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बड़े होते मकान, छोटे होते रिश्ते …!! : बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 8 सितम्बर 2026 । समाज बदल रहा है। घर बदल रहे हैं, जीवनशैली बदल रही है, सोच बदल रही है और रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदल रहा है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बना दिया है, लेकिन इसी सुविधा के बीच एक सवाल मन को झकझोरता है—क्या आधुनिक बनने की दौड़ में हम अपने रिश्तों की आत्मीयता खोते जा रहे हैं?

आज हमारे हाथ में पूरी दुनिया है, लेकिन अपने ही घर के लोगों के लिए समय कम होता जा रहा है। मोबाइल की स्क्रीन पर हम घंटों दूसरों की जिंदगी देखते हैं, मगर पास बैठे अपने लोगों की आंखों में छिपी परेशानी पढ़ने का समय नहीं निकाल पाते। संपर्क बढ़ा है, लेकिन संवाद घटा है। लोग जुड़े बहुत हैं, मगर भीतर से अकेले भी होते जा रहे हैं।

कभी परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनाओं की सबसे सुरक्षित जगह हुआ करता था। घर में बुजुर्गों का अनुभव, माता-पिता का स्नेह, भाई-बहनों का अपनापन और बच्चों की चहचहाहट मिलकर परिवार को परिवार बनाती थी। आज वही रिश्ते छोटी-छोटी बातों, अहंकार, स्वार्थ और बढ़ती अपेक्षाओं के कारण कमजोर पड़ रहे हैं।

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सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम रिश्तों में प्रेम से अधिक अपनी अपेक्षाओं को महत्व देने लगे हैं। हम चाहते हैं कि दूसरा हमें समझे, लेकिन स्वयं उसे समझने का प्रयास कम करते हैं। हम सम्मान चाहते हैं, लेकिन सामने वाले को सम्मान देने में कई बार संकोच करते हैं। हम चाहते हैं कि कोई हमारी गलती माफ कर दे, लेकिन दूसरे की गलती स्वीकार करने का धैर्य नहीं रखते।

इस बदलती सोच का असर परिवार की अगली पीढ़ी पर भी पड़ रहा है। बच्चों को हम अच्छी शिक्षा, महंगे साधन और बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं? क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि बुजुर्गों के साथ बैठना भी एक सीख है, माता-पिता की बात सुनना भी संस्कार है और किसी दुखी व्यक्ति के साथ खड़ा होना भी सफलता का हिस्सा है?

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रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से मजबूत होते हैं।
इसलिए समाधान भी हमारे व्यवहार में ही है। परिवार में संवाद बढ़ाना होगा। प्रतिदिन कुछ समय ऐसा होना चाहिए, जब परिवार के लोग मोबाइल और दूसरी व्यस्तताओं से दूर बैठकर एक-दूसरे से बात करें। बच्चों की बातें सुनी जाएं, बुजुर्गों के अनुभवों को महत्व दिया जाए और जीवनसाथी की भावनाओं को समझने का प्रयास किया जाए।

मतभेद हर परिवार में होते हैं, लेकिन मनभेद को स्थायी बना देना हमारी भूल है। हर बहस जीतना जरूरी नहीं होता। कई बार रिश्ते बचाने के लिए एक कदम पीछे हटना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है। जहां प्रेम होता है, वहां ‘मैं सही हूं’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘हम साथ रहें’ होता है।

हमें आधुनिकता चाहिए, लेकिन संस्कारों की कीमत पर नहीं। हमें विकास चाहिए, लेकिन मानवीय संवेदनाओं की कीमत पर नहीं। तकनीक हमारे जीवन की जरूरत हो सकती है, लेकिन वह रिश्तों का स्थान कभी नहीं ले सकती।

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आज जरूरत किसी और को बदलने की नहीं, अपने भीतर झांकने की है। हम अपने घर से शुरुआत करें। अपनों के लिए समय निकालें। बात सुनें, समझें, माफ करें और जरूरत पड़ने पर थोड़ा झुकें। यही छोटे-छोटे प्रयास टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ सकते हैं। आखिरकार, आने वाली पीढ़ी हमारे उपदेशों से ज्यादा हमारे व्यवहार से सीखेगी। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य का समाज संवेदनशील हो, तो आज हमें अपने घरों में संवेदनशीलता का वातावरण बनाना होगा।
क्योंकि ऊंची इमारतें समाज को विकसित दिखा सकती हैं, लेकिन मजबूत रिश्ते ही उसे मानवीय बनाते हैं।

घर की पहचान उसकी दीवारों से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के बीच के प्रेम से होती है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि समाज कितना बदल गया है; असली सवाल यह है कि इस बदलाव के बीच हमारे भीतर का इंसान कितना बचा है।

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