सीमा विवाद और नेपाल–भारत सम्बन्ध : अंशुकुमारी झा
अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक अप्रैल । नेपाल और भारत के सम्बन्ध विश्व के उन विशिष्ट द्विपक्षीय सम्बन्धों में गिने जाते हैं, जिनकी नींव केवल राजनीतिक या आर्थिक हितों पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति, धर्म, भाषा, पारिवारिक संबंधों और भौगोलिक निकटता पर आधारित है । दोनों देशों के बीच लगभग १,८५० किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसके कारण लोगों का आवागमन, व्यापार और सांस्कृतिक आदान–प्रदान सदियों से सहज रूप से होता रहा है । तथापि, समय–समय पर उत्पन्न होने वाले सीमा विवाद दोनों देशों के सम्बन्धों में तनाव का कारण बनते रहे हैं । फिर भी इन विवादों के बावजूद नेपाल और भारत के सम्बन्धों की गहराई और व्यापकता उन्हें स्थायित्व प्रदान करती है ।
नेपाल और भारत के सम्बन्ध प्राचीन काल से ही घनिष्ठ रहे हैं । दोनों देशों की सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक परंपराएँ एक–दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं । नेपाल में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर और भारत में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों के बीच श्रद्धालुओं का निरंतर आवागमन होता रहा है । इसी प्रकार जनकपुर धाम और अयोध्या के सांस्कृतिक सम्बन्ध दोनों देशों की साझा विरासत का प्रतीक हैं । सन् १९५० में दोनों देशों के बीच हुई भारत–नेपाल शांति और मैत्री संधि ने द्विपक्षीय सम्बन्धों को संस्थागत आधार प्रदान किया । इस संधि के तहत दोनों देशों के नागरिकों को आवागमन, रोजगार और निवास संबंधी विशेष सुविधाएँ प्राप्त हुईं । नेपाल और भारत के बीच अधिकांश सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित है, लेकिन कुछ क्षेत्रों को लेकर मतभेद बने हुए हैं ।
कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा यह नेपाल–भारत सीमा विवाद का सबसे प्रमुख मुद्दा है । नेपाल का दावा है कि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा उसके सुदूरपश्चिम प्रदेश का हिस्सा हैं । नेपाल अपनी दावेदारी का आधार १८१६ की सुगौली संधि को मानता है, जिसके अनुसार महाकाली (काली) नदी को दोनों देशों की पश्चिमी सीमा माना गया था । नेपाल का तर्क है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए उससे पूर्व का पूरा क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है ।
दूसरी ओर भारत का मानना है कि सीमा निर्धारण ऐतिहासिक प्रशासनिक नियंत्रण और प्रचलित नक्शों के अनुसार किया गया है तथा यह क्षेत्र भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में रहा है ।
सुस्ता दूसरा प्रमुख विवादित क्षेत्र है । यह क्षेत्र महाकाली नहीं बल्कि गंडक नदी के प्रवाह में समय–समय पर हुए परिवर्तन के कारण विवाद का विषय बना । नदी की धारा बदलने से सीमा निर्धारण में जटिलता उत्पन्न हुई, जिसके कारण दोनों देशों के दावों में अंतर दिखाई देता है ।
सीमा विवाद का सबसे बड़ा कारण ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों की अलग–अलग व्याख्या है । नेपाल और भारत दोनों अपने–अपने दावों के समर्थन में विभिन्न कालखंडों के नक्शों और अभिलेखों का उपयोग करते हैं । कई स्थानों पर नदियाँ प्राकृतिक सीमा का कार्य करती हैं । समय के साथ नदियों का मार्ग बदलने से सीमा रेखा को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है, जैसा कि सुस्ता क्षेत्र में देखा गया है । कभी–कभी आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ भी सीमा विवाद को अधिक संवेदनशील बना देती हैं । नेपाल और भारत दोनों में राजनीतिक दल राष्ट्रीय भावना से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देते हैं, जिससे सीमा विवाद सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है ।
सीमा विवादों ने समय–समय पर दोनों देशों के सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न किया है । विशेष रूप से सन् २०२० में नेपाल द्वारा नया राजनीतिक मानचित्र जारी किए जाने के बाद विवाद ने व्यापक चर्चा प्राप्त की । इसके बावजूद दोनों देशों ने संवाद के माध्यम से समस्या के समाधान की आवश्यकता पर बल दिया । हालाँकि यह भी सत्य है कि सीमा विवाद नेपाल–भारत सम्बन्धों का केवल एक पक्ष है । दोनों देशों के बीच सहयोग के अनेक क्षेत्र हैं, जो संबंधों को मजबूत बनाए रखते हैं ।
भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है । नेपाल के विदेशी व्यापार का बड़ा हिस्सा भारत के साथ होता है । नेपाल की ऊर्जा, पेट्रोलियम, खाद्य सामग्री और अनेक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भारत से होती है । वहीं नेपाल की जलविद्युत क्षमता भारत के लिए महत्वपूर्ण है । हाल के वर्षों में दोनों देशों ने ऊर्जा सहयोग को नई गति प्रदान की है । सीमा पार विद्युत व्यापार और पारेषण लाइनों के निर्माण से आर्थिक सम्बन्ध और सुदृढ़ हुए हैं । नेपाल और भारत के सम्बन्धों की सबसे बड़ी शक्ति दोनों देशों के लोगों के बीच का आत्मीय रिश्ता है । लाखों नेपाली नागरिक भारत में रोजगार प्राप्त करते हैं और अनेक भारतीय नेपाल में व्यापार एवं पर्यटन से जुड़े हैं ।
दोनों देशों के बीच खुली सीमा विश्व में एक अनूठा उदाहरण है । सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच वैवाहिक और पारिवारिक सम्बन्ध भी सामान्य हैं । यही कारण है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद जनस्तर पर निकटता बनी रहती है ।
नेपाल और भारत की खुली सीमा सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । दोनों देशों के सुरक्षा निकाय सीमा प्रबंधन, मानव तस्करी, अवैध व्यापार तथा अन्य सीमा–पार अपराधों की रोकथाम के लिए सहयोग करते हैं । नेपाल की भौगोलिक स्थिति भारत और चीन के बीच होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । इसलिए नेपाल और भारत दोनों स्थिर एवं मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को अपने दीर्घकालीन हित में मानते हैं ।
कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय स्वतन्त्रता पार्टी के अध्यक्ष महोदय भारत भ्रमण कर सुखद संदेश के साथ नेपाल लौटे हैं और अभी हमारे परराष्ट्रमन्त्री का भारत दौडा चल रहा है । आशा है सब कुछ सही रहे । क्योंकि सीमा विवादों का समाधान टकराव नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है ।
समग्र में सीमा विवाद सुलझाने के लिए संयुक्त सीमा आयोग को अधिक सक्रिय बनाया जाए । ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों का संयुक्त अध्ययन किया जाए । सीमा क्षेत्रों के विकास हेतु संयुक्त परियोजनाएँ संचालित की जाएँ । राजनीतिक नेतृत्व द्वारा संवेदनशील मुद्दों पर संयमित और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाए । तकनीकी विशेषज्ञों और भूगोलविदों की सहायता ली जाए । जिससे दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बनी रहे और यह सीमा सरहद कोई तनाव न रहे ।
नेपाल और भारत के सम्बन्ध हिमालय की तरह प्राचीन, गहरे और बहुआयामी हैं । सीमा विवाद एक वास्तविक समस्या है, जिसे नजÞरअंदाजÞ नहीं किया जा सकता, किंतु यह भी सत्य है कि दोनों देशों के सम्बन्ध केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं हैं । साझा संस्कृति, धार्मिक आस्था, आर्थिक सहयोग, जन–जन के सम्बन्ध और क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता दोनों देशों को एक–दूसरे के निकट लाती है । सीमा विवादों का समाधान आपसी सम्मान, संवाद और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर खोजा जाए । यदि दोनों देश धैर्य और कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय दें, तो सीमा विवाद समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और नेपाल–भारत सम्बन्ध भविष्य में और अधिक मजबूत तथा प्रगाढ़ बन सकते हैं ।


