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यह देश बूढ़े कंधों पर टिका हुआ है : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक दिसम्बर 023।

कालवित् कार्यं साधयेत्”

एक और वर्ष गुजर गया । एक और नया साल हमसे जुड़ रहा है । गुजरता यह समय अपने किए गए कार्यों के विश्लेषण का है । समय की कीमत समझने वाला, निश्चित ही अपना कार्य पूर्ण कर लेता है । समय जब हाथों से निकल जाता है तो, अवश्य हमारे मस्तिष्क में यह आता है कि काश हमने समय का सदुपयोग किया होता ।

बहुत कोशिश और शहादत के बाद हमने लोकतंत्र को हासिल किया था । किन्तु देश की वर्तमान अवस्था ने हमें यह सोचने पर विवश कर दिया है कि आखिर चूक कहाँ हो रही है ? जनता क्यों पीछे मुड़ कर देखने के लिए बाध्य हो गई है । क्यों हमारे प्रतिनिधि, हमारी सरकार के पास कोई स्पष्ट लक्ष्य और उद्देश्य नहीं है ? नैतिकता कहती है कि देश सर्वोपरि है किन्तु स्वार्थ की राजनीति सत्ता पर आकर सिमट जाती है । देखा जाए तो यह देश बूढ़े कंधों पर टिका हुआ है । हर घर से युवा पलायन को बाध्य हैं । यह पलायन चाहे मजदूरी के लिए हो, नौकरी के लिए हो या शिक्षा के लिए हो, निरन्तर जारी है । जो जाते हैं वो विदेश की जमीन पर ही रहने के लिए बाध्य हो जाते हैं । जबकि देश को नई सोच, नई नीति की आवश्यकता है । एक दो चर्चित चेहरे हैं भी तो वो सिर्फ अच्छे पद की लालच में पीछे–पीछे चलने की राजनीति कर रहे हैं । उनमें वो आग नहीं है जो परिवर्तन की दिशा तय कर सकें ।

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वास्तव में युवा ही किसी भी राष्ट्र की परिवर्तनकारी शक्ति होते हैं । समर्पण, निष्ठा, त्याग और नवीनता की सुंदर भावना वाले प्रतिबद्ध युवाओं को राष्ट्र का अनमोल खजाना और उभरती हुई शक्ति माना जाता है । युवाओं में ही क्रांतिकारी परिवर्तन की नई ऊर्जाएं प्रज्वलित होती हैं । युवा ही स्वयं को और अपने समाज को यथास्थिति से मुक्त कर सामाजिक परिवर्तन के महाअभियान में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं । इतिहास पर नजर डालते हुए अगर हम नेपाल के गौरवशाली इतिहास के पन्ने पलटें तो वि.सं. १९९६ के राणा विरोधी आंदोलन में गंगालाल की भूमिका के बाद से, वि.सं.२००६, २०१५, २०३६, २०४६ का जन आंदोलन,वि.सं.२०५२ से संचालित सशस्त्र जनयुद्ध और मुख्यतः वि.सं. २०६२÷६३ के जनयुद्ध में युवाओं की भूमिका अतुलनीय थी । किन्तु आज यह परिदृश्य देखने को नहीं मिल रहा है । एक निराशा व्याप्त है । आने वाला समय या साल क्या लेकर आएगा यह तो भविष्य के गर्भ में है किन्तु निराशा के बादल अवश्य जनमानस पर छाया हुआ है ।

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हिन्दी की सरसता और इसकी महत्ता दोनों ही किसी परिचय की मुहताज नहीं है । हर वर्ष १० जनवरी विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर हिमालिनी अपनी यात्रा की ओर एक और नया कदम बढ़ाती है । हिमालिनी अपने सफल पचीस वर्ष के सफर को तय कर चुकी है । आगे भी यह अपने इसी तेवर, या यूँ कहें कि और भी बेहतरी के साथ आपके समक्ष आती रहेगी । समस्त सुधी पाठक, विज्ञापन दाता और शुभेच्छुओं को ‘हिमालिनी’ की ओर से नववर्ष की अनन्त शुभकामनाएँ ।

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यह सुन्दर है, यह शिव है,
यह मेरा हो, पर बँधा नहीं है मुझसे, निजी धर्म के मत्र्य है ।
जीवन निःसंग समर्पण है, जीवन का एक यही तो सत्य है ।

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