जनकपुरधाम में ‘पठन संस्कृति का विकास’ विषयक अन्तरक्रिया सम्पन्न
जनकपुरधाम, 1 सितंबर। “बाल, युवा और वृद्ध—पुस्तकालय हो सभी का गंतव्य” के प्रेरक संदेश के साथ 19वें राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस के अवसर पर सोमवार को जनकपुरधाम में ‘पठन संस्कृति का विकास’ विषयक अन्तरक्रिया कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में वक्ताओं ने बदलते समय और बढ़ते डिजिटल प्रभाव के बीच समाज में पुस्तकों के प्रति रुचि जगाने तथा पुस्तकालयों को ज्ञान, अनुसन्धान और बौद्धिक विमर्श के सशक्त केन्द्र के रूप में विकसित करने पर विशेष जोर दिया।
मैथिली विकास कोष के अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी की अध्यक्षता में सम्पन्न कार्यक्रम में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तित्वों, साहित्यकारों, लेखकों, शोधकर्ताओं तथा जनकपुरधाम के प्रबुद्ध नागरिकों की उल्लेखनीय सहभागिता रही।
विद्यापति पुस्तकालय अध्ययन तथा अनुसन्धान केन्द्र के समन्वय एवं मैथिली विकास कोष के आयोजन में मैथिली विकास कोष, जनकपुरधाम में आयोजित अन्तरक्रिया में वक्ताओं ने कहा कि पुस्तकालय किसी समाज की बौद्धिक समृद्धि का दर्पण होता है। पुस्तकों से भरी अलमारियाँ तभी सार्थक हैं, जब उनमें संचित ज्ञान पाठकों के मन-मस्तिष्क तक पहुँचे और समाज में विचार तथा विवेक की नई चेतना पैदा करे।
कार्यक्रम में साहित्यिक एवं बौद्धिक व्यक्तित्वों ने कहा कि पठन संस्कृति किसी भी सभ्य, शिक्षित और जागरूक समाज की आधारशिला है। पुस्तक पढ़ने की आदत व्यक्ति के ज्ञान का विस्तार करने के साथ-साथ उसकी कल्पनाशक्ति, विवेक, तार्किक क्षमता और संवेदनशीलता को भी समृद्ध करती है।
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि मोबाइल फोन, सामाजिक सञ्जाल और अन्य डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के कारण विशेषकर बच्चों और युवाओं में नियमित पुस्तक-पठन की आदत कमजोर होती जा रही है। सूचना प्राप्त करने के साधन भले ही बढ़े हैं, लेकिन गहन अध्ययन, मनन और चिंतन की संस्कृति को बचाए रखना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को पुस्तकालय की ओर आकर्षित करने के लिए पुस्तकालयों को पारम्परिक ढाँचे से बाहर निकालकर आधुनिक और आकर्षक स्वरूप प्रदान करना होगा। पुस्तकालयों में पर्याप्त एवं अद्यतन पुस्तकें, डिजिटल संसाधन, ई–लाइब्रेरी, अनुसन्धान सामग्री तथा विद्यार्थियों और युवाओं के लिए नियमित साहित्यिक एवं बौद्धिक गतिविधियों की व्यवस्था की जानी चाहिए।
पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार नहीं
वक्ताओं ने पुस्तकालय की पारम्परिक अवधारणा को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि पुस्तकालय को केवल पुस्तक रखने और पढ़ने की जगह समझना उसके महत्व को सीमित करना है। आधुनिक पुस्तकालय को ज्ञान, अनुसन्धान, साहित्य, संवाद, विमर्श और सृजनात्मक गतिविधियों का केन्द्र बनाया जाना चाहिए।
ऐसे पुस्तकालयों में पुस्तक-पठन के साथ साहित्यिक गोष्ठी, लेखक–पाठक संवाद, वाचन प्रतियोगिता, पुस्तक चर्चा, अनुसन्धान परिचर्चा तथा विद्यार्थियों के लिए विभिन्न ज्ञानपरक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जा सकते हैं।
नई पीढ़ी को पुस्तक से जोड़ना चुनौती
अन्तरक्रिया में नई पीढ़ी को पुस्तकालय से जोड़ने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने कहा कि बच्चों में पठन की आदत जितनी कम उम्र में विकसित होगी, उतनी ही मजबूत उनकी ज्ञान-यात्रा होगी। इसके लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में पुस्तकालय-आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा विद्यार्थियों को नियमित रूप से पुस्तकालय जाने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि मोबाइल और डिजिटल तकनीक को पुस्तकालय का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी बनाया जाना चाहिए। डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुरूप पुस्तकालयों का डिजिटलीकरण कर पुस्तकों और अनुसन्धान सामग्री तक ऑनलाइन पहुँच उपलब्ध कराई जा सकती है।
सहकार्य से ही होगा पुस्तकालयों का विकास
कार्यक्रम में सहभागी व्यक्तित्वों ने पुस्तकालय विकास के लिए स्थानीय तह, शैक्षिक संस्थाओं, साहित्यिक एवं सामाजिक संघ-संस्थाओं तथा संबंधित सरकारी निकायों के बीच सहकार्य और समन्वय की आवश्यकता औँल्याई।
वक्ताओं का कहना था कि पुस्तकालय के विकास को केवल किसी एक संस्था की जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे सम्पूर्ण समाज के साझा अभियान के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। स्थानीय समुदाय, अभिभावक, शिक्षक, साहित्यकार, विद्यार्थी और जनप्रतिनिधि मिलकर पठन संस्कृति को सामाजिक आन्दोलन का रूप दे सकते हैं।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि जिस समाज में पुस्तक पढ़ने की परम्परा मजबूत होती है, वहाँ ज्ञान और विवेक की जड़ें गहरी होती हैं। पुस्तकें केवल अक्षरों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभव, इतिहास, संस्कृति, ज्ञान और मानवीय चेतना की पीढ़ी-दर-पीढ़ी यात्रा हैं।
अन्तरक्रिया कार्यक्रम ने यही संदेश दिया कि आज आवश्यकता केवल पुस्तकालयों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन्हें जीवंत, सक्रिय और जनोपयोगी ज्ञान-केन्द्र बनाने की है।
पठन संस्कृति का विकास वास्तव में ज्ञान-संस्कृति का विकास है; और ज्ञान-संस्कृति का विकास ही किसी राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।यह संस्करण समाचारपत्र/ऑनलाइन समाचार पोर्टल के लिए अधिक उपयुक्त है—इसमें समाचार का तथ्यात्मक स्वरूप रखते हुए भाषा को साहित्यिक गरिमा भी दी गई है।





