Mon. Dec 9th, 2019

संपादकीय

हमारे पर्व हमें प्रकृति की पूजा करना सिखाते हैं : श्वेता दीप्ति

हिन्दू संकृति और आस्श्विन मास हिमालिनी  अंक अगस्त , सितंबर  2019 (सम्पादकीय ) | हिन्दू

 

आत्महत्या ! आखिर इसका समाधान क्या है ? : श्वेता दीप्ति

क्यों हार जाता है मन ? हिमालिनी,अंक अगस्त,2019 (सम्पादकीय)| आत्महत्या । एक डरावना शब्द । एक शब्द,

 

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र की प्राणवायु : डा.श्वेता दीप्ति

हिमालिनी, सम्पादकीय, अंक मई 2019 |विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र की प्राणवायु की भांति

 

 नारी को देवी नहीं सिर्फ इंसान समझें : डॉ श्वेता दीप्ति

नारी को देवी नहीं सिर्फ इंसान समझें स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा । सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ।।

 

धर्म जीवन को संयमित करता है : श्वेता दीप्ति

एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु । तथैव धर्मवैचित्त्यं तत्वमेकं परं स्मृतम् ।। आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति

 

हिंदी उर्वरा है, इसमें भाव प्रवणता है तथा व्याकरण से अनुशासित है : डा.श्वेता दीप्ति

सर्वग्राह्य हिन्दी भाषा को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो आज हिन्दी २२ देशों में करीब १००

 

प्रत्येक साहित्यकार अपने देश के अतीत से प्राप्त विरासत पर गर्व करता है : श्वेता दीप्ति

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018, (सम्पादकीय ) भर्तृहरि नीतिशतक में कहा गया है

 

आहः प्रकृति हमें कितना देती है : श्वेता दीप्ति

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018, (सम्पादकीय ) हिन्दू धर्म या यूँ कहूँ कि सनातन हिन्दू धर्म

 

काला झंडा दिखाना देशद्रोह कैसे हो गया ? : श्वेता दीप्ति

नीति और नीयत पर सवाल हिमालिनी, अंक सितंबर,२०१८, सम्पादकीय प्रहरी हिरासत में राममनोहर यादव की

 

मौन सरकार, लाचार तंत्र और बेजुवान जनता इस देश की नियति है : श्वेता दीप्ति

 प्रधानमंत्री की सोच सराहनीय परन्तु समयानुकूल नहीं सम्पादकीय, हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | मानसून की

 

विवादों ही विवादों में नेताओं के वादे कहीं खोने लगे हैं : श्वेता दीप्ति

पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार और वर्चस्व की भावना, कभी–कभी गम्भीर परिस्थितियाँ और परिणाम को जन्म

 

“पाकिस्तान भूटान या नेपाल नहीं है” परवेज मुसर्रफ की उक्ति पर नेपाल चुप क्यों : श्वेता दीप्ति

खुश रहो, क्योंकि उनके जेब भरे हुए हैंश्वेता दीप्ति, १९-०१६,  (सम्पादकीय,अक्टूबर अंक), शारदीय नवरात्र की

 

ओली सरकार कुर्सी बचाने के लिए सांसदों को मंत्रालय का उपहार दे रही है : श्वेता दीप्ति

वर्ष-१९,अंक-१,जनवरी २०१६ (सम्पादकीय) बिना किसी विशेष उपलब्धि के बीता हुआ वर्ष नेपाल की जनता को

 

संपादकीय

लोकतन्त्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होनेवाली व्यावस्था है। पञ्चायती व्यावस्था ओर

 

संपादकीय

नेपाल-भारत बीच स्थापित सम्बन्ध को कुछ परिधियों के तहत स्थापित है, ऐसा मानना हमारी अल्पज्ञानता