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: चीन दौरे की तैयारियां धीमी, किन्तु बहस तेज

 

सम्पादकीय, हिमालिनी अंक नवंबर 024 ।

प्रधानमंत्री ओली की आगामी चीन यात्रा की तैयारी शुरू है किन्तु यात्रा के ऐजेन्डे को लेकर संशय बरकरार है । इस यात्रा में जहाँ भारत से सम्बन्धों की चर्चा है वहीं बीआरआई पर नेपाल के रुख की भी चर्चा हो रही है । चीन प्रधानमंत्री ओली की यात्रा के मौके पर ’बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई)’ कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर करना चाहता है ।

२०१७ में दोनों देशों के बीच बीआरआई समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे । हालाँकि, कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर न होने के कारण चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बीआरआई नेपाल में शुरू नहीं हो पाई है । इस संबंध में ओली की यात्रा से इस आकलन के साथ दिलचस्पी बढ़ी है कि कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर हो सकते हैं । जबकि सत्तारूढ सरकार का प्रमुख घटक कांग्रेस प्रधानमंत्री ओली को सुझाव देती रही है कि उन्हें बीआरआई कार्यान्वयन योजना पर अभी समझौता नहीं करना चाहिए । यहाँ एमाले और काँग्रेस के विचारों में मतभेद है ।

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चीन दौरे की तैयारियां धीमी हैं किन्तु बहस तेज है । इसबीच सूत्रों के अनुसार पता चला है कि प्रधानमंत्री ओली की यात्रा का एजेंडा अभी तक चीन की ओर से नहीं मिला है । चीनी पक्ष द्वारा एजेंडा तय करके भेजने के बाद ही नेपाली पक्ष प्रधानमंत्री के साथ बैठकर चर्चा करेगा कि किस तरह का प्रस्ताव तैयार करना है ।

वैसे उम्मीद की जा रही है कि प्रधानमंत्री ओली चीन के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं करेंगे, जिससे गठबंधन खतरे में आए । कांग्रेस की सहमति के बिना बीआरआई कार्यान्वयन योजना पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए । वैसे भी वर्तमान में भारत के साथ नेपाल का सम्बन्ध ठंडा ही चल रहा है । इसलिए भारत को छेड़े बिना ही आगे बढ़ना होगा ।

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राजनीतिक गलियारे में प्रधानमंत्री ओली के दौरे को लेकर यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि शायद पोखरा एयरपोर्ट के निर्माण के दौरान लिए गए कर्ज को सब्सिडी में बदला जा सके । नेपाल सरकार चीन से एक्जिÞम बैंक से लिए गए कर्जÞ को अनुदान में बदलने के लिए कह रही है । किन्तु वैश्विक स्तर पर चीन की नीति को देखते हुए इसकी संभावना शून्य ही नजर आती है । प्रधानमंत्री के चीन दौरे को लेकर भारत के साथ नेपाल के रिश्ते पर भी चर्चा हो रही है । जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने इस दौरे को लेकर कहा है कि प्रधानमंत्री ओली द्वारा चाइना कार्ड खेला जा रहा है वहीं प्रधानममंत्री ओली भारत के प्रति कड़वा वक्तव्य देने से भी स्वयं को नहीं रोक पा रहे हैं । नेताओं का मानना है कि आज के संदर्भ में परम्पराओं की बात ना करें । नेपाल स्वतंत्र देश है और वह अपनी विदेश यात्रा का निर्णय कर सकता है । इसमें किसी भी देश को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । किन्तु यह भी एक सच है कि नेपाल को किसी एक देश के प्रभाव में आकर दूसरे देश को नाराज भी नहीं करना चाहिए । क्योंकि नेपाल चाहे जितना भी चीन के करीब हो जाए परंतु यह भारत को भी नाराज करने या उसके साथ रिश्तों को बिगाड़ने की सोच नहीं रख सकता है । इसलिए नीति वो हो, जिसमें देश का हित हो । जिसकी कमी यहाँ अक्सर दिखती रही है । सरकार के पास ना कोई दूरगामी योजना है और ना ही कोई मजबूत विदेश नीति ।

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डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादक ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक हिमालिनी

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