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जिसने स्वयं पर विजय पा लिया, उसने अपने जीवन का रहस्य जान लिया: बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 31 अगस्त 2026 । आत्मसंयम मनुष्य के जीवन की वह शक्ति है, जो उसे सही और गलत के बीच अंतर समझने तथा अपने विचारों, इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखने की क्षमता देती है। व्यक्ति हो, परिवार हो या समाज—संयम ही सुख, शांति और स्वस्थ जीवन का मजबूत आधार है। जीवन में अशांति, तनाव और अनेक समस्याओं का एक बड़ा कारण असंयम भी है।

आज समाज में बढ़ती हिंसा, अपराध, दुष्कर्म, तनाव, विवाद और अनेक सामाजिक बुराइयों के पीछे कहीं न कहीं आत्मसंयम की कमी दिखाई देती है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण खो देता है, तब उसका विवेक कमजोर पड़ने लगता है और वह कई बार ऐसे निर्णय ले बैठता है, जिनका परिणाम स्वयं उसके लिए, उसके परिवार और समाज के लिए नुकसानदायक होता है।

आत्मसंयम पुण्य की ओर बढ़ने की पहली सीढ़ी है। संयम की शुरुआत इंद्रियों पर नियंत्रण से होती है। मनुष्य के सामने जीवन में अनेक प्रकार के आकर्षण और प्रलोभन आते हैं। शुरुआत में ये आकर्षक और सुखद दिखाई देते हैं, लेकिन जब व्यक्ति इनके मोह में फंस जाता है तो धीरे-धीरे यही प्रलोभन उसके लिए बंधन बन जाते हैं। इसलिए किसी भी आकर्षण को स्वीकार करने से पहले उसके परिणामों पर विचार करना आवश्यक है।

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सुख की तलाश में व्यक्ति कई बार अपनी सीमाओं को भूल जाता है। इच्छाओं की पूर्ति की निरंतर चाह उसे भीतर से कमजोर करती जाती है। नैतिक रूप से कमजोर व्यक्ति प्रलोभनों का आसानी से शिकार हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संयमी और विवेकशील व्यक्ति भी इससे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीवन में परिस्थितियाँ और वातावरण ऐसे मोड़ ला सकते हैं, जहाँ हर व्यक्ति के धैर्य और आत्मसंयम की परीक्षा होती है।

मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के चंचल मन से होता है। मन को यदि सही दिशा में रखा जाए तो वही मन हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है और यदि उसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। इसलिए मन में उठने वाले विचारों, इच्छाओं और भावनाओं पर निरंतर निगरानी रखना आवश्यक है।

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जिस प्रकार युद्ध के मैदान में योद्धा अपने प्रतिद्वंद्वी की हर चाल पर नजर रखता है, उसी प्रकार जीवन में व्यक्ति को अपने मन की गतिविधियों के प्रति सजग रहना चाहिए। विवेक को जागृत रखना और सही समय पर स्वयं को रोक लेना ही आत्मसंयम की वास्तविक पहचान है।

वासना, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या और कुविचार मनुष्य के विवेक को कमजोर कर सकते हैं। यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो व्यक्ति धीरे-धीरे अपने मूल्यों और आदर्शों से दूर होता चला जाता है। इसलिए आत्मसंयम का अर्थ केवल इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाना है।

संयमित व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम नहीं बनता, बल्कि परिस्थितियों के बीच भी अपने विवेक और सिद्धांतों को जीवित रखता है। वह क्रोध में निर्णय नहीं लेता, लोभ में अपना चरित्र नहीं बेचता और प्रलोभन में अपने मूल्यों से समझौता नहीं करता।

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वास्तविक सुख बाहरी साधनों की अधिकता में नहीं, बल्कि मन की शांति में है। जिस व्यक्ति ने अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पा लिया, उसके लिए कठिन परिस्थितियाँ भी जीवन की परीक्षा बनकर आती हैं, पतन का कारण नहीं। आत्मसंयम मनुष्य को केवल बुराइयों से बचाता ही नहीं, बल्कि उसे अच्छे कर्म, श्रेष्ठ विचार और मानवता की सेवा की ओर भी प्रेरित करता है।

अंततः संयमित विचार अच्छे कर्मों को जन्म देते हैं, अच्छे कर्म पुण्य का आधार बनते हैं और पुण्य ही मनुष्य को वास्तविक सुख एवं शांति की ओर ले जाता है। इसलिए यदि हम स्वयं, अपने परिवार और समाज में सुख-शांति चाहते हैं तो इसकी शुरुआत दूसरों को बदलने से नहीं, बल्कि स्वयं को संयमित करने से करनी होगी। यही आत्मसंयम जीवन को सार्थक बनाने और मनुष्य को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।

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