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ब्रिक्स में भारत की नई भूमिका : सुरक्षा, ग्लोबल साउथ और रणनीतिक स्वतंत्रता की खोज

 

अनिल तिवारी, बिरगंज, 14 सितम्बर 2026 । वैश्विक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारतीय कूटनीति शांत लेकिन प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ रही है। बदलते आर्थिक शक्ति-संतुलन, युद्ध और क्षेत्रीय तनावों के बीच विश्व नई सामरिक और आर्थिक समीकरणों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत खुद को किसी एक शक्ति-गुट तक सीमित रखने के बजाय एक स्वतंत्र, संतुलनकारी और प्रभावशाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। इसी रणनीतिक सोच के कारण ब्रिक्स भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंच बन गया है।

करीब 20 वर्ष पहले कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह के रूप में शुरू हुआ ब्रिक्स आज एक व्यापक और विविध संगठन बन चुका है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुए इस समूह में अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया भी शामिल हो चुके हैं। इस विस्तार से ब्रिक्स का आर्थिक, भू-राजनीतिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव बढ़ा है। हालांकि सदस्य देशों की राजनीतिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक हितों में मौजूद विविधता ने निर्णय प्रक्रिया को अधिक जटिल भी बना दिया है।

इसी परिवेश में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता महत्वपूर्ण और संतुलित दिखाई देती है। भारत ने ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण’ को अपनी अध्यक्षता का मूल विषय बनाते हुए ‘मानवता प्रथम’ की जन-केंद्रित दृष्टि को आगे बढ़ाया है। 25 से अधिक भारतीय शहरों में सैकड़ों बैठकें और कार्यक्रम आयोजित किया जाना इस बात का संकेत है कि भारत ब्रिक्स को केवल शिखर सम्मेलन तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाना चाहता है। बिना किसी विवाद के जारी किया गया ब्रिक्स घोषणा-पत्र भी इस सम्मेलन के महत्व की ओर वैश्विक समुदाय का ध्यान आकर्षित करता है।

आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स की नई सुरक्षा भूमिका

ब्रिक्स का महत्व केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। बदलती सुरक्षा चुनौतियां भी इसकी भूमिका के विस्तार की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। ब्रिक्स सुरक्षा बैठक में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने कहा था कि सदस्य देशों में दुनिया की करीब 4.2 अरब आबादी रहती है और विश्व के लगभग 28 प्रतिशत भूभाग का प्रतिनिधित्व इन देशों द्वारा किया जाता है। इतनी बड़ी आबादी और विशाल भौगोलिक क्षेत्र को समेटने वाला संगठन वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों तथा वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक में आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर ध्यान आकर्षित किया। आज आतंकवाद किसी एक देश या सीमा तक सीमित नहीं है। चरमपंथी विचार इंटरनेट के माध्यम से फैलते हैं, आतंकवादी संगठन डिजिटल माध्यमों से भर्ती करते हैं और धन का हस्तांतरण हवाला, फर्जी कंपनियों, मादक पदार्थों के कारोबार, अवैध बाजारों तथा डिजिटल परिसंपत्तियों के जरिए किया जा सकता है।

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2001 के 9/11 हमलों के बाद दुनिया ने आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की केंद्रीय चुनौती के रूप में देखना शुरू किया। उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1373 ने आतंकवादी गतिविधियों के वित्तीय और संगठनात्मक आधार को रोकने के लिए सदस्य देशों की जिम्मेदारियां बढ़ाईं। लेकिन दो दशक से अधिक समय बाद भी आतंकवाद का स्वरूप और अधिक जटिल हो गया है।

भारत स्वयं सीमा-पार आतंकवाद का लंबे समय से सामना करता आया है। पंजाब और कश्मीर की हिंसा से लेकर संसद हमले, मुंबई के 26/11 हमले, पुलवामा और पहलगाम तक की घटनाओं ने भारत को आतंकवाद के बदलते चरित्र का गहरा अनुभव दिया है। इसलिए भारत का जोर केवल आतंकवादी हमले के बाद प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था पर नहीं, बल्कि हमले से पहले जोखिम की पहचान कर उसे रोकने वाली प्रणाली पर भी रहा है।

ब्रिक्स आतंकवाद के खिलाफ सहयोग को पांच प्रमुख आधारों पर आगे बढ़ा सकता है। पहला, साझा सुरक्षा और खतरा डाटाबेस तैयार किया जाना चाहिए। आतंकवादी संगठनों, उनके सहयोगियों, वित्तीय स्रोतों, भर्ती नेटवर्क, डिजिटल प्रचार माध्यमों तथा संदिग्ध यात्राओं से संबंधित सूचनाओं का सुरक्षित और कानूनी ढांचे के भीतर आदान-प्रदान आवश्यक है।

दूसरा, आतंकवादी वित्तपोषण को रोकने के लिए प्रभावी वित्तीय तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। आतंकवाद का पैसा कहां से आता है, किस माध्यम से स्थानांतरित होता है और किन क्षेत्रों में निवेश किया जाता है, इस संबंध में सदस्य देशों के बीच वास्तविक समय में सहयोग जरूरी है। हवाला, फर्जी कंपनियों, मादक पदार्थों के कारोबार, अवैध बाजारों और डिजिटल परिसंपत्तियों के दुरुपयोग पर विशेष निगरानी रखनी होगी।

तीसरा, डिजिटल कट्टरपंथ के खिलाफ सहयोग बढ़ाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीपफेक, सोशल मीडिया और बंद डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए घृणा, हिंसा और आतंकवादी प्रचार फैलाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे निपटने के लिए तकनीकी कंपनियों, सुरक्षा एजेंसियों और सरकारों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नया ढांचा आवश्यक है।

चौथा, सीमा और आवागमन संबंधी सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत करना होगा। संदिग्ध यात्राओं के पैटर्न की पहचान, यात्रियों से संबंधित सूचनाओं का सुरक्षित आदान-प्रदान तथा अंतरराष्ट्रीय अपराध और आतंकवाद के बीच संबंधों की पहचान के लिए सदस्य देशों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

पांचवां, ‘ब्रिक्स सेंटर फॉर टेररिज्म प्रिवेंशन’ की स्थापना की जा सकती है। ऐसा केंद्र अनुसंधान, प्रशिक्षण, जोखिम मूल्यांकन, संयुक्त अभ्यास तथा आतंकवाद की रोकथाम से जुड़े सफल अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए स्थायी संस्थागत आधार प्रदान कर सकता है।

इसके लिए ब्रिक्स काउंटर-टेररिज्म वर्किंग ग्रुप और मौजूदा कार्ययोजनाओं को अधिक प्रभावी बनाना होगा। वर्तमान तंत्र उपयोगी हैं, लेकिन उन्हें केवल चर्चा और घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय कार्यान्वयन-केंद्रित ढांचे में बदलना आवश्यक है।

भारत की नई अध्यक्षता और चार स्तंभ

ब्रिक्स के 20वें वर्ष में प्रवेश के साथ इसकी प्राथमिकताओं और भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। विश्व व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लक्ष्य अब भी कायम हैं। लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने का वैश्विक परिवेश 2021 की तुलना में काफी बदल चुका है। इस बदलाव को ‘रेजिलिएंस’ यानी लचीलापन या संकटों से निपटने की क्षमता के बदलते अर्थ से समझा जा सकता है।

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2021 में भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स का मुख्य ध्यान कोविड-19 महामारी के तत्काल प्रभावों के प्रबंधन पर था। सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक गतिविधियों की निरंतरता, महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं का पुनरुद्धार और संकट के समय सदस्य देशों के बीच सहयोग प्राथमिकता में थे। लेकिन पांच वर्ष बाद रेजिलिएंस का अर्थ केवल किसी तत्काल संकट से बाहर निकलना नहीं रह गया है। अब इसका अर्थ आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और संस्थागत व्यवस्थाओं को एक साथ आने वाले अनेक संकटों का सामना करने में सक्षम बनाना है।

महामारी के बाद दुनिया ने आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट, व्यापारिक अनिश्चितता और तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों का सामना किया है। एक क्षेत्र में उत्पन्न समस्या दूसरे क्षेत्र को तुरंत प्रभावित कर सकती है। इसलिए उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मजबूती का निर्माण अब केवल आर्थिक विकास हासिल करना नहीं, बल्कि संभावित बहुआयामी संकटों का सामना करने में सक्षम समग्र व्यवस्था तैयार करना है।

भारत की चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता का मूल विचार ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता का निर्माण’ है। इन चारों विषयों को अलग-अलग प्राथमिकताओं के बजाय एक-दूसरे से जुड़े विकास के आधार के रूप में समझना चाहिए।

उदाहरण के लिए, आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने के लिए उत्पादन और तकनीक में नवाचार आवश्यक है। सतत ऊर्जा परिवर्तन से ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता भी बढ़ती है। इसी तरह वित्तीय और डिजिटल सहयोग बाहरी आर्थिक झटकों का सामना करने की क्षमता को मजबूत कर सकता है। नवाचार लचीलापन बढ़ाता है, सहयोग तकनीक और संसाधनों तक पहुंच आसान बनाता है तथा दीर्घकालीन निरंतरता भविष्य के जोखिमों को कम करने में मदद करती है।

इस दृष्टि से ब्रिक्स का नया रेजिलिएंस फॉर्मूला तत्काल संकट प्रबंधन से आगे बढ़कर दीर्घकालीन और बहुआयामी व्यवस्था के निर्माण की दिशा में जाता दिखाई देता है।

विस्तार से बढ़ी जिम्मेदारी

2021 में पांच सदस्यीय ब्रिक्स का नेतृत्व करने वाला भारत अब एक बड़े और अधिक विविध समूह की अध्यक्षता कर रहा है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया की भागीदारी ने समूह के भौगोलिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय दायरे को काफी व्यापक बनाया है। एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और अन्य क्षेत्रों के ऊर्जा उत्पादक तथा विनिर्माण केंद्र अब एक ही मंच पर हैं।

इस विस्तार से ऊर्जा, व्यापार, वित्त, तकनीक और सतत विकास के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हुए हैं। लेकिन सदस्य देशों की विदेश नीति, आर्थिक संरचना और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं समान नहीं हैं। प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों, क्षेत्रीय विवादों और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को लेकर उनके दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इससे साझा सहमति बनाना कठिन हो सकता है।

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फिर भी ब्रिक्स का वास्तविक महत्व इसी विविधता में है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि सभी सदस्य रणनीतिक रूप से एक ही दिशा में खड़े हों। अलग-अलग विचारों और हितों वाले देशों को संवाद के एक मंच पर बनाए रखना भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत-चीन संबंध इसका उदाहरण हैं, जहां आर्थिक सहयोग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा एक साथ जारी रह सकती है। विवादों का समाधान न होने के बावजूद साझा हित वाले क्षेत्रों में सहयोग कायम रखा जा सकता है।

एआई से ऊर्जा और आपूर्ति शृंखला तक

ब्रिक्स के बदलते एजेंडे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई है। 2021 में एआई आज की तरह वैश्विक बहस का प्रमुख विषय नहीं था। लेकिन 2025 तक एआई गवर्नेंस ब्रिक्स सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया। ब्रिक्स नेताओं ने ‘ग्लोबल गवर्नेंस ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ पर विशेष वक्तव्य भी स्वीकार किया।

इससे तकनीक केवल आर्थिक विकास का साधन न रहकर वैश्विक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा विषय बन गई है। एआई का विकास जिम्मेदार, समावेशी और विकासोन्मुख होना चाहिए तथा इससे नई निर्भरता और जोखिम पैदा नहीं होने चाहिए।

इसी तरह आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल बुनियादी ढांचा, जलवायु परिवर्तन, विकास वित्त और भुगतान प्रणालियों में सहयोग भी ब्रिक्स की नई प्राथमिकताओं के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

भारत की रणनीति : पश्चिम-विरोध नहीं, रणनीतिक स्वतंत्रता

भारत ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनाना नहीं चाहता। इसका प्रमुख कारण भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है—रणनीतिक स्वतंत्रता।

भारत एक ओर ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, क्वाड, आई2यू2, आईबीएसए, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा गठबंधन जैसे विभिन्न मंचों पर सक्रिय है, तो दूसरी ओर अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और खाड़ी देशों के साथ भी गहरे संबंध बनाए हुए है।

यह कोई विरोधाभास नहीं है। बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में अपने विकल्प खुले रखने की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ और ‘मल्टी-एंगेजमेंट’ रणनीति है। भारत के लिए किसी संगठन का नाम महत्वपूर्ण होने से अधिक महत्वपूर्ण उससे मिलने वाले व्यावहारिक परिणाम हैं।

भारत ब्रिक्स के माध्यम से डिजिटल भुगतान, सीमा-पार लेनदेन, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला, तकनीक, जलवायु वित्त, छोटे और मध्यम उद्यमों तथा विकास वित्त जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणाम हासिल करना चाहता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक ने इस सहयोग को आर्थिक आधार प्रदान किया है।

इसलिए बदलते वैश्विक समीकरणों में ब्रिक्स भारत के लिए केवल आर्थिक समूह नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता, ग्लोबल साउथ की आवाज, सुरक्षा सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है। आने वाले समय में भारत की चुनौती यही होगी कि वह ब्रिक्स की विविधता को विभाजन का कारण बनने से रोकते हुए उसे व्यावहारिक और परिणाम-केंद्रित सहयोग में बदल सके।

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