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हमारे पर्व हमें प्रकृति की पूजा करना सिखाते हैं : श्वेता दीप्ति

हिन्दू संकृति और आस्श्विन मास

हिमालिनी  अंक अगस्त , सितंबर  2019 (सम्पादकीय ) | हिन्दू संस्कृति व्यक्ति–समाज–राष्ट्र के जीवन का सिंचन कर उसे पल्लवित–पुष्पित फलयुक्त  बनाने वाली अमृत स्रोतस्विनी चिरप्रवाहिता सरिता है । यह संस्कृति विश्व की प्राचीनतम  संस्कृतियों में से एक है । यह माना जाता है कि यह यूनान, रोम, मिस्र, सुमेर और  चीन की संस्कृतियों के समान ही प्राचीन है । कई विद्वान तो इस संस्कृति को  विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति मानते हैं ।

हिन्दू संस्कृति जीवन–दर्शन, व्यक्तिगत और सामुदायिक  विशेषताओं, भूगोल, ज्ञान–विज्ञान के विकास क्रम, विभिन्न समाज, जातियों के कारण बहुत  विशिष्ट  है । यह भिन्नता–विभिन्नता सहज और स्वाभाविक है । यह प्राचीन संस्कृति  सार्वभौमिक सत्यों पर खड़ी है और इसी कारण वह सब ओर गतिशील है । कोई भी  संस्कृति की अमरता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह कितनी विकासोन्मुखी है । जिस संस्कृति में युग की मांग के अनुसार विकसित और रूपांतरित होने की क्षमता नहीं होती,  वह पिछड़ जाती है । यह आत्मा को ही मुख्य मानती है । यही वजह है कि मृत्योपरान्त भी अपने पूर्वजों और पित्तरों के लिए श्राद्ध पक्ष की महत्ता है ।

सनातन हिन्दू संस्कृति में वैसे तो पूरे वर्ष ही पर्व, व्रत और त्योहारों की निरंतर उपस्थिति बनी ही रहती है पर वर्ष के बारह हिंदी महीनो में से भी चातुर्मास (श्रावण, भाद्रपद,अश्विन,कार्तिक) के चार माह धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े विशेष माने गए हैं इसी लिए चातुर्मास के इन चार महीनों में सांसारिक विवाह आदि मंगलकार्यों को रोककर जीवन को धर्म के कार्यों में लगाया जाता है पर चातुर्मास के चार महीनों में से भी आश्विन और कार्तिक मास का सबसे अधिक और विशेष महत्त्व बताया गया है । हिंदी पंचांग के अनुसार आश्विन और कार्तिक मास वर्ष छठा और  सातवां महीना होता है आश्विन और कार्तिक मास को हिन्दू धर्म ग्रंथों में धार्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया गया है । जहाँ आश्विन मास शक्ति उपासना का मास है जिसमें माँ दुर्गे के सभी नौ रुपों की पूजा होती है, वहीं कार्तिक मास को विशेष रूप से भगवान् श्री हरी विष्णु की उपासना का काल माना गया है इसलिए कार्तिक मास में विशेष रूप से भगवान् विष्णु की पूजा की जाती है पौराणिक व्याख्यानों के अनुसार कार्तिक मास भगवान् विष्णु को अति प्रिय है और श्री हरी का स्वयं वचन है के वनस्पतियों में तुलसी तिथियों में एकादशी और माह में कार्तिक मास मुझे अति प्रिय है इसी लिए कार्तिक को विष्णु मास के नाम से भी जाना जाता है ।

दीपावली और सूर्योपासना का महाव्रत छठ कार्तिक मास में ही होते हैं । हमारे पर्व हमें प्रकृति की पूजा करना सिखाते हैं जहाँ यह संदेश भी है कि हमें अपनी सृष्टि के संरक्षण हेतु प्रकृति के हर उपादान का आदर करना चाहिए और उसे सुरक्षित रखना चाहिए । हम हवा, जल, पृथ्वी, आकाश और अग्नि की पूजा करते हैं जिसमें यह अर्थ समाहित है कि ये सभी तत्व जिनसे मानव शरीर बना है और जो हमारी सृष्टि की नियामक है उसे सम्मान देना चाहिए ।

त्योहारों के इस मंगल मास में समस्त देशवासियों को अनन्त शुभकामनाएँ ।

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