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संविधान में संवैधानिकता की पहचान: प्रश्न, चुनौतियाँ और पुनर्विचार* डा. विजय दत्त

 

डा. विजय दत्त, काठमांडू, 20 सितंबर।

*अश्वत्थामा हतः, इति नरो वा कुञ्जरो वा।*
नेपाल के संविधान (२०७२) ने अपने ११ वर्ष पूरे कर लिए हैं और यह परिपक्वता की ऊँचाई की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है। संविधान की घोषणा के समय तराई-मधेस में मधेस-केंद्रित दलों द्वारा “ब्लैकआउट” (काला दिवस) मनाया गया था। शहादतें भी हुई थीं। लेकिन कुछ ही दिनों में मधेस-केंद्रित दलों के वही नेता उसी सरकार में उप-प्रधानमंत्री और मलाईदार मंत्रालयों के मंत्री बन गए। इसके बावजूद उठाए गए मुद्दे जस के तस बने रहे। “वही आँगन, वही घर, पर नहीं रहा किसी पर भरोसा।” मधेसी मूल के वर्तमान प्रधानमंत्री ने जनकपुरधाम में कहा था— “काठमांडू अधिकृत परिवर्तन के वास्ते नए पशुपतिनाथ के दर्शन किए जाएँ।” लेकिन व्यवहार इसके ठीक विपरीत दिखाई दिया है। समानुपातिक समावेशिता तो पंचायत व्यवस्था में भी थी और प्रजातांत्रिक व्यवस्था के ३५ वर्षों तक भी रही। वर्तमान में तो समानुपातिक समावेशिता में—और उसमें भी समावेशी के भीतर समावेशी का—पूरी तरह मज़ाक उड़ाया गया है। हाल ही में अनुशंसित १३ राजदूतों में मधेसी समुदाय से मुश्किल से २ नाम ही दिखाई दिए।

​१. *संविधान के अक्षर और आत्मा के बीच द्वंद्व*
संविधान केवल राष्ट्र के शासन संचालन का कानूनी आधार ही नहीं है, बल्कि राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास का एक दस्तावेज़ भी है। इसके ‘अक्षर’ (प्रावधान) राज्य की संस्थाओं, अधिकारों और उत्तरदायित्वों को निर्धारित करते हैं, जबकि इसकी ‘आत्मा’ नागरिक स्वतंत्रता, समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त करती है।
नेपाल की वर्तमान संवैधानिक बहस ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है— क्या संविधान का औपचारिक अस्तित्व बने रहने के बावजूद उसके कार्यान्वयन, राजनीतिक वैधता और संस्थागत विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं?
​२७ भदौ २०८३ (१२ सितंबर २०२६) के बाद की राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति को लेकर उठाए गए प्रश्न इसी चिंता को व्यक्त करते हैं। संविधान का ‘कोमा’ में पहुँचने का रूपक, सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार का संवैधानिक आधार, उस सरकार द्वारा कराए गए चुनाव की वैधता और संविधान संशोधन की बहस में शामिल व्यक्तियों का अधिकार क्षेत्र—इन सभी विषयों को भावनात्मक आरोपों से ऊपर उठकर कानूनी और राजनीतिक दृष्टिकोण से परखना आवश्यक है।
संविधान की रक्षा करने का अर्थ केवल संविधान का नाम जपना नहीं है; उसकी प्रक्रियाओं, मर्यादाओं, अधिकारों और सीमाओं का सम्मान करना भी है।

​२. *संविधान के ‘कोमा’ में रहने की स्थिति*
‘संविधान कोमा में है’ इस अभिव्यक्ति को शाब्दिक संवैधानिक स्थिति के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और संस्थागत संकट के रूपक के रूप में समझा जाना चाहिए।
संविधान की कोई धारा औपचारिक रूप से निलंबित हुई है या नहीं, संविधान के अनुसार संस्थाएँ काम कर रही हैं या नहीं, और राज्य के निर्णय संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर हैं या नहीं—ये अलग-अलग प्रश्न हैं।
नेपाल के संविधान की धारा ७४ संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था करती है, जबकि धारा ७५ यह उल्लेख करती है कि कार्यपालिका शक्ति संविधान और कानून के अनुसार मंत्रिपरिषद में निहित होगी। धारा २४६ निर्वाचन आयोग की चुनाव संबंधी जिम्मेदारियों को निर्धारित करती है।
इस संदर्भ में राष्ट्र के संवैधानिक जीवन की समीक्षा तीन स्तरों पर की जा सकती है:
पहला, संविधान की औपचारिक निरंतरता।
दूसरा, संवैधानिक संस्थाओं की वास्तविक कार्यक्षमता।
तीसरा, राज्य के निर्णयों के प्रति नागरिकों का विश्वास और सार्वजनिक स्वीकार्यता।
​यदि इन तीनों पक्षों के बीच गंभीर अंतर या खाई दिखाई देती है, तो संविधान की प्रभावकारिता पर बहस होना स्वाभाविक है। लेकिन संविधान के निष्क्रिय या निलंबित होने का औपचारिक निष्कर्ष निकालने के लिए उसका कानूनी आधार और संबंधित आधिकारिक निर्णय आवश्यक होता है।

​३. *संवैधानिक आधार और राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न*
सुशीला कार्की के नेतृत्व में सरकार का गठन और उसके द्वारा निभाई गई भूमिका को नेपाल के संवैधानिक इतिहास के एक विशेष राजनीतिक प्रसंग के रूप में अध्ययन किया जा सकता है।
गृह मंत्रालय का आधिकारिक विवरण कार्की के प्रधानमंत्री कार्यकाल को २८ भदौ २०८२ से दर्शाता है, जबकि निर्वाचन आयोग के अभिलेख यह स्पष्ट करते हैं कि प्रतिनिधि सभा का चुनाव २१ फागुन २०८२ (४ मार्च २०२६) को संपन्न हुआ था।
घटनाक्रम को आधार बनाकर सरकार के गठन, अधिकार क्षेत्र और चुनाव कराने के निर्णय पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन सरकार असंवैधानिक थी—इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उसके गठन के आधार, राष्ट्रपति के निर्णय, लागू संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था और संबंधित न्यायिक व्याख्याओं का अध्ययन आवश्यक है।
​राजनीतिक संकट की स्थिति में सरकार का गठन होना और उस सरकार के सभी निर्णयों का स्वतः वैध हो जाना—ये दोनों एक बात नहीं हैं। उसी प्रकार, असाधारण परिस्थिति में गठित सरकार के सभी कार्य स्वतः अवैध हो जाते हैं, यह निष्कर्ष भी पर्याप्त कानूनी परीक्षण के बिना नहीं निकाला जा सकता।
इसलिए मुख्य प्रश्न यह होना चाहिए: सरकार का गठन किस संवैधानिक या कानूनी आधार पर हुआ था? उसका अधिकार क्षेत्र क्या था? और उसके द्वारा किए गए निर्णयों की वैधता का परीक्षण करने की उपयुक्त प्रक्रिया क्या है?
इन प्रश्नों के उत्तर ही सरकार की संवैधानिक हैसियत पर निष्पक्ष बहस का आधार दे सकते हैं।

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​४. *वैधता: प्रक्रिया, अधिकार और जनादेश*
चुनाव लोकतंत्र का आधार है। लेकिन चुनाव की वैधता केवल मतदान संपन्न होने के तथ्य मात्र से निर्धारित नहीं होती। उसका संवैधानिक आधार, चुनाव कराने वाले निकाय का अधिकार, मतदाताओं की सहभागिता, निष्पक्षता, कानूनी प्रक्रिया और विवाद समाधान की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
निर्वाचन आयोग ने प्रतिनिधि सभा सदस्य चुनाव २०८२ से संबंधित सूचनाएँ और परिणाम अभिलेख प्रकाशित किए हैं। आयोग के विवरण में चुनाव संबंधी कानून, मत परिणाम और समानुपातिक तरफ से निर्वाचित सदस्यों का विवरण शामिल है।
लेकिन चुनाव संपन्न होने का आधिकारिक रिकॉर्ड और चुनाव की संवैधानिक वैधता पर उठे सवाल दो अलग विषय हैं।
यदि चुनाव के संवैधानिक आधार पर प्रश्न उठाया गया है, तो उसे प्रमाणों, कानूनी तर्कों और सक्षम निकाय के परीक्षण से स्पष्ट किया जाना चाहिए। चुनाव में भाग लेने वाले दलों की राजनीतिक स्वीकार्यता, जनता की सहभागिता और कानूनी वैधता को एक ही अर्थ में नहीं मिलाया जाना चाहिए।
चुनाव की वैधता पर उठे प्रश्नों का उत्तर कानूनी प्रक्रिया, सार्वजनिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के माध्यम से खोजा जाना चाहिए। हालाँकि, ये सब अभी भी गर्भ गृह में ही पड़े हुए हैं।

​५. *अश्वत्थामा हतो नरो वा कुञ्जरो वा’: अर्ध-सत्य का प्रतीक*
महाभारत के प्रसिद्ध प्रसंग में द्रोणाचार्य को खबर दी जाती है कि अश्वत्थामा मारा गया। ‘अश्वत्थामा हतः’ वाक्य के तुरंत बाद ‘नरो वा कुञ्जरो वा’ (मानव या हाथी) शब्द आते हैं। इस कथा का नैतिक तनाव सत्य की अपूर्ण अभिव्यक्ति और उससे उत्पन्न भ्रम पर केंद्रित है।
इस प्रसंग को समकालीन राजनीतिक बहस में एक रूपक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
राजनीति में किसी निर्णय के केवल एक पहलू को सार्वजनिक करना, प्रक्रिया की कठिनाइयों को छिपाना या कानूनी आधार स्पष्ट किए बिना वैधता का दावा करना नागरिकों में भ्रम पैदा कर सकता है।
इसलिए संविधान संशोधन और सरकार की वैधता से जुड़ी बहस में आधे-अधूरे सत्य के बजाय पूर्ण तथ्य, अनुमान के बजाय प्रमाण और राजनीतिक दावों के बजाय कानूनी स्पष्टता की आवश्यकता है।
‘अश्वत्थामा हतो नरो वा कुञ्जरो वा’ का संदेश आज के संदर्भ में हमें यह याद दिलाता है कि सत्य का एक अंश प्रस्तुत करके संपूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं किया जा सकता।

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​६. *संशोधन की अध्यक्षता: अधिकार क्षेत्र और प्रक्रियागत वैधता*
संविधान संशोधन की बहस में, संविधान द्वारा न पहचाने गए (अनभिज्ञ) व्यक्ति की अध्यक्षता को लेकर प्रश्न उठाया गया है। इस विषय को किसी व्यक्ति विशेष की पहचान या राजनीतिक निकटता के बजाय नियुक्ति के आधार, कार्यदेश और अधिकार क्षेत्र के दृष्टिकोण से परखना उपयुक्त होगा।
नेपाल के संविधान की धारा २७४ संविधान संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करती है। इसमें यह व्यवस्था है कि संशोधन विधेयक संघीय संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और उसे सार्वजनिक जानकारी के लिए प्रकाशित किया जाना अनिवार्य है।
इसका अर्थ यह है कि संविधान संशोधन का औपचारिक अधिकार और प्रक्रिया स्वयं संविधान द्वारा ही निर्धारित की गई है।
लेकिन संविधान संशोधन से संबंधित अध्ययन, सुझाव संग्रह या परामर्श के लिए गठित समितियों और संशोधन विधेयक पारित करने वाले संवैधानिक निकायों की भूमिका अलग-अलग होती है।
इसलिए किसी अध्यक्ष या समिति की वैधता का परीक्षण करते समय निम्नलिखित प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाते हैं:
समिति का गठन करने वाला निकाय कौन सा है ?
उसके गठन का कानूनी आधार क्या है ?
अध्यक्ष को दिया गया कार्यदेश कितना व्यापक है ?
क्या वह व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य है या नहीं ?
​क्या समिति का काम केवल अध्ययन और सुझाव देना है या संविधान संशोधन का औपचारिक निर्णय लेना है ?
उसकी रिपोर्ट पर संसद और नागरिक किस प्रकार विचार कर सकते हैं ?
यदि कोई समिति संविधान द्वारा संसद को दिए गए अधिकारों का स्वयं प्रयोग करने का प्रयास करती है, तो उसके संवैधानिक आधार पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। परंतु, केवल इसलिए कि संविधान में नाम का उल्लेख नहीं है, परामर्श या अध्ययन का दायित्व सौंपे गए व्यक्ति को स्वतः अवैध ठहराना उचित है या नहीं?
अंततः व्यक्ति नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया ही परीक्षण का मूल आधार होनी चाहिए… परंतु ?
​७. *राष्ट्रीय पहचान: सभ्यता, संस्कृति और संवैधानिक बहस*
नेपाल की सनातन सभ्यता, धार्मिक परंपराएँ, तीर्थस्थल, मठ-मंदिर, संस्कृत भाषा, दर्शन और सांस्कृतिक विरासत राष्ट्रीय पहचान के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
पशुपतिनाथ नेपाल के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में एक विशेष और पूजनीय स्थान रखते हैं। हिमालय की आध्यात्मिक परंपरा, हिंदू दर्शन और विविध धार्मिक पद्धतियों के साथ नेपाल का ऐतिहासिक संबंध रहा है।
इस पृष्ठभूमि में, नेपाल को ‘सनातन राष्ट्र’ के रूप में पहचान देने के प्रस्ताव को राष्ट्रीय पहचान से जुड़े एक संवैधानिक और सांस्कृतिक प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
परंतु इस बहस में दो बातों को स्पष्ट रूप से अलग किया जाना चाहिए: सनातन सभ्यता का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व और राज्य का औपचारिक धार्मिक स्वरूप।
​नेपाल के संविधान की धारा ४ नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में परिभाषित करती है। इसलिए राज्य की धार्मिक पहचान बदलने का प्रस्ताव सीधे तौर पर मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था से टकराता है। हालाँकि, हिंदू राष्ट्र के पक्ष में गैर-हिंदू सांसदों ने भी मुखर होकर आवाज उठाई है।
‘सनातनी राष्ट्र’ या ‘सर्वधर्म समभाव राष्ट्र’ जैसी अवधारणाओं पर चर्चा करते समय उनके व्यावहारिक अर्थ और प्रभाव को स्पष्ट करना आवश्यक है। धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता, सभी समुदायों का सम्मान और राज्य की निष्पक्षता के साथ इन अवधारणाओं का क्या संबंध होगा—इन प्रश्नों के उत्तर खोजना ज़रूरी है।
सनातन परंपरा का संरक्षण और सभी नागरिकों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा को परस्पर विरोधी विषयों के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस के दो महत्वपूर्ण आयामों के रूप में देखा जाना चाहिए।

​८. *नेपाली एकता का सांस्कृतिक प्रतीक*
पशुपतिनाथ नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़े हुए हैं। हिमालयी आध्यात्मिक परंपरा और सनातन दर्शन के साथ उनका जुड़ाव उन्हें एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विशेष महत्व देता है।
पशुपतिनाथ को नेपाली एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण इस विश्वास को व्यक्त करता है कि नेपाल के तीर्थस्थल, सांस्कृतिक परंपराएँ और ऐतिहासिक विरासत नागरिकों के बीच साझा सूत्र का निर्माण कर सकते हैं।
लेकिन राष्ट्रीय एकता केवल किसी एक धार्मिक प्रतीक तक सीमित नहीं होती। नेपाल के विभिन्न धार्मिक, भाषाई, जातीय और सांस्कृतिक समुदायों के साझा अनुभव, नागरिक अधिकार और आपसी सम्मान भी एकता के मजबूत आधार हैं और हो सकते हैं।
इसलिए पशुपतिनाथ के सांस्कृतिक महत्व को स्वीकार करते हुए, नेपाल की अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों का सम्मान और संरक्षण करना भी राष्ट्रीय एकता की व्यापक अवधारणा में शामिल होना आवश्यक है।
हिमालय की सभ्यतागत विरासत और नेपाल के बहुसांस्कृतिक समाज को एक साथ समझने वाला दृष्टिकोण ही राष्ट्रीय पहचान की बहस को अधिक समावेशी बना सकता है।

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​९. *राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठने की चुनौती*
संविधान संशोधन की बहस किसी एक राजनीतिक दल, सरकार या समूह की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है। चूंकि यह राज्य के दीर्घकालिक ढाँचे और नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करती है, इसलिए इसमें व्यापक सहभागिता अनिवार्य है।
संविधान संशोधन का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता, सुशासन, प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा हो सकता है। परंतु प्रत्येक प्रस्ताव का संवैधानिक आधार, संभावित प्रभाव और कार्यान्वयन की व्यावहारिकता स्पष्ट होनी चाहिए।
इसके लिए राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों, नागरिक समाज, विभिन्न समुदायों और हितधारकों के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता है।
संविधान संशोधन को केवल सत्ता प्राप्त करने या सत्ता बनाए रखने का साधन बनने से बचाने के लिए पारदर्शिता, साक्ष्य-आधारित अध्ययन और संसदीय प्रक्रियाओं का सम्मान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

​१०. *निष्कर्ष*
२७ भदौ २०८३ के बाद की संवैधानिक स्थिति को लेकर उठे प्रश्नों ने नेपाल में संविधान की प्रभावकारिता, सरकार की वैधता, चुनावों की विश्वसनीयता और संविधान संशोधन की प्रक्रिया पर एक गंभीर सार्वजनिक बहस की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
‘संविधान कोमा में है’ का रूपक राजनीतिक और संस्थागत संकट की अनुभूति को व्यक्त कर सकता है। परंतु इसके कानूनी अर्थ को स्पष्ट करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों, आधिकारिक निर्णयों और ठोस साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।
सुशीला कार्की सरकार के संवैधानिक आधार, उसके द्वारा कराए गए चुनावों की वैधता और संविधान संशोधन समितियों के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाना सार्वजनिक जवाबदेही का ही एक हिस्सा है। इन सवालों के जवाब प्रमाणों और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से ही खोजे जाने चाहिए।
इसी प्रकार, सनातन सभ्यता के संरक्षण, पशुपतिनाथ के सांस्कृतिक महत्व और नेपाल की राष्ट्रीय पहचान पर चर्चा करते समय धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिक अधिकार और बहुसांस्कृतिक समाज की वास्तविकता पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है।
संविधान की रक्षा का अर्थ केवल उसके शब्दों (अक्षरों) की रक्षा करना नहीं है; बल्कि सत्य, न्याय, नागरिक अधिकार, संस्थागत मर्यादा और राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना भी है।
अंततः नेपाल के संवैधानिक भविष्य का प्रश्न किसी एक व्यक्ति, सरकार या राजनीतिक दल की सीमाओं में नहीं बँध सकता। यह संपूर्ण नेपाली समाज के साझा भविष्य से जुड़ा विषय है। इसलिए संविधान संशोधन की बहस तथ्यों, तर्कों, कानूनी स्पष्टता, सांस्कृतिक सम्मान और व्यापक राष्ट्रीय संवाद पर आधारित होनी चाहिए।
क्या हम सभी एकजुट होकर इस आधार पर संविधान के अक्षर और उसकी आत्मा के बीच के संबंध को मजबूत करें, और नेपाल की ऐतिहासिक विरासत तथा आधुनिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन की खोज करें? आइए, एकजुट हों और इसका निर्माण करें।

डॉ विजय दत्त
विश्लेषक

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