपनी मातृभाषा से जुड़ाव कभी नहीं टूटना चाहिए।” उन्होंने हिंदी को ‘वटवृक्ष’ (महाभाषा) का रूप देते हुए कहा कि हिंदी साधकों का यह दायित्व है कि इस वटवृक्ष की छत्रछाया में पल रहे क्षेत्रीय व लोकभाषाओं रूपी पौधों तक भी धूप, जल और पोषण पहुँचता रहे।

*​सरस्वती वंदना और भव्य कवि सम्मेलन*

​कार्यक्रम की शुरुआत डॉक्टर आनंद त्रिपाठी जी (केंद्रीय विद्यालय) द्वारा प्रस्तुत संस्कृत सरस्वती वंदना से हुई। इस अवसर पर यह सुंदर विचार रखा गया कि— “यदि हिंदी गंगा है, तो संस्कृत उसकी गंगोत्री है।”
​कवि सम्मेलन का कुशल मंच संचालन केंद्रीय विद्यालय के अध्यापक अनूप चौधरी जी ने किया। इस संपूर्ण हिंदी दिवस समारोह और कवि सम्मेलन के भव्य आयोजन एवं प्रबंधन में भारतीय राजदूतावास के अधिकारी धनेश द्विवेदी जी की मुख्य भूमिका रही। धनेश द्विवेदी जी, जो पूर्व में हिंदी के प्रोत्साहन हेतु कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं, ने इस कार्यक्रम को अत्यंत सुव्यवस्थित ढंग से संयोजित किया। उन्होंने कार्यक्रम में अपने विचार रखे और अपनी मर्मस्पर्शी कविताओं का वाचन किया, जिसने प्रेक्षागृह में उपस्थित सभी श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।

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*​कवि सम्मेलन में उपस्थित अन्य रचनाकारों ने भी अपनी-अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधा:*

​लव गुप्ता जी (भारतीय राजदूतावास): हाल ही में दूतावास में सेवा शुरू करने वाले लव गुप्ता जी ने ‘मां’ पर एक बेहद भावुक और हृदयस्पर्शी कविता प्रस्तुत की, जिसने सभी श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
​रीमा केसी जी: नेपाली भाषा की प्रसिद्ध साहित्यकार एवं कवियित्री, जिन्होंने महान कवियित्री अमृता प्रीतम जी की रचनाओं का नेपाली भाषा में अनुवाद भी किया है, ने अपनी सुंदर रचनाओं की प्रस्तुति दी।
​जैनाब खातून जी: चितवन की रहने वाली प्रख्यात कवियित्री जैनाब खातून जी ने अपनी बेहद मधुर और भावपूर्ण ग़ज़ल से श्रोताओं का दिल जीत लिया।
​इम्तियाज वफ़ा जी: उर्दू अकादमी के अध्यक्ष तथा प्रज्ञा प्रतिष्ठान के सदस्य वरिष्ठ शायर इम्तियाज वफ़ा जी को मंच पर आमंत्रित करते हुए इन पंक्तियों से स्वागत किया गया:
​”लफ़्ज़ों को कोई नया रूप दे दिया जाए,
हर एक शाम को महकती धूप दे दिया जाए।
बहुत सुनी हैं दर्द भरी दास्तानें हमने,
अब किसी नग़्मे को वफ़ा का रूप दे दिया जाए।”
इसके बाद इम्तियाज वफ़ा जी ने अपनी शानदार शायरी से संपूर्ण प्रेक्षागृह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

​ *निष्कर्ष*

​यह आयोजन न केवल हिंदी और अन्य भारतीय व नेपाली भाषाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम बना, बल्कि भारत और नेपाल के बीच आत्मीय, साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करने वाला एक ऐतिहासिक क्षण सिद्ध हुआ। प्रस्तुति : कृतिका यादव

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