सर्वोच्च अदालत का फैसला: विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र पति-पत्नी का संबंध सिद्ध करने के लिए अनिवार्य नहीं
नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए कहा है कि पति-पत्नी का वैधानिक संबंध स्थापित करने के लिए विवाह पंजीकरण (Marriage Registration) का प्रमाणपत्र अनिवार्य और अपरिहार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि यदि दो व्यक्तियों ने एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार किया हो, साथ रहकर वैवाहिक जीवन बिताया हो और परिस्थितिजन्य एवं अन्य विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध हों, तो विवाह पंजीकरण न होने पर भी वैवाहिक संबंध सिद्ध किया जा सकता है।
सर्वोच्च अदालत की व्याख्या
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा,
“विधायिका ने यह कानूनी आधार बनाया है कि यदि किसी कार्य या व्यवहार से दो व्यक्ति एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं, तो उसे विवाह माना जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रमाण न होने पर भी वैवाहिक संबंध दर्शाने वाले अन्य प्रासंगिक और परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए।”
क्या था मामला?
सुनसरी जिले की पवित्रा खड़का और मोहन कुमार चौधरी की मुलाकात वर्ष 2064 विक्रम संवत में विराटनगर स्थित मेट्रोपोलिस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों के बीच प्रेम संबंध शुरू हुआ और लगभग आठ वर्ष के प्रेम के बाद सावन 2072 में उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर में विवाह किया।
विवाह के बाद दोनों उसी दिन काठमांडू के कीर्तिपुर में किराए के मकान में पति-पत्नी की तरह रहने लगे। पवित्रा के अनुसार कुछ समय बाद मोहन उनसे दूर होने लगे और माघ 2073 में उन्होंने दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर दी।
इसके बाद पवित्रा ने सुनसरी जिला अदालत में पति-पत्नी का संबंध कायम करने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
मोहन का पक्ष
मोहन कुमार चौधरी ने अदालत में दावा किया कि:
उनके बीच कोई प्रेम संबंध नहीं था।
उन्होंने कभी विवाह नहीं किया।
दोनों के बीच पति-पत्नी का कोई संबंध नहीं था।
उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर की तस्वीरों को भी अस्वीकार करते हुए कहा कि वे फोटोशॉप से बनाई गई तस्वीरें हैं।
पवित्रा ने अदालत में लोक सेवा आयोग का वह आवेदन-पत्र भी प्रस्तुत किया, जिसे मोहन ने स्वयं भरकर दिया था। इस पर मोहन ने सफाई दी कि पवित्रा ने केवल अच्छी लिखावट होने के कारण उनसे फॉर्म भरने को कहा था।
जिला और उच्च अदालत के फैसले
सुनसरी जिला अदालत ने कहा कि पति-पत्नी का संबंध स्थापित नहीं होता।
उच्च अदालत ने जिला अदालत का फैसला पलटते हुए पति-पत्नी का संबंध कायम माना।
इसके बाद मोहन कुमार चौधरी उच्च अदालत के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च अदालत पहुँचे।
अन्य जुड़े हुए मुकदमे
इस विवाद से जुड़े कई अन्य मामले भी अदालत में लंबित थे:
बहुविवाह का मामला,
दूसरी शादी के विवाह पंजीकरण को रद्द करने की मांग,
संपत्ति में हिस्सेदारी (अंशचलन),
तथा निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की याचिका।
सर्वोच्च अदालत ने क्या कहा?
न्यायाधीश महेश शर्मा पौडेल और नृपध्वज निरौला की संयुक्त पीठ ने स्पष्ट किया कि:
केवल प्रेम संबंध या शारीरिक संबंध से विवाह सिद्ध नहीं होता।
विवाह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
यदि यह प्रमाणित हो जाए कि निश्चित समय और स्थान पर विवाह हुआ, दोनों ने एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार किया, साथ रहकर वैवाहिक जीवन बिताया और इसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य समर्थन देते हों, तो विवाह माना जाएगा।
11 साउन 2083 को दिए गए फैसले में अदालत ने कहा:
“पति-पत्नी का संबंध कायम करने के लिए विवाह या वैवाहिक संबंध की पुष्टि करने वाले पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक हैं। यदि विवाह की घटना, साथ रहना और परिस्थितिजन्य प्रमाण स्थापित हों, तो विवाह संपन्न माना जाना चाहिए।”
फैसले का महत्व
यह निर्णय नेपाल के पारिवारिक कानून की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि:
विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण साक्ष्य है, लेकिन एकमात्र और अनिवार्य साक्ष्य नहीं।
अदालत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, साथ रहने, सामाजिक स्वीकार्यता और अन्य विश्वसनीय प्रमाणों के आधार पर भी पति-पत्नी के संबंध को मान्यता दे सकती है।
हालांकि केवल प्रेम संबंध या साथ रहने का दावा अपने आप में विवाह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा; उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होंगे।


